संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह जैसी अथवा जिस प्रकारकी भासती है, तन्मयी ही है। वास्तवमें तो वह सत् नहीं है।
समागत मुनिने कहा—मुने! वहाँ उस अग्निने दोनो शरीर, आश्रम, नगर, वे घर और वे वृक्ष आदि सबको सूखे तिनकेके समान शीघ्र ही जलाकर राखका ढेर बना दिया तथा अत्यन्त दाहके कारण जिसकी बड़ी-बड़ी शिलाएँ फट गयी थीं, ऐसे तुम्हारे उस आश्रममें सोये पड़े हुए वे दोनो शरीर भस्म हो गये। इस प्रकार सम्पूर्ण वनको पूर्णरूपसे जलाकर वह आग धीरे-धीरे उसी प्रकार शान्त हो गयी, जैसे समुद्रके जलको पीकर अगस्त्यजी शान्त हो गये थे। तत्पश्चात् वह अग्नि अदृश्य हो गयी। उस अग्निके अदृश्य हो जानेपर वायु उस सम्पूर्ण भस्मराशिको, जो पहले हवाके लगनेसे उदीप्त होकर फिर अत्यन्त शीतल हो गयी थी, पुष्पराशिकी भाँति कण-कण करके उड़ा ले गयी। इससे अब पता ही नहीं चलता कि वह आश्रम कहाँ था और वे दोनों शरीर कहाँ चले गये तथा जो पेटीकी तरह बहुत-से लोगोंका निवास-स्थान था, वह नगर जाग्रत्पुरुषके स्वप्ननगरीकी तरह कहाँ विलीन हो गया। इस प्रकार जब तुम्हारे तथा उस प्राणीके शरीरका अभाव हो गया, उस समय तुम स्वप्नके भ्रमसे ग्रस्त थे, परंतु इस समय तुम्हारी संवित् ही स्फुरित हो रही है। इसलिये कहाँ बाहर निकलनेका द्वारभूत उस प्राणीके गलेका छिद्र और कहाँ तुम्हारा वह विराट् आत्मा अर्थात् दोनोंमें महान् अन्तर है; क्योंकि ओजसहित जले हुए उस प्राणीका ओजसहित शरीर भी तो जल गया था। मुने! इसी कारण तुम्हें वे दोनों शरीर प्राप्त नहीं हुए हैं; क्योंकि इस समय तुम, जिसका अन्त नहीं है, ऐसे स्वप्न-संसाररूपी जाग्रत्-अवस्था में स्थित हो। सुव्रत! इस प्रकार तुम्हारा यह स्वप्न ही जाग्रद्भावको प्राप्त हो गया है और हम सब लोग तुम्हारे स्वप्नपुरुष हो गये हैं। यों तुम हमारे स्वप्नपुरुष हो और हमलोग तुम्हारे स्वप्नपुरुष हैं, किंतु यह चिदाकाशरूप आत्मा सर्वदा अपने स्वभावमें ही स्थित है। स्वप्नपुरुष होते हुए जबसे तुम्हें 'मैं जाग्रत्-पुरुष हूँ' ऐसी प्रतीति हुई, तबसे तुम जाग्रत्-पुरुष बनकर पूर्णरूपसे गृहस्थाश्रममें स्थित हो। तात! इस प्रकार वहाँ जैसी घटना घटी थी, वह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें पूर्णरूपसे सुना दिया। अब यदि तुम्हें मेरे कथनमें संदेह हो तो तुम स्वयं ही ध्यानद्वारा इस अनुभूत दृश्यको देख सकते हो। इस प्रकार जो आदि और मध्यसे रहित है, जिसका रूप अनन्त है तथा शरीर अपनी विकसन-शक्तिके उत्कर्षसे चञ्चल हो रहा है, ऐसा यह संविद्घन (ज्ञानस्वरूप) चिन्मयात्मा ही स्वयं अपने आपमें अनेक शुभाशुभ दृष्टियोंके रूपमें आकाशमें फैले हुए सूर्यके सुनहले घामकी तरह विकसित होता है।
(सर्ग १५०-१५१)
व्याध और उस मुनिके वार्तालापके प्रसंगमें जीवन्मुक्त ज्ञानीके स्वरूपका वर्णन तथा अभ्यासकी प्रशंसा
समागत मुनिने कहा—मुने! उस प्राणीके शरीर तथा मेरे शरीर आदिका वास्तवमें अस्तित्व न होनेके कारण यह सब आदि-अन्तरहित चिदाकाश ही है। इसका रूप कर्ता, कर्म और करणसे हीन, क्रमशून्य चिद्घन है। ये घट, पट और अद्रि आदि चिदाकाशके विकास हैं, अतः ये स्पष्ट आकारवाले कहाँसे हो गये। वस्तुतः यह चिन्मात्रका भी विकास नहीं है, बल्कि केवल चिन्मात्रकाश ही है; फिर उसका कैसा और क्या विकास। क्या कहीं आकाशका विकास होता है? भला, शून्य वस्तु कैसे विकसित होगी। चिन्मात्रका विकास महान् चिद्घनरूप शुद्ध ब्रह्म है। वही जगत्की तरह अवभासित हो रहा है। ऐसी दशामें दृश्य कहाँ और द्रष्टापन तो फिर आ ही कहाँसे सकता है? अतः जो कालतः आदि-अन्तशून्य, देशतः आदि-मध्यहीन, वस्तुतः अद्वितीय, कारण, कार्य