भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भलीभाँति अनुरक्त रहती है। इसकी पत्नीका नाम 'समता' है, जो इसे बहुत ही प्रिय है। वह सदा अपने प्रियतमकी हृदयवल्लभा होकर रहती है। चन्द्रलेखाके समान दर्शन-मात्रसे ही लोगोंको आह्लाद प्रदान करती है। सदा संतुष्ट रहती और प्रियतममें अनुराग रखती है। करुणाके कारण सब ओर अपना वैभव बाँटती रहती है। चित्तको चुरा लेनेवाली और आनन्दकी जननी है। सदा पतिके साथ रहती और कभी अलग नहीं होती है। साधो ! जो सदा धैर्य और धर्ममें लगायी जाती है, वह 'बुद्धि' ही इस समता रानीकी प्रतीहारी (द्वारपालिका) है। वह सदा उसके सामने विनम्र रहकर उसे सुख देनेमें तत्पर रहती है। वह उस धर्म-धुरन्धर धन्यभागी वीर पुरुषके आगे-आगे दौड़ती है। इस महातेजस्वी राजाके मित्रकी दूसरी स्त्री 'मैत्री' है, जो राज्यपर बढ़े हुए शत्रुओंको पराजित करनेके लिये राजाको उचित मन्त्रणा प्रदान करती है। वह सदा 'समता'के साथ राजाके कंधे-से-कंधा भिड़ाकर चलती है। इसके सिवा इन माननीय नरेशको आर्य-मर्यादारूपी समस्त कार्योंके विषयमें बड़ी चतुराईके साथ उपदेश देनेवाली आचार्यस्वरूपा 'सत्यता' इसका स्वार्थ सिद्ध करनेवाली धनाध्यक्षा है। इस तरहके उत्तम परिवारवाले मित्र एवं मन्त्रीरूप अपने कर्मके साथ सर्वत्र व्यवहार निर्वाह करता हुआ जीवन्मुक्त पुरुष न तो लौकिक लाभमें हर्ष मानता है और न हानि होनेपर कुपित ही होता है। निर्वाण मोक्षमें मन लगाये रहने-वाला वह मननशील मुनि युद्धादि व्यवहारमें तत्पर होनेपर भी चित्रलिखित योद्धाकी भाँति ज्यों-का-त्यों ही निर्लेप स्थित रहता है। निरर्थक वादविवादोंमें वह पत्थरकी प्रतिमाकी भाँति मूक बना रहता है। बेमतलबकी बातोंको सुननेमें वह परले सिरेका बहिरा बना रहता है। लोकाचारके विरुद्ध सभी कर्मोंमें मुर्देके समान निश्चेष्ट होता है और सदाचारका विवेचन करते समय वह सहस्र जिह्वावाले वासुकि एवं देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता बन जाता है। उसकी वाणीसे सदा पवित्र चर्चा ही प्रकट होती है। अपने या दूसरोंके कुटिलतापूर्ण दोषोंको वह शीघ्र ही ताड़ लेता है। वस्तुविषयक अत्यन्त दुरूह संदेहका भी पलक मारते-मारते निर्णय करके शीघ्र ही उसके स्वरूपका विवेचन कर देता है। उसकी दृष्टिमें समता और हृदयमें उदारता होती है। वह दानवीर होनेके कारण सबको यथायोग्य धन वितरण करता है। उसका स्वभाव कोमल, स्नेहमय और मधुर होता है। वह सुन्दर एवं पुण्यकीर्ति होता है। जिनकी बुद्धि प्रबुद्ध—तत्त्वज्ञानके प्रकाशसे आलोकित है। वे प्रयत्नसे ऐसे नहीं बनते हैं। जैसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि आदि कभी दूसरेकी प्रेरणासे प्रकाशित नहीं होते, वह प्रकाश उनका स्वाभाविक गुण होता है, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुषोंका यह स्वभावसिद्ध गुण बताया गया है।

शान्त तत्त्वज्ञानी पुरुष चलते-फिरते, खड़े होते, जागते और सोते समय भी सदा एकमात्र सच्चिदानन्द परमात्मामें ही समाहित रहता है। जो भेदमें भी अभेदनिष्ठ है, दुःखमें भी सुखमयी स्थितिवाला है और बाह्य संसारमें रहकर भी अन्तर्मुख होनेके कारण संसारमें नहीं है। ऐसे ज्ञानी महात्माके लिये दूसरा कौन-सा कर्तव्य या प्राप्तव्य शेष रह जाता है ? बाहरके कार्य—व्यवहार करता हुआ भी तत्त्वज्ञ पुरुष हृदयसे न तो कुछ त्याग करता है और न ग्रहण ही करता है। वह सदा अकार्य नित्य परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है। ज्ञानीपुरुष अज्ञानके आवरणसे मुक्त होता है। उसका अन्तःकरण सदा शान्ति और आनन्दका ही अनुभव करता है। उसके शत्रु-मित्रादि-विषयक विकल्प नष्ट हो जाते हैं। उसमें आत्मसुखस्वरूप सार वस्तुकी ही प्रचुरता होती है तथा वह सदा परम शान्तिरूप अमृतसे तृप्त रहता है।

चारों ओर सुन्दर जगत्के रूपमें यह परब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है। वह स्फुरण और अस्फुरण (सृष्टि