भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 696

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति * [ ६४९

कर दिया। चलते समय मैंने उन मुनिसे कहा— 'मुने ! अपने प्राक्तन शरीरका अवलोकन करके जबतक मैं लौटता हूँ, तबतक आपको यहीं बैठे रहना चाहिये।' यों कहकर मैं वायुमे प्रविष्ट हुआ। तदनन्तर मैं बडी उतावलीके साथ उस वायुरूपी रथपर आरूढ होकर पुष्पकी सुगन्धकी तरह उस अनन्त आकाशमें जाकर चिरकालतक भ्रमण करता रहा। परंतु बहुत देरतक भटकते रहनेपर भी मुझे वहांसे निकलनेके लिये उस प्राणीके गलेका छिद्र आदि कोई मार्ग प्राप्त नहीं हुआ। तब मैंने मुनिके पास जाकर उनसे पूछा--'मुनिराज ! यद्यपि मैं स्थावर-पर्यन्त अपने विस्तृत संसारमण्डलमें चिरकालतक भ्रमण करता रहा, तथापि मुझे वह गलेका छिद्र नहीं प्राप्त हुआ—इसका क्या कारण है ?' मेरे यों प्रश्न करनेपर वे महाशय मुनि बोले--'कमलनयन ! तुम उस शरीर-वृत्तान्तको (उपदेश किये गये बिना ही) स्वयं अपनी बुद्धिसे कैसे जान गये। यदि योगसे एकाग्र हुई बुद्धिके द्वारा तुम स्वयं ही इसका अवलोकन करते हो तब तो हाथपर रखे हुए कमलकी तरह तुम्हें उसका पूर्णतया ज्ञान है ही। तथापि यदि तुम्हें मेरे मुखसे सुननेकी इच्छा है तो मैं उस यथाघटित वृत्तान्तका पूर्णरूपसे वर्णन करता हूँ, सुनो--

'तुम अपनेको जैसा समझते हो, वैसे व्यष्टि जीवरूप नहीं हो। तुम तो समस्त प्राणियोंके तपरूपी कमलके लिये सूर्यरूप, कल्याणरूपी कमलोंकी खान और भगवान् श्रीहरिके नाभिकमलकी कर्णिका अर्थात् हिरण्यगर्भ हो। वही तुम किसी समय व्यष्टिभावरूप स्वप्न देखनेकी इच्छासे तपस्यामें स्थित होकर उस पुष्ट हुई बुद्धिद्वारा किसी प्राणीके हृदयमें प्रविष्ट हुए। जिस हृदयमें तुमने प्रवेश किया था, वहाँ पृथ्वी और स्वर्गलोक जिसका उदर है, उस विस्तृत त्रिलोकीको देखा था। इस प्रकार यद्यपि तुम वहाँ बडी देरतक स्वप्न देखनेमें व्यग्र थे, तथापि तुम्हारे शरीरमें तथा महावनमें सोये हुए उस जीवके शरीरमें, जिसमें तुम स्थित थे, आग लग गयी। फिर तो धुएँसे धूमिल हुए मेघरूपी वस्त्रोंसे आच्छादित आकाश चंदोवा-सा मालूम पडने लगा। अलातचक्र-सी उड़ती हुई बड़ी-बड़ी चिनगारियाँ सूर्यमण्डल एव चन्द्रमण्डल-सी जान पडने लगीं। उस अग्निने जले हुए मेघोंपर भस्मपूर्ण धुएँके मेघ-रूपी कम्बलोंद्वारा आकाशको ऐसा आच्छादित कर दिया था मानो वे नीले आकाशदलकी रक्षा कर रहे हों। दूर देशमें स्थित लोगोंने उसे एक जगह स्थिर हुई बिजली-सा देखा। उसकी प्रभासे आकाश पिघले हुए स्वर्ण रससे अनुलिप्त फर्श-सा लग रहा था। उसकी दीप्तिमती चिनगारियाँ उड़-उड़कर आकाशमें पहुँच रही थीं, जो ताराओंकी संख्याको दुगुनी बना रही थीं। वह वक्षःस्थलमें स्थित ज्वालारूपी बालवनिताओँके कटाक्षोंसे आनन्द प्रदान कर रही थी। उस दावाग्निने, जो प्रलयाग्निके समान भीषण थी तथा वेगपूर्वक रेंगते हुए सर्पकी तरह चारों ओर फैल रही थी, तुम्हारे आश्रमके साथ-साथ तुम्हारे तथा उस प्राणीके शरीरको भी जलाकर भस्म कर दिया।'

व्याधने पूछा—मुने ! वहाँ उस अग्निदाहकी उत्पत्ति-का प्रधान कारण क्या है तथा वह वन और आपके वे शिष्य—सब-के-सब एक साथ ही कैसे नष्ट हो गये ?

मुनिने कहा—व्याध ! जैसे संकल्प आदिके विनाश और उदयमें संकल्पकर्ताके मनका स्पन्दन ही कारण है, वैसे ही त्रिजगत्का संकल्प करनेवाले विधाताका मनः-स्पन्द ही त्रिजगत् है और वही तुरत उसके विनाश और उदयका कारण है। चूँकि ब्रह्माका संकल्पनगर ही जगत् है, इसलिये उनके मनका स्पन्दन ही इस संसारमें प्रजाओंकी उन्नति, क्षय, क्षोभ, वृद्धि और अवृद्धि आदिका कारण है। ब्रह्माका मानसिक संकल्प इस त्रिलोकीका कारण है, अतः यह त्रिलोकी कल्पित है। विद्वानोंकी निर्मल दृष्टिमें चिदाकाशमें चिदाकाशकी ही शोभा विकसित होती है, किंतु जो मूर्ख हैं, उनकी दृष्टिमें