संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देना * ६५५
श्रीराम और वसिष्ठ आदि सभी सभासदोंने परस्पर क्रमानुसार एक-दूसरेको प्रणाम आदिके द्वारा सत्कार किया और फिर सभा विसर्जित करके वे अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। वहाँ उन्होंने स्नान-संध्या आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर भोजन किया और रात बिताकर प्रातःकाल वे पुनः सभामें आ गये। फिर तो वह सभा पहलेके ही तरह पूर्णरूपसे स्थित हो गयी। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा अपनी किरणोंसे अमृतकी वर्षा करता है, वैसे ही मुनीश्वरने अपने मुखरूपी किरणोंसे आह्लाद उगलते हुए उस यथाप्रस्तुत कथाका क्रमशः वर्णन करना आरम्भ किया।
राजन् ! यह अविद्या नहीं है। यह असत् होती हुई सत्-सी स्थित है। उपर्युक्त प्रकारका महान् प्रयत्न करनेपर भी विपश्चित् उसका निर्णय नहीं कर सका। इस प्रकार जबतक इस अविद्याका पूर्णतया ज्ञान नहीं हो जाता तभीतक यह अनन्त प्रतीत होती है; किंतु पूर्णरूपसे जान लिये जानेपर तो मृगतृष्णा-नदीके समान इसका अस्तित्व ही मिट जाता है।
श्रीरामजीने पूछा—गुरुदेव ! भासद्वारा वर्णित मुनि और व्याधका जो सुख-दुःखादि नाना दशाओंसे युक्त वृत्तान्त है, यह क्या किसी कारणान्तरसे घटित हुआ था या स्वभावज है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यह अपना आत्मा परमात्मारूप महासागर है। इसमें इसी प्रकारके शून्यात्मक प्रतिभासरूप आवर्त निरन्तर अपने-आप स्वाभाविक ही उठते रहते हैं।
श्रीराम ! सत्य वस्तुमें 'यह जाग्रत् है, यह स्वप्न है' इस प्रकारकी जो भिन्नता प्रतीत होती है, उसका उन दोनोंकी समानरूपताका पूर्णरूपसे अनुभव हो जानेपर विनाश हो जाता है। जो जाग्रत् है, वही स्वप्न है और जो स्वप्न है, वही जाग्रत् है; क्योंकि कालान्तरमें 'निश्चय ही यह ऐसा नहीं है' ऐसी बाधबुद्धि दोनोंमें समान होती है। जैसे जीवनपर्यन्त नियमरहित सैकड़ों स्वप्न होते हैं, उसी तरह निर्वाणरहित महान् अज्ञानमें सैकड़ों जाग्रत् भी होते हैं। जैसे लोग उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले बहुत-से स्वप्नोंका स्मरण करते हैं वैसे ही पूर्वजन्मकी स्मृति करानेवाले योगसे सम्पन्न प्रबुद्ध पुरुषोंको सैकड़ों जन्मोंका भी स्मरण होता है। जैसे दृश्य और जगत्—दोनों नित्य ही एकार्थक हैं, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न—ये दोनों शब्द भी एकार्थक कहे जाते हैं।
रघुकुलभूषण राम ! जैसे तरङ्गें नदीके जलमें द्रवरूपसे स्थित हैं, उसी तरह सृष्टिरूपी लहरें चित्स्वभाव (चेतनका सङ्कल्प) होनेके कारण चेतनमें ही स्थित हैं। यह चित्तकी छाया ही 'जगत्' नामसे प्रस्फुरित होती है। यह आकाररहित होते हुए भी मूर्तिमती-सी होकर द्रव्यकी छायाके समान व्याप्त है। आत्मा ही अपना बन्धु है और आत्मा ही अपना शत्रु है। यदि आत्माद्वारा आत्माकी रक्षा न की गयी तो फिर उसकी रक्षाका दूसरा कोई उपाय नहीं है। जीवकी बाल्यावस्थाको ज्ञानहीन होनेके कारण पशुता-सी और वृद्धावस्थाको मृत्यु-तुल्य ही समझना चाहिये। यदि विवेक सम्पन्न हो तो युवावस्था ही उसका जीवन है। इस संसारको, जो बिजलीके कौंधनेके समान चञ्चल है, प्राप्त होकर सद्-शास्त्र-चिन्तन एवं सत्पुरुषोंके सङ्गद्वारा अज्ञानरूपी कीचड़से आत्माका उद्धार करना चाहिये। अहो ! खेद है। ये मनुष्य कैसे क्रूर हैं, जो कीचड़में फँसे हुए अपने आत्माका भी उद्धार नहीं कर रहे हैं। भला, इनकी क्या गति होगी। * जैसे मिट्टीकी
* आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्माऽऽत्मना न चेत् त्रातस्तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥
शैशवं वार्धकं ज्ञेयं तिर्यक्त्वं मृतिरेव च ।
तारुण्यमेव जीवस्य जीवितं तद्विवेकि चेत् ॥
संसारमिममासाद्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ।
सच्छास्त्रसाधुसम्पर्कैः कर्दमात् सारमुद्धरेन् ॥