भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रे व्याध ! तू क्यों भ्रममें पड़ा है ? इस क्षणभङ्गुर संसारमें अपने दीर्घकालव्यापी दुःखके लिये धनुषसे इन मृगोंको क्यों मारता है ? अहिंसा-अभयदान आदि शास्त्रमर्यादाका पालन क्यों नहीं करता ? अरे पुत्र ! वायुसे टकराये हुए मेघमण्डलमें लटकते हुए जलकी बूँदकी भाँति आयु विनाशी है। भोग बादलोंकी घटाके मध्य कौंधनेवाली बिजलीकी तरह चञ्चल हैं। जवानीके भोग-विलास जलके वेगके समान चपल हैं। शरीर क्षण-विध्वंसी है; अतः इस संसारसे भयभीत होकर तू निर्वाणकी ही खोज कर।'*

तब व्याधने पूछा—'मुनिराज ! यदि ऐसी बात है तो बताइये कि दुःखका पूर्णतया विनाश करनेके लिये जो न कठोर हो और न कोमल हो—ऐसा कौन-सा व्यवहारक्रम हो सकता है ?

मुनिने कहा—'व्याध ! तू इसी समय बाणोंसहित इस धनुषको सदाके लिये त्याग दे और मुनिके-से आचरणका आश्रय लेकर दुःखरहित हो यहीं निवास कर।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रामभद्र ! उक्त मुनिके यों उपदेश देनेपर उसने धनुष और बाणोंका परित्याग करके मुनियोंका-सा आचरण अपना लिया। फिर बिना माँगे जो कुछ मिल जाता था, उसीपर जीवन-निर्वाह करते हुए वह वहीं रहने लगा। कुछ ही दिनोंमें सारासारकी विवेक-शीलताने उस मौनीके मनमें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे पुष्प गन्धद्वारा मनुष्योंके हृदयमें अपना स्थान बना लेता है।

तदनन्तर व्याधद्वारा किये गये प्रश्नके उत्तरमें मुनिने धारणाके अभ्याससे परकाय-प्रवेशद्वारा देखे गये स्वप्नका, दो जीवोंके सम्मेलनसे दुगुने विश्वदर्शनका, एकता होनेपर एक विश्वके दीखनेका, विस्तारपूर्वक प्रलयदर्शनका, प्रलय-सागरके हटने, गाँवमें ब्राह्मणरूपमें स्थिति, दूसरेके शरीरसे बाहर निकलने आदिका वर्णन करनेके पश्चात् कहा।

मुनि बोले—'व्याध ! सृष्टिकी उत्पत्तिका वस्तुतः कोई कारण नहीं है। अतः उसकी उत्पत्तिका अभाव स्पष्ट है। इसलिये सृष्टि शब्द और उसका अर्थ दोनों ही सर्वथा नहीं हैं। ऐसी स्थितिमें कहाँ शरीर है, कहाँ हृदय है, कहाँ स्वप्न है, कहाँ जल आदि है, कहाँ ज्ञान है, कहाँ अज्ञान है और कहाँ जन्म-मरण आदि है ? वास्तवमें तो वह निर्मल चिन्मात्र ही है, जिसकी अपेक्षा आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होते हुए भी उसी प्रकार स्थूल लगता है जैसे परमाणुओंके निकट पर्वत। वह चिदाकाश अपने आकाशरूप शरीरके नियममें स्वभावतः जो कुछ संकल्प करता है, उससे वह अपनेको जगद्रूपसे जानता है। जैसे स्वप्नमें केवल चेतन जीव ही नगररूपसे प्रतीत होता है, वास्तवमें वहाँ नगर आदि कुछ भी नहीं है, वैसे ही आत्माकाशमें शान्त, अखण्ड, अप्रत्यक्ष चिन्मात्र ही जगद्रूपसे भासित होता है। जैसे नेत्रोंमें तिमिर रोग हो जानेसे प्रकाशमय आकाशमें धुँआँ-सा दीख पड़ता है, उसी तरह चिद्रूपी दृष्टिमें अज्ञानरूपी तिमिर रोगके कारण जगत्‌का भान होता है। परन्तु वस्तुतः न भान है न अभान, न प्रतिभासिक जगत् है न व्यावहारिक तथा भूताकाश भी नहीं है; बल्कि केवल निराकार, अनादि, अनन्त, अद्वितीय चिदाकाश ही है। जिस हेतुसे कारणके बिना स्वप्नमें केवल शुद्ध द्रष्टा ही भासित होता है, उसी हेतुसे जाग्रत्‌में भी कारणका अभाव है और उसमें न द्रष्टा है न दर्शन। जैसे एक काल सृष्टि और प्रलय—दोनों रूपोंमें व्याप्त है अथवा बीज अङ्कुरसे लेकर पुष्प-फलपर्यन्त सभी अवस्थाओंमें वर्तमान है, उसी प्रकार ब्रह्म सर्वव्यापी है। जो एककी दृष्टिमें महान् दीर्घालरूप है, वही दूसरेकी


* आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलम्वाम्बुवद्‌भङ्गुरं
भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामनीचञ्चलाः ।
लोला यौवनलालना जलरयः कायः क्षणापायवान्
पुत्र त्रासमुपेत्य संसृतिवगान्निर्वाणमन्विष्यताम् ॥
( नि० प्र० उ० १३६ । ३३ )