संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति, पूर्वदेहमें गमनकी असमर्थताके विषयमें प्रश्न करनेपर देह आदिके भस्म होनेके प्रसंगमें मुनिके आश्रम और दोनों शरीरोंके जलने तथा वायुद्वारा उस अग्निके शान्त होनेका वर्णन
मुनिने कहा—व्याध ! उस समय उन मुनिने इस प्रकारकी युक्तिसे मुझे ऐसा ज्ञानोपदेश किया, जिससे तत्काल ही ज्ञेय-तत्त्व मेरी बुद्धिमें बैठ गया। जिन मुनिने यह चन्द्रोदयके समान मनोहर वचन कहा था, वे ही ये मुनिवर तुम्हारे बगलमें बैठे हैं। (उक्त मुनिको दिखाकर कहा—) उनकी ओर दृष्टिपात करो। ये मूर्तिमान् यज्ञके समान हैं। इन्हें दृश्यके पूर्वापरका पूर्ण ज्ञान है। ये ही मेरे अज्ञानका विनाश करनेवाले हैं। यद्यपि मैने इनसे कहनेके लिये प्रार्थना नहीं की थी, तथापि इन्होंने ही मुझसे यह बात कही थी।
अग्नि बोले—विपश्चित् ! उन मुनिकी वह बात सुनकर वह व्याध उस समय विचारने लगा कि यह स्वप्नसृष्टि प्रत्यक्ष कैसे हो गयी। यों सोचकर उसे महान् विस्मय हुआ।
तब व्याधने कहा—मुने ! भव-तापका अपहरण करने-वाले आपने अभी-अभी जो बात मुझसे कही है, वह तो महान् आश्चर्यजनक है और मेरे मनमें नहीं बैठ रही है। मुनिवर ! स्वप्नमें जिनका आपने अपने उपदेशक-रूपसे वर्णन किया था, उन्हींकी जाग्रत्में प्रत्यक्षता बतला रहे हैं और मै भी उन्हें प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। इसीलिये मै इसे परम विस्मयकी बात मानता हूँ।
मुनि बोले—महाभाग व्याध ! तदनन्तर यहाँ मेरी कौन-सी विस्मयजनक घटना घटी, उसका मै संक्षेपमें वर्णन करता हूँ; सुनो। सहसा उतावली मत करो। तुम्हारे समीप बैठे हुए इन मुनिवरने उस समय वहाँ मुझे ज्ञानोपदेश करनेके लिये वैसा वर्णन किया था और मै उन महात्माकी उस वाणीसे तुरंत ज्ञानसम्पन्न हो गया। तत्पश्चात् उनकी वाणीके प्रभावसे मुझे अपने पहलेके अनादिसिद्ध सन्मात्ररूप निर्मल स्वभावका स्मरण हो आया, फिर तो मेरे हृदयमें यह भावना जाग उठी कि मै ही वह मुनि था। ऐसा ध्यान आते ही प्रचुर आश्चर्यवश स्नान किये हुएकी तरह मेरा हृदय आर्द्र हो गया। मै विषय-भोगकी आसक्तिसे इस-अवस्थाको प्राप्त हो गया हूँ—ठीक उसी तरह जैसे अज्ञानी पथिक मार्गके परिश्रमसे पीड़ित होकर जलके लिये मिथ्याभूत मृगतृष्णा-के पीछे दौड़ता है। अहो ! आश्चर्य है, बढ़ते हुए इस मिथ्याज्ञानने, जो सर्वार्थशून्य है, मुझे यह किस दशाको पहुँचा दिया। वास्तवमें तो न मैं हूँ, न यह स्त्री है, न यह घर है और न यह भ्रम ही है—यह सब कुछ मिथ्या है, फिर भी सद्-सा प्रतीत होता है। यह महान् आश्चर्य है। अच्छा, अब इस विषयमें मुझे क्या करना चाहिये। मेरे अंदर बन्धनको तोड़ डालनेमें समर्थ जो ग्रहाकार वृत्तिरूप अङ्कुर है, वह भी काट डालने योग्य है, अतः तबतक मै उसीका परित्याग करता हूँ। यों सोच-विचारकर मैने वहाँ उन मुनिसे इस प्रकार कहा—'मुनीश्वर ! मैं अपने आश्रमस्थित मुनि-शरीरका तथा जिस शरीरको देखनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ, उसका भी निरीक्षण करनेके लिये जाता हूँ।'
यह सुनकर वे मुनिवर उस समय ठाठकर हँस पड़े और मुझसे कहने लगे—'वे दोनों शरीर अब हैं कहाँ। वे तो अब बहुत दूर चले गये। अथवा वृत्तान्तज्ञ ! तुम स्वयं ही जाओ और उस वृत्तान्तको देखो। वहाँ घटित हुई घटनाको जब तुम यथार्थरूपसे देख लोगे, तब स्वयं ही जान जाओगे।' मुनिके यों कहनेपर मैने अपने उस प्राक्तन मुनि-शरीरका स्मरण करके वहाँ जानेकी इच्छासे इस स्वप्नकल्पित रूपका परित्याग कर दिया और चिदात्मारूप अपने जीवको प्राणके द्वारभूत पवनसे संयुक्त