भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हैं; इसलिये मुझे लोग 'कुन्ददन्त' कहते हैं। एक दिन मेरे मनमें संसारसे वैराग्य हुआ और मैं भ्रमजनित क्लेशकी शान्तिके लिये देवताओ, ब्राह्मणो तथा मुनीश्वरोंके स्थानोंमें भ्रमण करने लगा। तब श्रीपर्वतपर एक तपस्वीसे भेंट होनेपर वे मुझे गौरी-आश्रममें स्थित वृद्ध तपस्वीके पास ले गये। वृद्ध तपस्वीने श्रीपर्वतवासी तपस्वीकी, उनके सात भाइयोकी, उन सबके तपकी, वरदान और शापकी एवं घरके अंदर ही उन सातोंके सप्तद्वीपाधिपति होकर अन्तमें प्रलय-कालमें विलीन होनेकी बाते बतायीं। तदनन्तर उन आठवें अपने मित्र तपस्वीकी मृत्युसे दुखी हुआ मै उन कदम्ब वृक्षके नीचे रहनेवाले तपस्वीके पास गया। वे तीन मास प्रतीक्षा करनेके बाद समाधिसे विरत हुए। तब मैने नम्रतापूर्वक उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया। इसपर वे इस प्रकार बोले।

कदम्ब वृक्षके नीचे रहनेवाले तपस्वीने कहा—निष्पाप ब्राह्मण ! मैं समाधिसे विरत होकर एक क्षण भी नहीं रह सकता; अतः शीघ्र ही बड़ी उतावलीके साथ मैं फिर समाधिमें ही प्रवेश करूँगा। इस समय मेरा वास्तविक उपदेश भी अभ्यासके बिना तुम्हें नहीं लगेगा। इसलिये दूसरी युक्ति सुनो और वैसा ही करो। अयोध्या नामसे प्रसिद्ध जो पुरी है, वहाँ दशरथ नामक राजा राज्य करते हैं। उनके पुत्र श्रीराम नामसे विख्यात हैं। तुम उन्हींके पास चले जाओ। उनके कुलगुरु मुनिवर वसिष्ठ सभामें मोक्षके उपायकी दिव्य कथा कहेंगे। ब्रह्मन् ! चिरकालतक उस कथाको सुनकर तुम भी मेरी ही भाँति पावन परमपदमें विश्राम प्राप्त करोगे।

ऐसा कहकर वे तापस मुनि समाधिरूपी अमृतके महासागरमें निमग्न हो गये और मै इस देशमें आपके पास आया हूँ।

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—गुरुदेव ! वही यह कुन्ददन्त नामक द्विज है, जिसने मेरे पास बैठकर यहाँ मोक्षोपाय नामक इस सम्पूर्ण संहिताको सुना है। आप इससे पूछिये। इसका संशय निवृत्त हुआ या नहीं।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठने कुन्ददन्तकी ओर देखकर पूछा—'निष्पाप विप्रवर कुन्ददन्त ! कहो, क्या तुमने मेरे इस उत्तम मोक्षदायक उपदेशको सुनकर ज्ञेय तत्त्वको जाना?'

कुन्ददन्त बोला—भगवन् ! समस्त संशयोंका विनाश करनेवाला मेरा चित्त ही इस समय मेरी विजयका सूचक है। मेरे सारे संदेहोंकी निवृत्ति हो गयी और मैने अवश्य जाननेके योग्य अखण्ड ब्रह्मतत्त्वको जान लिया। विशुद्ध ज्ञेय तत्त्वका मुझे ज्ञान हो गया। मैने क्षयरहित द्रष्टव्य वस्तुका दर्शन कर लिया और पाने योग्य सब कुछ मैं पा गया। इस समय ब्रह्मरूप परमपदमें विश्राम कर रहा हूँ। मैने आपके मुखसे सुनकर चिन्मय परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लिया। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब परमार्थ सच्चिदानन्दघनरूपी मेघ है, जो चिन्मय आकाशमें अपनेसे अभिन्न जगत्के रूपमें छाया है। सर्वात्मक होनेके कारण सर्वरूपी सर्वव्यापी परमात्माका सर्वत्र, सदा सबके द्वारा और सब कुछ होना पूर्णरूपसे सम्भव है। सरसोंके एक दानेके छिद्रके भीतर असंख्य ब्रह्माण्डोंका किस प्रकार होना सम्भव है और किस प्रकार उनका होना कदापि सम्भव नहीं है, यह सब मैने पूर्णरूपसे समझ लिया। जो-जो वस्तु जब जिस रूपमें यहाँ भासित होती है और सम्पूर्ण प्राणियोंके अनुभवमें आती है, वह-वह उस समय उस रूपमें केवल सर्वघन परमात्मा ही है। इस तरह विचार करनेसे सिद्ध हो जाता है कि सब कुछ आदि-अन्तसे रहित एक नित्य विज्ञानानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है।

(सर्ग १८०—१८४)

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