संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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' निर्वाण-प्रकरण उ० ] * व्याध और उस मुनिके वार्तालापके प्रसंगमें जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन * ६५१
| और तदधीन प्राणियोंसे परे, सत्तामय, भुवन, शैल और दिगन्तोंके कारण नाना-अनानारूप, अप्रमेय, सर्वव्यापक चेतन है, वही सब कुछ है ।<br><br> मुनि बोले-व्याध ! ऐसा निर्णय करके मैं इस दृश्यमें स्थित हूँ। मेरा संताप और राग नष्ट हो गया है। मैं आशङ्का और अहंकारसे शून्य होकर निर्वाणस्वरूप हो गया हूँ। न मेरा कोई आधार है और न मैं ही किसीका आधार हूँ। मैं मान और आश्रयसे रहित होकर अपने चित्-स्वभावमें स्थित हूँ तथा सर्वथा शान्त होकर सृष्टि-रूपसे प्रकट हूँ। मैं शान्ति-लाभ कर रहा हूँ, चारों ओरसे निर्वाण-सुखमें निमग्न हूँ और केवल आत्मसुखमें स्थित हूँ। मैं विधि-निषेधसे परे हो गया हूँ। अब मेरे लिये न कुछ बाह्य है न आन्तर । इस प्रकार मैं यहाँ यथाप्राप्त स्थितिके अनुसार निवास करता हूँ। तुम तो आज सहसा मेरे सामने आ गये हो।<br><br> व्याधने कहा-मुनिवर ! यदि ऐसी बात है तो मैं, आप और ये समस्त देवता आदि सब-के-सब परस्पर एक-दूसरेके सत्-असत्-स्वरूप स्वप्नपुरुष हो जायेंगे।<br><br> मुनि बोले-व्याध ! तुम्हारा कथन ठीक है; क्योंकि यह सब-का-सब परस्पर स्वप्नके समान स्थित है तथा अपनेमें एक-दूसरेका सत्-असत्-सा अनुभव होता है। जिसने दृश्यको जैसा समझा है, उसे तदनुकूल ही उसका अनुभव होता है। वह दृश्य वस्तु अनेक है और एक भी है । ( अज्ञानियोंके लिये अनेक है, किंतु जो तत्त्वज्ञानी हैं, उनके लिये ) जाग्रत्-कालमें वह स्वप्न-नगरके समान तथा पहले न देखे हुए दूर देशमें स्थित दृश्यमान नगरके सदृश प्रतीतिमात्र ही है; अतः वह न एक है, न सत् है, न असत् है और न सत्-असत् ही है। लुब्धक ! इस प्रकार मैंने तुमसे सब कुछ वर्णन कर दिया। मेरे निरन्तर ज्ञानोपदेश करते रहनेसे तुम | ज्ञानसम्पन्न हो गये हो। यों तो तुम स्वयं ही ज्ञानवान् हो और सब कुछ जानते हो; अतः तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो । प्राज्ञ ! यह ज्ञान अभ्यासद्वारा परिपक्व हुए बिना मनके अंदर वैसे ही नहीं प्रवेश करता, जैसे कमण्डलु आदिके आकारमें परिणत हुए बिना काष्ठमें जल नहीं टिक सकता। एकमात्र गुरु और शास्त्रके सेवनरूपी अभ्याससे बोधमें विश्राम प्राप्त होनेपर जब द्वैत और अद्वैतकी दृष्टि शान्त हो जाती है, तब चित्त निर्वाण कहलाता है। जो अभिमान और मोहसे रहित हैं, जिन्होंने सङ्गदोष-आसक्तिपर विजय प्राप्त कर ली है, जो नित्य अध्यात्म-ज्ञानमें लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्णरूपसे निवृत्त हो गयी हैं तथा जो सुख-दुःखसंज्ञक द्वन्द्वोंसे विमुक्त हैं, ऐसे ज्ञानी पुरुष ही परमात्माके उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते हैं।*<br><br> यह सुनकर वह अपने व्याध-कर्मका परित्याग करके मुनियोंके साथ रहकर तपस्या करनेको उद्यत हो गया। फिर तो उसने उन्हीं मुनियोंके साथ उन-उन भावनाओंसे भावित होकर सदा उसी लोकमें निवास करते हुए अनेकों-सहस्र वर्षोंतक अत्यन्त घोर तपस्या की। अपने तप-कालमें ही उसने उन मुनिसे पुनः पूछा-‘मुनिवर ! मुझे आत्मविश्रान्ति कब प्राप्त होगी ?’ तब मुनिने कहा।<br><br> मुनि बोले-व्याध ! मैंने तुम्हें जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, वह तुम्हारे हृदयके अंदर मौजूद तो है, किंतु वह पुरानी लकड़ीके अंदर स्थित थोड़ी-सी अग्निके समान बलहीन है, इसलिये जिसे जला डालना उचित है, उस दृश्यपर वह आक्रमण करनेमें असमर्थ |
* निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
(नि० प्र० उ० १५४ । १८)
यही श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता (१५।५) में ज्यों-का-त्यों है।