भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका खण्डन * ६६१

और प्रलयकाल) मे भी अपने निर्विकार स्वरूपमें ही अकेला स्थित रहता है। दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें भासित होकर भी निर्मल, प्रशान्त चेतनाकाशरूप ही है। परंतु अज्ञानियोंकी दृष्टिमें अनादिकालसे प्रलय और सृष्टिके उदयरूपसे ही उदित है।

अज्ञ जनताके निश्चयको छोडकर तत्त्वज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें ज्यों-का-त्यो स्थित हुआ यह जगत् सदा निर्विकार ब्रह्मरूप ही है। यदि तरङ्ग चेतन हो और वह युक्तिसे यह समझ ले कि मै तरङ्ग नहीं, जल ही हूँ तो उसकी तरङ्गता कैसे रह सकती है ? वेदान्तियों, जैनियों, सांख्यवादियों, बौद्धों, व्यास आदि आचार्यों, पाशुपतों तथा वैष्णव आदि आगमोंने भलीभाँतिसे प्रतिपादन करके जो-जो दृष्टिकोण उपस्थित किये हैं, उन सबके रूपमें भी हमारा प्रतिपाद्य ब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है। उन्होने अपनी-अपनी दृष्टिसे विभिन्न नामोद्वारा उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है। उन वादियोंके अपने-अपने निश्चयके अनुसार पारलौकिक ऐहलौकिक सुख-रूप सारे फलोंके रूपमें वह ब्रह्म ही उपलब्ध होता है। ब्रह्मकी ऐसी ही महिमा है; क्योंकि उसका स्वरूप सर्वात्मक है। (सर्ग १७०—१७३)


निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका खण्डन, चिदाकाशके ही जगद्रूपसे स्फुरित होनेका कथन, ब्रह्मके उन्मेष और निमेष ही सृष्टि और प्रलय हैं, मन जिसमें रस लेता है वैसा ही बनता है, चिदाकाश अपनेको ही दृश्य-रूपसे देखता है तथा अज्ञानसे ही परमात्मामें जगत्की स्थिति प्रतीत होती है—इसका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टियाँ ब्रह्मरूपी समुद्रकी तरङ्ग हैं। उनमें चैतन्य ही जल है। जीवन्मुक्तोके अनुभवमें आनेवाला यह चिन्मय जगत् अज्ञानियोके दुःखमय जगत्से भिन्न है। वह सच्चिदानन्दमयी दूसरी ही सृष्टि है। उसमें द्वैत और एकत्व आदिके दुःखमय भेद किस निमित्तसे रह सकते हैं ? दृश्यका अत्यन्ताभावरूप जो बोध है, उसीको परमपद कहा गया है। वही ब्रह्म है और 'वह ब्रह्म मै हूँ' इस प्रकारका ज्ञान मोक्ष है। ब्रह्म ही सब कुछ है। (क्योकि 'सर्वंमभवत्' इस श्रुतिसे यही बात सिद्ध होती है) तथा वह कुछ भी नहीं है। (क्योंकि 'नेति-नेति' कहकर श्रुतिने इसीका समर्थन किया है)। रघुनन्दन ! ज्ञानी पुरुष ब्रह्मको इसी रूपमें जानता है। सम्यक् ज्ञानसे परम निर्वाणरूप मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है। उसमें ज्यों-का-त्यों स्थित हुआ यह सारा विश्व अत्यन्त प्रलयको प्राप्त हो जाता है। वहाँ न अनेकत्व है, न एकत्व; न कुछ है, न कोई है। वह समस्त सदसद्भावोंकी सीमाका अन्त कहा गया है। जहाँ दृश्यकी सत्ता अत्यन्त असम्भव है, जो शुद्ध बोधका उदय रूप है, जहाँ समस्त विक्षेपोका अभाव हो जाता है तथा जो निरतिशयानन्दरूपसे स्थित और परम शान्त है, उस चिन्मय परमात्माको ही परमपद समझना चाहिये।

यह परमात्मा जबतक अज्ञान रहता है, तभीतक अविद्या-रूप मलकी स्थिति है। उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर सब कुछ विशुद्ध परब्रह्म ही है, यह अचल निश्चय हो जाता है। जो अनादि, अनन्त, चिन्मय परमाकाशरूप है, उस परमात्मामें मल कहाँसे हो सकता है (क्योकि ज्ञान होते ही अविद्यारूपी मल घुल जाता है)। प्रिय श्रीराम ! विचारदृष्टिसे देखा जाय तो कुछ भी स्फुरित नहीं होता है; क्योकि यह परम चेतन तो अत्यन्त विशुद्ध कहा गया है। जो एकमात्र सच्चिदानन्दमय है, उसका अपने आपमें कल्पित संकल्प ही इस दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें फैला हुआ है। वास्तवमें तो परब्रह्ममे न पृथ्वी आदि भूत हैं, न शरीर है और न चैतन्यसे भिन्न दूसरा ही कोई दृश्यभाव है; किंतु एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही अपने संकल्पद्वारा