संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन * ६५३
हैं। उन्होंने मन्त्रद्वारा मुझे आमन्त्रित किया है, अतः मैं तो वहाँ जाता हूँ।
भास बोले—राजन् ! यह कहकर भगवान् अग्नि अपने स्वरूपसे तो वहीं अन्तर्धान हो गये, परंतु अग्नि-रूपसे वे निर्मल आकाशमें बिजलीकी अग्निकी तरह जाते हुए दीख पड़े। तथा मैं भी चित्तद्वारा अपनी प्राक्तन अविद्याके संस्कारोंको वहन करता हुआ पुनः स्वयं अपने दिगन्तगमनरूप कर्मका निर्णय करनेके लिये आकाशमें भ्रमण करता हुआ स्थित रहा। उस समय आकाशमें मुझे फिर अगणित जगत् दृष्टिगोचर हुए। उनकी रूपरेखाएँ भिन्न-भिन्न थीं तथा उनके आचार-विचार भी अनेक तरहके थे। भूपाल ! उन लोकोंमें कहीं बहुत-से प्राणी एकीभूत हो गये थे, जिससे उनके अङ्ग छत्ते-सरीखे भासित होते थे। उनमें चेतना थी। वे मन्दगतिसे चलते थे और दर्शकोंके हृदयोंको हर लेते थे। ऐसे बहुत-से प्राणी मुझे आकाशमें दृष्टिगोचर हुए। इस प्रकार मैं चिरकालतक देखता रहा, किंतु स्वप्नकालिक मनोमात्र देह होनेके कारण उनका विनाश होते हुए तो देखा; परंतु मुझे अविद्याका अन्त नहीं दीख पड़ा। तब मैं उस दृश्यवर्गसे उद्विग्न हो गया और किसी एकान्त स्थानमें जाकर मोक्षसिद्धिके लिये तपस्या करनेको उद्यत हुआ।
उसी समय इन्द्रने मुझसे कहा—'विपश्चित् ! चित्ता-काशमें तुम्हारे लिये दूसरी मृगयोनि उपस्थित है; क्योंकि तुम्हारी यह चित्-शक्ति चिरकालतक मृगयोनिमें ही संसरण करना चाहती है। इस प्रकार मैने तुम्हारे अवश्यम्भावी वृत्तान्तको देख लिया है। तुम मृगयोनिमें उत्पन्न होकर राजा दशरथकी उस महापुण्यस्वरूपा सभा-में पहुँचोगे। वहाँ मेरे द्वारा कहा हुआ सारा-का-सारा ज्ञान तुम्हारी समझमें आ जायगा। इसलिये अब तुम संसारसे खिन्न होकर भूतलपर मृगयोनिमें जन्म धारण करो। वहाँ तुम्हें इस सम्पूर्ण कल्पित आत्मवृत्तान्तका पूर्णरूपसे स्मरण होगा। पुनः जब मृगयोनिसे मुक्त हो जाओगे, तब तुम्हें पुरुषरूपकी प्राप्ति होगी। उस समय जब ज्ञानाग्निद्वारा तुम्हारा शरीर दग्ध हो जायगा, तब तुम्हारा हृदयस्थ आत्मज्ञान स्फुरित होगा। उस आत्मज्ञानके स्फूरणसे तुम उस अविद्या नामक भ्रान्तिको, जो चिरकालसे तुम्हारे हृदयमें स्थित है, त्यागकर स्पन्दरहित वायुके समान उत्तम निर्वाणको प्राप्त हो जाओगे।'
देवराज इन्द्रके यों कहनेपर उसी समय 'इस वनमें मैं यह मृग हूँ' ऐसी मेरी निश्चित प्रतिभा उद्भूत हुई। तभीसे मैं उसी श्रेष्ठ पर्वतनगर मन्दार-वनके भीतरी कोनेमें तृण और दूर्वाङ्कुरोंका आहार करनेवाला मृग हो गया। रघूद्वह ! तदनन्तर एक समय सीमावर्ती एक सामन्त शिकार खेलनेके लिये वहाँ आया। उसे देखकर मैं भयभीत हो गया और छलाँग मारकर भागा; परंतु उसने आक्रमण करके मुझे पकड़ लिया और घर ले जाकर तीन दिनतक वहाँ रखा। तत्पश्चात् वह तुम्हारे मनोविनोदके लिये मुझको यहाँ ले आया। निष्पाप राम ! यों मैंने अपनी सारी आत्मकथाका, जो संसारकी मायाके समान तथा नाना प्रकारके आश्चर्यरूपी रससे पगी है, तुमसे वर्णन कर दिया। इस प्रकार नाना प्रकारकी शाखा-प्रशाखाओंके विस्तारसे युक्त यह अविद्या अनन्त है। यह आत्मज्ञानके अतिरिक्त और किसी भी उपायसे शान्त नहीं हो सकती।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वह विपश्चित् वहाँ इतना कहकर चुप हो गया, तब उसी क्षण प्रशंसनीय बुद्धिवाले श्रीराम उससे यों बोले।
श्रीरामजीने पूछा—प्रभो ! यदि दूसरेका सङ्कल्परूपभूत मृग अपने आत्मामें दृष्टिगोचर हुआ है तो इससे सिद्ध हुआ कि इसी प्रकार असंकल्प पुरुष दूसरेके सङ्कल्परूप सृष्टिमें वस्तुएँ देख सकता है। परंतु यह कैसे सम्भव होगा—इसे बतलानेकी कृपा कीजिये।