संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * दृश्यजगत्की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ताका प्रतिपादन * ६५७
रघुनन्दन ! जिनका चित्त उस ब्रह्ममें रम गया है और प्राण उसीमें लीन हो गये हैं, वे परस्पर ज्ञानोपदेश करते तथा ब्रह्मविषयक चर्चा करते हुए संतुष्ट होते हैं और आनन्द मनाते हैं । इस प्रकार निरन्तर परमात्मामें युक्तचित्तवाले तथा प्रेमपूर्वक भजन करनेवाले योगियोंको उस बुद्धियोगकी प्राप्ति होती है, जिससे वे उस परमपदको प्राप्त हो जाते हैं।* जब तृणमात्रके संरक्षणमें भी यत्नपूर्वक किया गया साधन ही उपकारी होता है, तब भला, त्रिलोकसमूहका संरक्षण यत्नके बिना कैसे सिद्ध हो सकता है । मनका अङ्कुररूप जो राज्यादि सुख है, वह क्या कोई सुख है ? अर्थात् वह तो अत्यन्त ही तुच्छ है; क्योंकि तत्त्वज्ञानमें पूर्णतया विश्राम प्राप्त हो जानेपर देवराजका पद भी तृणवत् लगने लगता है । जैसे दृश्य-प्रपञ्चमें रत पुरुष सुप्तावस्था अथवा जाग्रदवस्थामें दृश्यको ही देखते हैं, वैसे ही दृश्यसे विरक्त हुए शान्त ज्ञानी महात्मा उस परमपदरूप परमात्माको ही देखते हैं। श्रीराम ! इस परमपदको तुम महान् अभ्यासरूपी वृक्षका फल समझो। यह बिना घोर प्रयत्न किये कभी सिद्ध नहीं हो सकता । यदि अज्ञानी भी मेरे द्वारा कहे गये इस शास्त्रका बारंबार आवृत्तिद्वारा आस्वादन करे, श्रवण करे अथवा वर्णन करे तो वह तत्त्वज्ञानी हो सकता है । विचारपूर्वक मनन किये गये इस उत्तम शास्त्रसे जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, उन ज्ञानोंसे अन्य शास्त्र भी उसी प्रकार रुचिकर लगने लगते हैं, जैसे नमकसे व्यञ्जन । तत्त्वज्ञोंका विषयभूत जो परम ब्रह्म है, वह सभी अवस्थाओंमें भेदादि मलसे रहित सदा एकरस ही रहता है । उसमें कभी किंचिन्मात्र भी द्वैतादि मलका अस्तित्व नहीं रहता । चिदाकाशमें जो यह जगत् स्फुरित होता है, वह चिदाकाशका स्वभाव है, जो सूर्यकी प्रभाके समान इस चिदाकाशमें ही विकसित होता है । (सर्ग १६०-१६५)
दृश्यजगत्की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ता तथा ब्रह्मसे अभिन्नताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्यप्रपञ्चके रूपमें फैला हुआ है । इसलिये ये घट, गड्ढे और पट आदि सब पदार्थ वस्तुतः शुद्ध चैतन्यरूप ही हैं । जैसे स्वप्नमें शुद्ध चेतना ही घट-पटादि पदार्थोंके रूपमें भासित होती है और जैसे जल ही तरङ्गरूपमें प्रतीत होता है, वैसे ही विशुद्ध चेतन-तत्त्व ही इस दृश्यरूपमें प्रकाशित हो रहा है । तत्त्वज्ञ पुरुष घट-पट आदि समस्त भौतिक पदार्थोंको ब्रह्मघन, चैतन्यघन, परमार्थघन और शान्तस्वरूप एकरस आनन्दघनका ही प्रसार मानते हैं । श्रीराम ! आत्मख्याति, असत्ख्याति, अख्याति और अन्यथाख्याति—ये जो शब्दार्थ-दृष्टियाँ हैं, तत्त्वज्ञानी पुरुषके लिये खरगोशके सींगकी भाँति असत् हैं । इनमेंसे कोई कभी भी सम्भव नहीं है । केवल चेष्टाशून्य, शान्तस्वरूप, व्यावहारिक नाम आदिसे रहित, ज्ञाता (साक्षी) परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हैं। वह जो चिन्मय प्रकाशके स्फुरणसे आकाशस्वरूप शरीर (मूर्त जगत्), जो कि बिना दीवालके चित्र-सा पदार्थोंकी सत्तामात्र है, प्रतीत होता है; वास्तवमें अविनाशी ही है। जैसे जलमें तरङ्गैं होती हैं, उसी प्रकार शान्तस्वरूप परमात्मामें सदा और सर्वत्र वह जगत्
* तच्चित्तास्तद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च तन्नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । जायते बुद्धियोगोऽसौ येन ते यान्ति तत्पदम् ॥
(नि० प्र० उ० १६३ । ४०-४१)
कुछ अन्तरसे यही दोनों श्लोक गीता (१० । ९-१०) में आये हैं।