भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बनी हुई वेताल-सभा उसके रहस्यसे अनभिज्ञ ग्रामीण पुरुषको भय आदि दुःख प्रदान करनेवाली होती है, किंतु जिसे उसके यथार्थ रहस्यका यों ज्ञान हो गया है कि यह मृन्मयी ही है, उसके लिये वह दुःखदायिनी नहीं होती, वैसे ही यह ब्रह्ममयी दृश्यलक्ष्मी अज्ञानीको भयादि क्लेश पहुँचाती है; किंतु 'यह दृश्य ब्रह्म ही है' यों यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वह कष्टदायिनी नहीं होती। इस दृश्यके तत्त्वका परिज्ञान हो जानेसे यह अशान्त होता हुआ भी शान्त तथा स्थित होता हुआ भी विलीन हो जाता है और दृश्यमान होता हुआ भी दिखायी नहीं पड़ता। जैसे अपने स्वप्नकालमें स्पष्टरूपसे अनुभवमें आया हुआ भी स्वाप्न-जगत् उसका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे अथवा जाग जानेसे असत्य ही हो जाता है, वैसे ही चिदाकाशमें अनुभूयमान अतएव सत्य-सी स्थित हुई भी यह सृष्टि तत्त्वका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे केवल शून्यरूप ही अवशिष्ट रह जाती है।

श्रीरामजीने पूछा—मुनिवर ! जब इन्द्रियोंपर विजय पाये बिना इस अज्ञानका उपशमन नहीं होता, तब मुझे यह बतलानेकी कृपा कीजिये कि इन इन्द्रियोंको कैसे जीता जा सकता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! जैसे मन्द दृष्टिवाले पुरुषके लिये सूक्ष्म पदार्थके निरीक्षणमें दीपक उपयोगी नहीं होता, उसी तरह प्रचुर भोगोंमें आसक्त, भौतिक पुरुषार्थ-सम्पादनमें संलग्न, जीविकोपार्जनमें दत्तचित्त तथा इन्द्रियजयविहीन पुरुषके लिये केवल शास्त्रादि साधन उपयोगी नहीं होते। इसलिये तुम इन्द्रियजयमें निमित्तभूत इस युक्तिको अविकल रूपसे श्रवण करो। इस युक्तिके आश्रयसे अपने प्रयत्नद्वारा सम्पादित थोड़ी-सी भी साधन-सम्पत्ति सुखपूर्वक सिद्धिको प्राप्त हो जाती है। इस इन्द्रियरूपी सेनाका चित्त ही सेनापति है, अतः उसपर विजय पा लेनेसे इन्द्रियोंपर स्वतः विजय प्राप्त हो जाती है—ठीक उसी तरह, जैसे जूतेसे सुरक्षित पैरवाले पुरुषके लिये सारी पृथ्वी ही चर्माच्छादित-सी हो जाती है। जो चित्तावच्छिन्न चेतन जीवको संविदाकाशरूप ( ज्ञान-स्वरूप) ब्रह्ममें एकीभूत करके अपने स्वरूपमें स्थित है, उस पुरुषका मन शारदीय कुहरेकी तरह स्वयं ही शान्त हो जाता है। जिसने निरन्तर अपने संवेदन ( ज्ञान ) रूपी प्रयत्नके द्वारा चित्तवृत्तिको विषयरूपी मांससे हटा लिया है, उसे तत्त्वज्ञानियोंका स्वाराज्य पद प्राप्त हुआ ही समझिये। जो स्वधर्मविरुद्ध कार्योंमें आत्मप्रवृत्तिका त्याग करके शम और संतोषका उपार्जन करता हुआ स्थित है, वही जितेन्द्रिय है। जिसका मन अपने अंदर आत्मरसिकता और बाहर नीरसताका अभ्यास करनेमें उद्विग्न नहीं होता, उसका मन शान्त हो जाता है। प्रयत्नपूर्वक भलीभाँति निरोध कर देनेसे मन अपने आश्रय-स्थान ( विषयानुधावनरूप दुर्व्यसन ) का त्याग कर देता है और जब वह चञ्चलतासे निर्मुक्त हो जाता है तब विवेककी ओर मुड़ता है। विवेक सम्पन्न मन उदार आत्मा और विजितेन्द्रिय कहा जाता है। फिर वह भवसागरमें वासनारूपी तरङ्गोके वेगसे विमोहित नहीं होता। इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर वह साधु-समागम और सत्-शास्त्रोंके अनुशीलनसे जगत्को यथार्थरूपसे सत्यब्रह्म-स्वरूप देखने लगता है। उस सत्यब्रह्मके अवलोकनसे संसारभ्रम उसी प्रकार शान्त हो जाता है, जैसे जलका ज्ञान हो जानेपर मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाली जलकी भ्रान्ति मिट जाती है। चेत्यभिन्न चिन्मात्र ही यह जगद्रूपसे स्थित है—ऐसा सत्य बोध जिसे प्राप्त हो गया है, उसे बन्ध-मोक्षकी दृष्टि कहाँसे प्राप्त हो सकती है ? 'अहं' 'त्वं' आदिरूप यह जगत् अविद्यामात्र ही है। यह मिथ्या होनेके कारण शान्त अतएव केवल शून्य-स्वरूपवाला है और चिदाकाशमें ही स्थित है।


अहो बत नराः क्रूरा गतिः केषां भविष्यति ।
कुर्वन्ति कर्दमोन्मग्ने नात्मन्यपि निजोदयम् ॥
( नि० प्र० उ० १६२ । १८, २१ से २३ )