संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हैं। अभ्यासकी कमीके कारण अभी तुम्हें कल्याणप्रद ज्ञानमें विश्रामकी प्राप्ति नहीं हुई है। कुछ कालके पश्चात् अभ्यासके सुदृढ़ हो जानेपर तुम्हें पूर्ण विश्राम प्राप्त हो जायगा। (सर्ग १५२-१५५)
मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन, अग्निका स्वर्गलोक-गमन, भासद्वारा आत्म-कथाका वर्णन तथा बहुत-से आश्चर्योंका वर्णन करके आत्मतत्त्वका निरूपण
तदनन्तर मुनिने भविष्यमें व्याधके तप करके ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त करने, उसकी कायाकी वृद्धि होने, मृत्युको प्राप्त होने, फिर राजा सिंधु बनकर मन्त्रीके मुखसे तत्त्व सुननेकी बातका सविस्तर वर्णन करके कहा—'व्याध ! मैंने भविष्यमें होनेवाली सारी घटनाओंका अतीतकी तरह तुमसे वर्णन कर दिया। अब इस समय तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा भलीभाँति सोच-समझकर करो।'
अग्निने कहा—विपश्चित् ! मुनिका पूर्वोक्त वचन सुनकर व्याधका चित्त विस्मयसे पूर्ण हो गया। वह क्षणभरतक ठगा-सा खडा रहा। फिर तुरंत वह तथा वे मुनि स्नान करनेके लिये चले गये। इस प्रकार अकारण ही सुहृद् बने हुए वे दोनों व्याध और महामुनि शास्त्र-चिन्तन करते हुए वहाँ तपस्या करने लगे। तदनन्तर थोडे ही समयमें मुनिको निर्वाणकी प्राप्ति हो गयी। वे आयुके अवसानमें अपने पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग करके परमपदमें लीन हो गये। उधर व्याध चिरकालतक तपस्या करता रहा। जब सैकड़ों युग बीत गये, तब उसकी कामना पूर्ण करनेके लिये पद्मयोनि भगवान् ब्रह्मा वहाँ आये। बेचारा व्याध अपनी वासनाके आवेशको निवारण करनेमें समर्थ न हो सका; अतः मुनिद्वारा पहले ही बतायी हुई अपने वरकी व्यर्थताको जानते हुए भी उसने ब्रह्माजीसे वही वर माँगा। तब ब्रह्माजी 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर अपनी अभीष्ट दिशाकी ओर चले गये और वह व्याध अपनी तपस्याका फल भोगनेके लिये पक्षीकी तरह आकाशकी ओर उड़ चला। वहाँ वह गरुडके सदृश महान् वेगसे ऊपर-नीचे टेढ़ी-मेढ़ी अनेक उड़ानें भरता हुआ आकाशको पूर्ण-सा करने लगा। यों करते-करते उसका बहुत-सा समय बीत गया। इतने लम्बे समयके बीतनेके पश्चात् भी जब उसके अविद्या-भ्रमका अन्त नहीं आया, तब उस विषयसे उसे वैराग्य हो गया। तदनन्तर वैराग्य हो जानेके कारण उसने आकाशमें ही प्राणोंका विरेचन करनेवाली योगधारणा बाँधकर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया और उसका शरीर मुर्दा-सा होकर नीचेकी ओर लटक गया। उसका प्राणवायुसमन्वित चित्त तो उस अव्यक्ताकाशमें ही राजा विदूरथकी शत्रुरूपा पूर्वोक्त सिन्धुताको प्राप्त हो गया। (अर्थात् पूर्वोक्त राजा विदूरथके शत्रु राजा सिन्धुका रूप धारण कर लिया) जो सारे भूमण्डलका पालन करनेवाली थी तथा वह शरीर सैकड़ों मेरुका-सा विशालकाय होकर महाशवके रूपमें परिणत हो गया। फिर तो दूसरी पृथ्वीके सदृश वह विशाल शव अशनि एवं वज्रके गिरनेका-सा शब्द करता हुआ आकाशसे भूतलपर गिर पड़ा।
विपश्चितोंमें श्रेष्ठ पुरुष ! इस प्रकार मैंने तुमसे उस महाशवका वर्णन कर दिया। जिस भूमण्डलरूप जगत्में वह शव गिरा था, वही यह जगत् है, जो हमलोगोंके खमनगरके सदृश स्फुरित हुआ है।
भो श्रेष्ठ विपश्चित् ! साधुशिरोमणे ! तुम पुनः प्रकृत व्यवहारके समान स्थिर भूमण्डलमें अपनी अभीष्ट दिशाको चले जाओ। गतिकोविद ! प्रजावर्गके स्वामी इन्द्र स्वर्गलोकमें अपने सौवें यज्ञका अनुष्ठान करना चाहते