संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विपश्चित्ने कहा—राघव ! पहले जिस जगत्के भूतलपर वह महाशव गिरा था, उसी भूमिपर इन्द्र यज्ञके गर्वसे गर्वीले होकर विचरण कर रहे थे । वहीं आकाशमें महर्षि दुर्वासा ध्यानमग्न होकर बैठे थे । इन्द्रको यह पता नहीं था कि ये मुनि हैं । उन्होंने अज्ञानवश मुर्दा समझकर उन्हें पैरसे ठोकर मार दी । इससे महर्षि दुर्वासा कुपित हो गये और इन्द्रको शाप देते हुए बोले—'देवराज ! तुम जिस भूतलपर जाना चाहते हो, तुम्हारे उस अवनितलको ब्रह्माण्डके समान विशाल एव महाभयंकर शव शीघ्र ही चूर-चूर कर देगा । मुर्दा समझकर जो तुमने मेरा अतिक्रमण किया है, इस कारण मेरे शापसे तुम शीघ्र ही उस पृथ्वीको प्राप्त होओगे ।' वस्तुतः तो एक ( व्यावहारिक ) जगत् न सत् है और न दूसरा ( कल्पित ) जगत् असत् ही है, क्योंकि ये दोनों, जैसी प्रतिभा उदित होती है, तदनुकूल प्रतीत होते हैं । इसलिये इनमें किसे सत् कहा जाय अथवा किसे असत् कहा जाय । अथवा राघव ! इस प्रसङ्गमें मैं तुम्हें एक दूसरी युक्ति बतलाता हूँ, जिससे बात स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगी, उसे सुनो । महाभाग ! जिसमें सब कुछ है, जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं सर्वात्मक एवं सर्वव्यापक है, उस ब्रह्ममें सभी कुछ सम्भव है । इसलिये सर्वात्मामें सङ्कल्पजनित पदार्थ परस्पर मिलते हैं—यह बात अवगत होती है, क्योंकि लोकमें भी देखा जाता है कि जहाँ छाया रहती है, वहीं धूप भी रहता है । ऐसा सम्भव न हो तो उसे सर्वात्मताकी प्राप्ति ही कैसे होगी ? इसलिये सर्वात्मामें संकल्पनगर परस्पर नहीं मिलते हैं—यह भी सत् है और परस्पर मिलते हैं—यह भी सत् है । इस प्रकार जो सत्य नहीं है, उसका अस्तित्व नहीं है और जो मिथ्या नहीं है, वह भी नहीं है; क्योंकि सर्वात्मामें सब कुछ सर्वत्र सर्वथा एवं सर्वदा वर्तमान है ।
रघुनन्दन ! यह ब्रह्मसत्ता ऐसी है, जो स्वयं ही अपनेसे अपना सृजन करती है तथा उसीके प्रभावसे अविद्या सादि एवं अनादिरूपसे अनुभूत होती है । इस ज्ञानदृष्टिसे सभी कुछ क्षणभरमें ही प्रमाणभूत हो जाता है और अन्य दृष्टिसे ऐसा नहीं होता, इसीलिये विद्वान्-लोग ज्ञानदृष्टिसिद्ध वस्तुको ही सारभूत मानते हैं । पूर्ण दृष्टि होनेपर ज्ञानता तथा अज्ञानता एवं सत् और असत्की स्थितिका कुछ भी भेद नहीं है; क्योंकि सत्य ब्रह्ममें सत् और असत्—दोनों एक-से हैं, इसलिये सब कुछ काष्ठवत् मौन अर्थात् चिद्रूप ही है। जो दृश्य है, वह अनन्त है, वही ब्रह्मता है और वही परमपद है, इसलिये यह सब कुछ चिदाकाशमयी सर्गश्री भी सृष्टिके आदिमें स्वप्न-तुल्य शान्त ब्रह्मस्वरूप ही है—यह स्वतः सिद्ध हो जाता है। (सर्ग १५६-१५९)
राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देते हुए सभाको विसर्जित करना, दूसरे दिन सभामें वसिष्ठजीद्वारा कथाका आरम्भ, ब्रह्मके वर्णनद्वारा अविद्याके निराकरणके उपाय, जितेन्द्रियकी प्रशंसा और इन्द्रियोंपर विजय पानेकी युक्तियाँ
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! विपश्चित् यह कह ही रहा था कि सूर्यदेव मानो उस वृत्तान्तका अवेक्षण करनेके लिये अपने दूरतक फैले हुए किरणरूपी पादोंसे दूसरे लोकको चले गये । तब दिनका अन्त सूचित करनेवाला नगाड़ा अपने शब्दसे दसों दिशाओको पूर्ण करता हुआ-सा उसी प्रकार बज उठा मानो संतुष्ट हुई दिशाओंसे जय-जयकारकी ध्वनि आ रही हो । इधर महाराज दशरथ विपश्चित्को अपने राज्यके अनुरूप क्रमशः गृह, स्त्री और धन आदि विभव प्रदान करनेके लिये आदेश देते हुए सिंहासनसे उठ पड़े। फिर तो राजा दशरथ