भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चिन्मयरूपसे ही विद्यमान है। जगत् जिस रूपमें प्रतीत हो रहा है, वैसा ही प्रतीत होता हुआ भी चेतनाकाशरूप होनेके कारण न सर्वथा असत् है और न सत् ही है। सारा दृश्य कुछ है और नहीं भी है। सर्वथा अनिर्वचनीय है। जिस रूपमें इस जगत्की स्थिति है, ऐसा ही इसका रूप है, या ऐसा नहीं है, यह सत् है या असत् है—संसारचक्रके विषयमें उठनेवाले इन प्रश्नोंका यथार्थ उत्तर—जगत्का यथार्थ स्वरूप तत्त्वज्ञानी महात्मा ही जानता है, दूसरा नहीं।

रघुनन्दन ! चिन्मय आकाशमें ही जो चिन्मय आकाशका स्फुरण हो रहा है, उसीने उसीको जगत् समझा है। तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् वह जगत् कहाँ टिक पाता है?

पूर्णपरब्रह्म परमात्मासे ही यह पूर्ण ब्रह्ममय जगत् उसके प्रकट न करनेपर भी प्रकट हुआ-सा प्रतीत होता है। यह प्रतीति भी ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही है। जो स्वयं मेरे अनुभवमें आ रहा है, उस आत्मतत्त्वको इस प्रकार अत्यन्त विशदरूपसे बारंबार उच्चस्वरसे प्रकट कर रहा हूँ, तो भी कुछ मन्दाधिकारी लोगोंके भीतर जो मूढ़ता घर किये बैठी है, वह खम्-तुल्य जगत्में 'यह जाग्रत् सत्य ही है' ऐसे विश्वासका आज भी त्याग नहीं कर रही है। यह महान् खेदका विषय है। जो समझदार होनेके कारण तत्त्वज्ञानका अधिकारी है, वह भी उस भ्रान्त धारणाको शीघ्र नहीं छोड़ रहा है। यह कैसा मोह है!

(सर्ग १६६—१६८)


जीवनमुक्त तथा परमात्मामें विश्रान्त पुरुषके लक्षण तथा आत्मज्ञानीके सुखपूर्वक शयनका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिसकी बुद्धि अन्तर्मुखी है—आत्मस्वरूप परमात्मामें लगी हुई है तथा जिसे सुखके साधन सुख और दुःखके साधन दुःख नहीं दे पाते हैं, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे अज्ञानियोंकी चित्तवृत्ति सब ओर फैले हुए विषयभोगोंमें आसक्त हो उनसे दूर नहीं हटती है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन परमात्मामें अविचल निष्ठा रखनेवाले जिस तत्त्वज्ञानी पुरुषकी विवेकशालिनी बुद्धि वहाँसे विचलित नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका चित्त अपनी चपलता छोड़कर चिन्मात्रस्वरूप परमात्मामें विश्राम लेकर वहीं रम गया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका मन परमात्मामें विश्राम लेनेके पश्चात् फिर वहाँसे हटकर इस दृश्यजगत्में नहीं रमता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।

जो विशुद्ध बोधस्वरूप ज्ञानी महात्मा एकमात्र चेतनाकाशमय परमात्माके चिन्तनमें अनायास ही दृढ़तापूर्वक संलग्न होनेके कारण किसी लौकिक सुखका अनुभव नहीं करता है, वह परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। जिसके सभी पदार्थोंके विषयमें सारे संदेह विवेकद्वारा वास्तवमें नष्ट हो गये हैं, वह परमपद-स्वरूप परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। व्यवहारमें लगे होनेपर भी जिसके मनमें कहीं किसी भी पदार्थके प्रति अनुराग या आसक्ति नहीं है, वह परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। जो प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करता है तथा जिसके सभी कार्य कामना और संकल्पसे शून्य होते हैं, वह परमात्मामें विश्रान्त कहा गया है। जिस महापुरुषने विश्रामशून्य, आधाररहित तथा लंबे संसारमार्गमें उसकी चिन्मात्ररूपताका साक्षात्कार करके आत्मामें विश्राम पा लिया है, उसकी सर्वत्र विजय है। जन्म-जरा आदि सांसारिक दुःखसे ऊपर उठकर भवसागरके पार पहुँचा हुआ श्रेष्ठ ज्ञानी महात्मा परम विश्रान्ति-सुखका अनुभव करता हुआ आत्मामें प्रतिष्ठित होता है।

सारे जगत्का अभाव करके परम पूर्णताको प्राप्त हुआ आत्मज्ञानी पुरुष खूब छककर ब्रह्मानन्दमय अमृतका पान करता और सुखसे सोता है; कैसी अद्भुत बात है? आत्मज्ञानी