संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिका बहुत-से प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःख-प्राप्तिका निमित्त बताना * ६४७
वे मननशील तथा अगाध ज्ञानसम्पन्न थे। उनकी तपस्या बड़ी उग्र थी। मैने उनका भलीभाँति आदर-सत्कार किया। तात! जब वे भोजन करके संतुष्ट हो आसनपर शयन करने लगे, तब मैने जनताके सुख-दुःखके क्रमका विचार करके उनसे यों प्रश्न किया—'भगवन्! चूँकि आप महाज्ञानी हैं। जगत्की सारी गतिविधियाँ आपको विदित हैं। आपमें क्रोध तो लेशमात्र भी नहीं दीखता तथा सुखमें आपकी तनिक भी आसक्ति नहीं है; अतः यह बतानेकी कृपा कीजिये कि जैसे शरत्कालमें फलार्थी पुरुषोको धान आदिकी प्राप्ति होती है, वैसे ही कर्मशील जीवोंके अपने शुभाशुभ कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। तो क्या ये सारी प्रजाएँ एक साथ ही अशुभ कर्म करती हैं, जिनके फलस्वरूप दुर्भिक्षादि सभी दोष इन्हें एक साथ ही प्राप्त होते हैं? यदि दुर्भिक्ष एवं अनावृष्टि आदि उपद्रव सबके लिये एक-से ही होते हैं तो इसका क्या रहस्य है तथा किस-किसके दुष्कर्म समान होते हैं?' मेरा यह प्रश्न सुनकर वे मुनि मेरी ओर देखकर मुस्कराये और अमृत-प्रवाहकी तरह सुन्दर एवं प्रशंसनीय वचन बोले।
समागत मुनिने कहा—साधो! यह तो बतलाओ, अन्तःकरणके पूर्णतया विवेकसम्पन्न होनेपर इस दृश्यका जो सत् या असत्रूप कारण है, उसे किससे जानते हो। तुम कौन हो और इस जगत्में कहाँ स्थित हो—यों अपने आत्माका पूर्णरूपसे स्मरण करो। मैं कहाँ हूँ? यह दृश्य क्या है? क्या सार है? क्या असार है? यह सब स्वप्नमात्र ही प्रतीत होता है। इसे तुम क्यों नहीं समझते हो? मैं तुम्हारे लिये स्वप्न-पुरुष हूँ और तुम मेरे लिये स्वप्न-पुरुषके तुल्य हो। यह जगत् निराकार अनिर्वचनीय अनादि और कल्पनारहित है। यह चिन्मात्ररूपी काँचकी चमकके समान स्थित है। इस सर्वव्यापक चिन्मात्रका स्वाभाविक रूप ही ऐसा है कि यह जहाँ जैसा समझता है, वहाँ वैसा ही हो जाता है। जब यह वस्तुओंके सकारणत्वकी कल्पना करता है, तब सब कुछ सकारण है और जब अकारणत्वकी कल्पना करता है, तब सभी कुछ अकारण है। साधुपुरुष! जैसे बहुत-से वृक्षोंपर एक साथ बिजली गिरती है, वैसे ही कुछ प्राणियोंके कतिपय दुष्कर्म रहनेपर एक साथ ही दुःख आदिके पहाड़ टूट पड़ते हैं। कर्मोंकी कल्पनासे जीवात्माको अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है, परंतु जब वह कर्मोंकी कल्पनासे उन्मुक्त हो जाता है, तब उसे कर्मफलका भोग नहीं प्राप्त होता। स्वप्नमय नगरकी भाँति इस जगत्में सहकारी कारण आदि कोई भी कारण नहीं है। इसलिये वह अनादि, चेतन, अजर, मङ्गलमय परब्रह्म ही है। यह स्वप्नवत् जगद्भ्रम कोई बिना कारणके प्रतीत होता है और कोई कारणके साथ। वास्तवमें तो यह मिथ्या ही है।
महामते! ये सारी सृष्टियाँ पहलेसे इसी तरह अकारण ही प्रवृत्त होती आ रही हैं। जैसे आकाशमें देरतक देखते रहनेसे नेत्रोंके सामने चक्राकार गोले दीखने लगते हैं, वैसे ही जगत्मे ये ढेर-की-ढेर सृष्टियाँ चक्कर काटती रहती हैं। चित्-शक्तिने ही अपनेमें 'मैं ही अमुक हूँ' यों जिस-जिस भावात्मक रूपकी स्वतः कल्पना की, वह आज भी वैसा ही स्थित है। पुनः वही चित् उससे भी उत्कृष्ट दूसरे महान् यत्नसे उसे अन्यथा करनेमें भी समर्थ है। विद्वान्-द्वारा जहाँ कारणकी कल्पना की जाती है, वहाँ तो कारणकी सारता रहती है और जहाँ उसकी कल्पना नहीं की जाती, वहाँ कारणहीनता ही है। यह विस्तृत जगत् पहले बवंडरकी तरह असत् ही आभासित हुआ और उस समय जैसा भान हुआ वैसा ही आज भी स्थित है। कुछ लोग अपना शुभ-अशुभ पुण्य-पापरूप कर्म मिला-जुलाकर करते हैं, अतः उन्हें उनका फल भी उसी तरह सम्मिश्रित रूपमें मिलता है।
(सर्ग १४५—१४९)