संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना * ६६३
आकाशरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सृष्टि भी परात्पर ब्रह्मरूप ही है। जैसे निद्रा आदिमे स्पष्टरूपसे उपलब्ध होनेपर भी ये सारे स्वप्नगत पदार्थ असन्मय ही हैं, उसी प्रकार ये सृष्टिके पदार्थ भी हैं, अतः इनकी सत्ता नहीं है। परंतु सत्स्वरूप परमात्मामें उपलब्ध होनेके कारण उससे अभिन्न ही हैं। जैसे निद्राकालमें मनुष्य एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थित होता है, वैसे ही अजन्मा परमात्मा अपनी सत्तामें ही एक सर्गसे दूसरे सर्गके रूपमें स्थित होते हैं। जैसे साम्प्रतिक सर्वदर्शनरूप परमात्मामें वर्तमान घट, पट आदि शब्द और उनके अर्थ स्थित हैं, उसी प्रकार अद्वितीय महाचैतन्यरूप परमात्मामें भूत और भविष्य कालकी सारी सृष्टियाँ स्थित हैं। जैसे परमात्मामें ही सृष्टिरूप परमात्माका भान होता है, वैसे ही चितिमें ही चिन्मय शब्द और उनके अर्थभूत सर्गोंका चितिके द्वारा ही भान होता है।
इस जगत्में न कोई आकृति है, न संसार है, न संसारका अभावरूप मोक्ष है, न जन्म है, न नाश है, न सत्ता ( भावविकार ) है और न असत्ता ही है। केवल परम शान्त ब्रह्मका ही अपने आपमें स्फुरण होता है अथवा यहाँ ब्रह्मसे भिन्न किसी प्रकारका स्फुरण भी नहीं है। यद्यपि ब्रह्म अनेकानेक सृष्टिरूपी पुतलियोंके समुदायसे भरा हुआ है, तथापि वस्तुतः उसमें जगतरूपी लताएँ, उनकी चोटियाँ, जड़ें, उनकी रचनाएँ और उनकी जड़ोंका भूमिमें प्रवेश—ये सब अलभ्य हैं। वह आदि-अन्तसे रहित है, कालके द्वारा भी उसके जन्म और नाश नहीं होते तथा वह पूर्णरूपसे विशुद्ध एवं सच्चिदानन्दघन है।
चिन्मय प्रकाशरूप परमार्थकाश ही, जो सब पदार्थोंसे रहित है, स्वप्नकी भाँति द्रष्टा, दृश्य और दर्शन रूपसे प्रतीत हो रहा है। इसलिये यह जगत् एकमात्र चेतनाकाश ही है। आकाशमें भ्रमवश होनेवाली वृक्षसमूहोंकी स्फुरणाके समान ब्रह्मरूपी समुद्रमें जो नाम-रूपात्मक जलकणोंका स्फुरण हो रहा है, वही यह सृष्टि है। आकाशमें जो वृक्षसमूहकी प्रतीति होती है, वह तो आकाशसे भिन्न-सी लगती है; क्योंकि उसमें आकाशकी शून्यता नहीं दिखायी देती। परंतु परमब्रह्मरूपी महासागरमें जो सृष्टिरूपी जलबिन्दु विद्यमान हैं, वे उससे किंचिन्मात्र भी भिन्न नहीं हैं।
( सर्ग १७७-१७९ )
श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना और वसिष्ठजीके पूछनेपर कुन्ददन्तका अपने संशयकी निवृत्ति तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिको स्वीकार करते हुए अपना अनुभव बताना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मेरे मनमें एक संदेह है, आप उसका निवारण कीजिये। एक दिनकी बात है, मैं विद्यामन्दिरके भीतर विद्वानोंकी सभामें बैठा था। उसी समय विदेह जनपदसे वहाँ एक श्रेष्ठ तपस्वी श्रीसम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण आया। आकर उसने उस ब्राह्मणसभाको प्रणाम किया। फिर जब वह एक आसनपर बैठा, तब मैने भी उठकर उसे प्रणाम किया और पूछा—'ब्रह्मन् ! आप लंबा रास्ता तय करके आये हैं; इसलिये थक गये होगे। किसी विशेष उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यत्नशील-से दिखायी देते हैं। बताइये, आज कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है?'
ब्राह्मणने कहा—महाभाग ! आपका कहना ठीक है। मैं अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विशेष प्रयत्नशील हूँ। यहाँ जिस प्रयोजनसे आया हूँ, उसे भी सुन लीजिये। मैं विदेह देशका ब्राह्मण हूँ और विद्याध्ययन कर चुका हूँ। मेरे दाँत कुन्दके फूलकी भाँति उज्ज्वल