संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन * ६४५
दृष्टिमें निर्मल आकाश-सा दीखता है। यह बात स्थिर-स्वप्न, संकल्प और भ्रम आदि अवस्थाओंमें देखी गयी है। जैसे आत्मा एक निर्मल चिदाकाशस्वरूप होकर स्वप्नमें जाग्रत्की तरह प्रतीत होता है, उसी तरह जाग्रन्मय स्वप्नमें भी भासित होता है। दोनों अवस्थाओंमें उसकी जरा-सी भी अन्यथाप्रतीति नहीं होती। अतः व्याध ! समस्त मनोव्यापारका त्याग कर देनेपर तुम जैसा रहते हो, वही तुम्हारा निरामय स्वरूप है, तुम वस्तुतः बाहर-भीतर सर्वत्र अनन्त आत्मारूपसे निरन्तर स्थित हो।
ब्रह्मा आदि जो स्वयंभू अपने-आप उत्पन्न होनेवाले हैं, वे सृष्टिके आदिमें स्वयं ही प्रकट होते हैं; क्योंकि उनके शरीर ज्ञानमात्रस्वरूप होते हैं। अतः उनके जन्म और कर्म नहीं होते। उनकी दृष्टिमें न संसार है, न द्वैत है और न कल्पनाएँ हैं। विशुद्ध ज्ञानस्वरूप शरीरवाले वे सदा सर्वात्मारूपसे स्थित रहते हैं। सृष्टिके आरम्भकालमें जैसे परब्रह्मस्वरूप ब्रह्मा आदि प्रकट होते हैं, उसी तरह सैकड़ों-हजारों दूसरे जीव भी प्रकट होते हैं; किंतु जो अज्ञानी हैं, वे अपनेको ब्रह्मसे भिन्न मानते हैं। वे असात्त्विक जीव इस जड दृश्यमय द्वैत प्रपञ्चको सत्य समझकर ही पहले मृत्युको प्राप्त हुए थे। अतः अब उनका कर्मसहित पुनः जन्म दिखायी देता है; क्योंकि उन्होंने स्वयं ही अचेतन देहात्मरूप होकर अवस्तुका आश्रय ग्रहण किया है। सर्वात्मरूप चेतनकी निर्मलता स्वाभाविक है। नित्य ब्रह्म स्व-स्वभावमें ही स्थित है। जिसे वह परमात्म-स्वरूप ज्ञात हो गया है, उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है। तब जिसका अस्तित्व ही नहीं है, उसके विनाशमें कठिनाई ही कौन-सी है। जबतक पाण्डित्यकी—परमात्मस्वरूपके ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो जाती, तभीतक माया संसारभयको उत्पन्न करनेमें समर्थ होती है। पाण्डित्य वही है, जिससे पुनः इस संसारचक्रमें पतन नहीं होता। इसलिये विशुद्ध ज्ञानसे भरपूर उस पाण्डित्यकी प्राप्तिके लिये अविराम प्रयत्न करना चाहिये। इसके सिवा अन्य किसी उपायसे तुम्हारा यह संसार-भय नष्ट नहीं हो सकता।
(सर्ग १३६–१४२)
पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन
मुनि बोले—व्याध ! जो परमधामरूपी गन्तव्य स्थानके मार्गके ज्ञाता हैं तथा जिन्हें आत्मज्ञानका पूर्णबोध है, ऐसे पण्डित जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसके सामने इन्द्रका ऐश्वर्य जीर्ण-शीर्ण तृणके समान तुच्छ है। मुझे तो पाताल, भूतल और स्वर्गलोकमें कहीं भी ऐसा सुख अथवा ऐश्वर्य नहीं दीख रहा है; जो पाण्डित्यसे बढ़कर हो। जैसे ज्ञान हो जानेसे मालामें सर्पकी भ्रान्ति तुरंत मिट जाती है, वैसे ही ज्ञानीकी दृष्टिमें यह अविद्यात्मक दृश्य-प्रपञ्च क्षणमात्रमें ब्रह्मरूपमें परिणत हो जाता है। ब्रह्मका जो प्रतिभास है, वही यह जगत् कहा जाता है। इसी कारण ये पृथ्वी आदि पञ्चभूत कहाँ हैं और इनका कारण कहाँ है अर्थात् जगत्की उत्पत्तिमें इन कारणोंकी अपेक्षा नहीं है। जैसे स्वप्नद्रष्टाको स्वप्नमें दीखनेवाले मनुष्योंकी स्थिति काल्पनिक है, वास्तविक नहीं है, उसी तरह जाग्रत्स्वरूप स्वप्नमें दीखनेवाले मनुष्योंकी स्थिति भी पूर्वकामनाके अनुसार कल्पित है, यथार्थ नहीं है।
व्याध ! जैसे स्वप्नावस्थामें तुम्हारे अन्तःकरणके संकल्पमें नगर दीखता है, वैसे ही ब्रह्मके संकल्पमें यह सृष्टि वर्तमान है और जैसी कार्यकारणता तुम्हारे स्वप्नकालमें कही गयी है, वैसी ही कार्यकारणता यहाँ भी है।
यद्यपि यह सम्पूर्ण जगत् असत् है, तथापि स्वप्नकी तरह इसका अनुभव होता है। यदि 'जगत् नहीं है' यों कहा जाय तो पूर्ण चेतन ही इस रूपमें