संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विकसित होता है। जैसे हमलोगोंका यह जगत् है, वैसे ही आकाशमें अन्य प्राणियोंके लाखों जगत् हैं; परंतु उनकी परस्पर अनुभूति नहीं होती। सरोवर, सागर और कूपमें पृथक्-पृथक् निवास करनेवाले मेढकोंको अपने-अपने निवासस्थानका ही अनुभव रहता है, उन्हें परस्पर एक-दूसरेके दृश्यादिका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। जैसे एक ही घरमें सैकड़ों मनुष्योंके सैकड़ों स्वप्न-नगर होते हैं, उसी प्रकार आकाशमें बहुत-से जगत् भासित होते हैं; परंतु अज्ञानियोंके अनुभवमें आनेसे ही उन आकाशीय जगर्तोंकी सत्ता है और ज्ञानियोंके अनुभवका विषय न होनेसे वे असत् हैं। जैसे एक घरमें सैकड़ों मनुष्योंके सैकड़ों स्वप्न-नगर विकसित होते हैं और नहीं भी होते, उसी तरह आकाशमें जगत् है और नहीं भी है।
यह भुवन चिन्मात्रमें स्थित है। 'त्वम्', 'अहम्' आदि रूप जगत् भी चिन्मय है। इस न्यायसे उत्पन्न न होता हुआ भी जगत् परमाणुके अंदरतक चला जाता है अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। मै परमाणुरूप हूँ, अतः समस्त जगत्के आकारमें स्थित हूँ। इसी कारण मैं सर्वत्र यहाँतक कि परमाणुके अंदर भी विद्यमान हूँ। यह चिदाकाशरूप मैं चिन्मात्र परमाणु होकर जगद्रूपसे जहाँ स्थित रहता हूँ, वहीं तीनों लोकोंको देखता हूँ। मेरे अन्तरात्मामें तीनों लोकोंका जैसा रूप विकसित होता है, वैसा बाहर नहीं होता; क्योंकि कहीं भी किसीने उसे देखा नहीं है। स्वप्न अथवा जाग्रतमें जब-जब अथवा जहाँ-जहाँ जगत्का जो भान होता है, वह बाह्य एवं आभ्यन्तर-सहित समस्त दृश्य चेतन आत्माका भान ही है। जब स्वप्नमें प्राणीका विस्तृत जगत् भासित होता है, तब वह चिदणुरूप आत्माका ही भान होता है और वह स्वप्न-स्थानरूपसे होता है।
(सर्ग १४३-१४४)
मुनिका व्याधके प्रति बहुत-से प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःखकी प्राप्तिके निमित्तका निरूपण करना
इस प्रकार स्वप्न, सुषुप्ति आदिके भेदोंका वर्णन करके मुनिने पुनः कहा—'व्याध ! यद्यपि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय स्वरूपवाला आत्मा आकाररहित होकर भी सर्वाकार है, कल्पनाओंसे शून्य होते हुए भी सृष्टिरूपी शरीर धारण करनेवाला है और शून्यरूप दृश्यात्मक चित्-शरीरसे शून्याकाशको व्याप्त करके स्थित है, तथापि यह आकाशात्मक चिन्मात्र अपने शुद्ध चिदाकाशस्वरूपसे कभी भी तनिक भी भिन्न नहीं है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, लोकान्तर और मेघ आदि भूत-भौतिक पदार्थों-सहित यह दृश्यजगत् सृष्टिके आदिमें भी कारणका अनुभव न होनेसे केवल चिदात्मक ही है। वास्तवमें यह नाम-रूपसे रहित और बोधस्वरूप ही है; क्योंकि अन्ततो-गत्वा मनोलय हो जानेपर यह सारा-का-सारा शुद्ध ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही रह जाता है, कोई अन्य वस्तु नहीं।'
व्याधने पूछा—मुने ! प्रलय आदि सैकड़ों महावृत्तान्तों-से जिसकी अनेकों सृष्टियाँ समाप्त हो चुकी हैं, ऐसे आपका उन-उन लोकोंमें कैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसका रहस्य बतलाइये।
मुनिने कहा—सदाचारकी स्पृहा रखनेवाले साधुस्वभाव व्याध ! खगगत किसी प्राणीके ओजमें स्थित होनेपर उस प्राणीके हृदयस्थित ओजमें जो अपूर्व वृत्तान्त घटित हुआ, उसे सुनो। उस समय वहाँ मेरा आत्मज्ञान-सम्बन्धी सारा चमत्कार विस्मृत हो गया और वर्ष-ऋतुरूप काल धीरे-धीरे व्यतीत होने लगा। मेरा आत्म-चिन्तन छूट गया और बुद्धि पुत्र-कलत्र आदिमें अनुरक्त हो गयी। इस प्रकार उस गृहस्थाश्रममें रहते मेरे सोलह वर्ष बीत गये। तदनन्तर किसी समय एक सम्मान्य विद्वान् मुनि अतिथिरूपसे मेरे घर पधारे।