संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री-पुत्र आदि परिवारका परिचय * ६५९
पुरुष विषयानन्दके अभावमें भी निरतिशय ब्रह्मानन्द पाकर महान् आनन्दमें निमग्न हो जाता है, अविनाशी अद्वैत सुखका अनुभव करता है तथा दूसरे प्रकाशोंसे प्रकाशित न होनेवाले परमात्माके महान् प्रकाशसे सम्पन्न हो सुखसे सोता है; यह कैसी विलक्षण स्थिति है ? जिसके काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि रूप अन्धकारका नाश हो गया है, जो परमात्माके महान् प्रकाशका रसिक बन गया है तथा केवल अमूर्त आनन्दरसमें ही आह्लादका अनुभव करता है, वह आत्मज्ञानी पुरुष ही सुखसे सोता है; यह कितनी अद्भुत बात है ? आत्मज्ञानी पुरुषका जो सुखपूर्वक शयन है, उसमें अनन्त दुःखोंके अनुभवके विषयमें वह विरत होता है और वर्णाश्रमोचित व्यवहारमें लोकसंग्रहके लिये वह लगा रहता है—उससे विरत नहीं होता । बाह्य पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नहीं होती है तथा वह आन्तरिक सुखका निरन्तर अनुभव करता रहता है । जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा स्थूलसे भी स्थूल है, उस आत्माको चिदाकाशरूपी शय्यापर सुलाकर आत्मज्ञानी पुरुष अपूर्व सुखसे सोता है । इस हमारे जगत्को अपने आत्मस्वरूप चेतनाकाशके एक कोनेमें खप्रके समान देखता हुआ वह विशद चिदाकाशस्वरूप आत्मज्ञानी पुरुष सुखसे सोता है । लोकपरम्पराके अनुसार प्राप्त व्यवहाररूप मनोरम तृणराशिसे निर्मित चटाईपर विश्रामको प्राप्त हुआ आत्मज्ञानी पुरुष सुखपूर्वक सोता है । ( सर्ग १६९ )
जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री, पुत्र आदि परिवारका परिचय तथा उस मित्रके साथ रहनेवाले उस महात्माके स्वभावसिद्ध गुणोंका उल्लेख, तत्त्वज्ञानीकी स्थिति, जगत्की ब्रह्मरूपता तथा समस्त वादियोंके द्वारा ब्रह्मके ही प्रतिपादनका कथन
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जीवन्मुक्त पुरुषका मित्र कौन है जिसके साथ वह क्रीडा करता है ? उसकी क्रीडाका क्या स्वभाव है ? अपने आत्मस्वरूपमें अवस्थिति ही उसकी क्रीडा है अथवा रमणीय भोग-स्थानोंमें विहार करनेसे जो प्रसन्नता प्राप्त होती है, उसीको वह अपनी क्रीडा समझता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जो अपना परम्परा-प्राप्त सहज कर्म है, जो लोकसंग्रहके लिये किया जाने-वाला अपना शास्त्रीय कर्म है तथा जो प्रयत्नसे अभ्यासमें लाया गया सत्-शास्त्रोंका अभ्यास, विचार, सत्संग, शम, दम, तितिक्षा, उपरति, शौच, संतोष, ईश्वर-ध्यान और संयम आदि अपना कर्म है—ये तीनों प्रकारके कर्म, जो निन्य या निषिद्ध नहीं हैं, वास्तवमें एक ही हैं । केवल उपाधिभेदसे तीन नामोंद्वारा कहे गये हैं । वह एकमात्र त्रिविध कर्म ही जीवन्मुक्त पुरुषका स्वाभाविक मित्र है । वह मित्र पिताके समान आश्वासन देनेवाला, स्त्रीके समान लज्जाद्वारा अकर्तव्यसे रोकनेवाला तथा जिनका निवारण करना कठिन है, ऐसे संकटोंमें भी सदा साथ देनेवाला है । उसके सेवनमें किसी प्रकारकी शङ्काके लिये स्थान नहीं है । वह परमानन्दकी सिद्धिमें पूर्ण सहायक है तथा क्रोधके अवसरोंपर भी कोपरहित होनेके कारण सान्त्वनारूप अमृत प्रदान करनेवाला है । ऐसे स्वकर्म नामक अपने सखीक मित्रके साथ वह जीवन्मुक्त पुरुष स्वभावसे ही रमता है, किसी दूसरेसे प्रेरित होकर नहीं ।
श्रीरामजीने पूछा—मुनीश्वर ! उसके इस मित्रकी स्त्री और पुत्र आदि कौन है तथा उनका स्वरूप क्या है ?—उनमें कौन-कौन-से गुण हैं ? यह संक्षेपसे ही मुझे बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महामते ! इस स्वकर्म नामक मित्रके 'स्नान,' 'दान,' 'तप' और 'ध्यान' नामवाले चार महात्मा पुत्र हैं । उनके सद्गुणोंसे सारी प्रजा उनमें