संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
समष्टि मनोरूप होकर जगत्के आकारमें बारंबार स्फुरित हो रहा है । विचारदृष्टिसे देखनेपर यह जगत्का स्फुरण भी कुछ नहीं है । केवल सच्चिदानन्दघन ही स्वयं अपने स्वरूपमें भासित हो रहा है । जहाँसे वाणीं लौट आती है, उस निरतिशयानन्दमय परमपदकी प्राप्तिसे तूष्णीम्भाव—स्वरूपभूत निश्चञ्चता ही शेष रहती है ( वह निश्चञ्चता व्यवहारकालमे भी नहीं हटती है ) । जीवन्मुक्त पुरुष संसारके व्यवहारमे तत्पर रहता हुआ भी शुद्ध चिदाकाशरूप ही होता है और उसी रूपमें वह मुक्तवत् स्थित रहता है । ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! चिदाकाश, ब्रह्म, चिन्मात्र, आत्मा, चिति, महान् और परमात्मा—इन सब शब्दोंको पर्यायवाची ( समानार्थक ) ही समझना चाहिये । ब्रह्म नेत्रकी भाँति उन्मेष और निमेषरूप है अथवा वायुके समान स्पन्द और अस्पन्दरूप है । उसका जैसा प्रलयरूप निमेष है, वैसा ही सृष्टिरूप उन्मेष भी है । इन्हींका नाम जगत् है । उसने आँखें खोलीं तो संसारकी सृष्टि हो गयी और आँखें बंद कीं तो जगत्का प्रलय हो गया । परंतु वह परब्रह्म परमात्मा निमेष और उन्मेष—दोनों अवस्थाओमें एकरूप ही रहता है । सौम्य रघुनन्दन ! इस कारण यह सम्पूर्ण जगत् जिस रूपमें स्थित है, इसी रूपमें इसे शान्त, अजन्मा, अजर, सभी अवस्थाओंमें सत् और चिदाकाशरूप ही समझना चाहिये ।
जिसका चित्त जिस वस्तुमें रस लेता है, उसका वह चित्त वैसा ही हो जाता है । अतः एकमात्र परब्रह्म परमात्माका रसिक हुआ जो ज्ञानीका मन है, वह ब्रह्मभाव को ही प्राप्त हो जाता है और जिसका मन जिसमें रस पाता है, उसने उसीको सत् समझा है । जिसकी ज्ञानदृष्टिमें दृश्य-अदृश्य, सत्-असत् तथा मूर्त-अमूर्त सब कुछ ब्रह्म ही है, उसकी दृष्टिमें यहाँ अथवा और कहीं भी न तो कर्त्ता-भोक्ता जीवकी सत्ता है और न उसका अभाव ही ( क्योंकि एकमात्र वही ब्रह्मरूपसे शेष रह जाता है ) ।
सहस्रों वादी मिलकर भी सत्से अतिरिक्त वस्तुकी सत्ताका उपपादन नहीं कर सकते तथा उससे भिन्न जगत्का कोई यथार्थ कारण नहीं उपलब्ध होता । इसलिये स्वतः यह बात सिद्ध हो गयी कि आदिकालसे ही चिदाकाश अपने आपको ही दृश्यरूपसे देखता है ।
जैसे स्वप्नमें स्वयं चिन्मय जीवात्मा ही स्वप्न-जगत् के रूपसे भासित होता है, वैसे ही यहाँ सृष्टिके आरम्भ में चिदाकाशके सिवा इस दृश्यका अन्य कोई कारण नहीं पाया जाता । ( सर्ग १७४-१७६ )
सृष्टिकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें कोई अज्ञानी है ही नहीं ( वह एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुको देखता ही नहीं है ) । अतः जिसका अस्तित्व ही नहीं है, ऐसे आकाश-वृक्षके सदृश अज्ञानीके विषयमें विचार करना कैसा होगा ? अज्ञानका बोधस्वरूप आत्माके ही भीतर भान होता है; अतः वही उसका अधिष्ठान है । जगत् अज्ञानका अङ्ग है, अतः अज्ञानरूप ही है । जैसे स्वप्न और सुषुप्ति—दोनों निद्राके अन्तर्गत होनेसे निद्राके ही अङ्ग हैं; इसलिये उन्हें केवल निद्रारूप ही कहा जा सकता है, वैसे ही जगत्का स्वरूप भी अपने अधिष्ठानभूत चिन्मय परमात्मासे भिन्न नहीं है । जैसे शुद्ध जलराशिमें लहर, भँवर और द्रवता आदिके रूपमें जल ही प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्ममें सर्ग नामक ब्रह्म ही भासित होता है । जैसे निर्मल वायुमें स्पन्दन, आवर्त्त और विवर्त्त आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मरूप वायुमें सृष्टिरूपी स्पन्दन भासित होता है । जैसे महाकाशमें अनन्तता, छिद्रता और शून्यता आदि