भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है * ६६५


सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है, वह ब्रह्मका संकल्प होनेसे उससे भिन्न नहीं है; जीवात्माको अज्ञानके कारण ही जगत्‌की प्रतीति होती है—इसका प्रतिपादन

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कुन्ददन्तके इस प्रकार कहनेपर प्रशंसनीय महात्मा भगवान् वसिष्ठ मुनिने यह परमार्थोचित वचन कहा ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—हर्षकी बात है कि महात्मा कुन्ददन्तको शास्त्रश्रवणसे विज्ञानानन्दघन परमात्मामें विश्राम प्राप्त हो चुका है। सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म ही है—इस तत्त्वको ये हाथपर रखे हुए आँवलेकी तरह देख रहे हैं। निश्चय ही भ्रममात्र जिसका स्वरूप है, ऐसा यह विश्व इन्हें अजन्मा ब्रह्म ज्ञात होने लगा है। भ्रान्ति इनके लिये ब्रह्मरूप ही हो गयी है। वही ब्रह्म जो शान्त, एक और निर्विकार है। जो जैसे, जिसके द्वारा, जहाँ, जिस प्रकारका, जितना, जब और जिस हेतुसे है, वह वैसे, उसके द्वारा, वहाँ, उस प्रकारका, उतना, उस कालमें और उसी हेतुसे कल्याणमय, शान्त, जन्मादिरहित, मौन, अमौन, अजर, सर्वव्यापी, सुशून्य, अशून्य, आदि-अन्तसे रहित एवं अक्षय ब्रह्म ही है। व्यवहारमें ब्रह्म स्वयं दृश्य, स्वयं द्रष्टा, स्वयं चेतन, स्वयं जड़, स्वयं सब कुछ और स्वयं कुछ भी नहीं है। वास्तवमें वह सच्चिदानन्द परमात्मा अपने आपमें ही स्थित है। दृश्यजगत् ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही दृश्यजगत् है। यह न तो शान्त है, न अशान्त है; न निराकार है और न साकार ही है ।

जैसे जागनेपर स्वप्न आदि निराकार भासित होते हैं, वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार हो जानेपर यह शरीर भी निराकार ही प्रतीत होता है। चैतन्यमात्र ही इसका स्वरूप है। यह स्वप्नकी भाँति अनुभवमें आनेपर भी असत् ही है। ये भ्रमवश दिखायी देनेवाले सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदि भाव वास्तवमें नहीं हैं। जैसे चित्रलिखित चित्रवधू चित्रसे अतिरिक्त नहीं है, वैसे ही यह दृश्यमान जगत् परमात्मासे भिन्न नहीं है। जैसे चित्रकारद्वारा बनायी जानेवाली चित्रगत सेना बुद्धिस्थ चित्रसे भिन्न नहीं है, वैसे ही ब्रह्मकी चित्ता-दशामें मूर्त सृष्टि नाना रूपोंमें प्रतीत होती हुई भी उससे भिन्न न होनेके कारण नानात्वसे रहित है।

रघुनन्दन ! जैसे समुद्रमें जलराशिका स्फुरण होनेपर ही उसमें भँवर उठते हैं, उसी प्रकार विशुद्ध चिदाकाशका अपने सत्यसंकल्पके अनुसार जो स्फुरण है, उसीको जगत् कहते हैं । परमात्मचैतन्यमें समुद्रमें जलराशिकी भाँति वस्तुतः चिदात्मक जगद्भावोंका जो अकस्मात् भान होता है, उसे मनीषी पुरुष संकल्प आदि नाम देते हैं। कालसे, अभ्यासयोगसे, विचारसे, समभावसे, जातिकी सात्त्विकतासे और अन्तःकरणके सात्त्विक एवं निर्मल होनेसे सम्यग्ज्ञानसम्पन्न यथार्थदर्शी तत्त्वज्ञ पुरुषकी बुद्धि द्वैत और अद्वैतसे रहित चिन्मात्रस्वरूप हो जाती है । चिदाकाशरूप परमात्मा चिदाकाशमें ही स्फुरित होनेवाले अपने इस रूपको—द्रष्टा-दृश्यरूप जगत्‌को देखता हुआ सदा साक्षीरूपसे प्रकाशित होता है। वह उससे भिन्न नहीं है। एक चेतनसत्ताके उपजीवी होनेसे द्रष्टा और दृश्य दोनों एक हैं; क्योंकि चिदाकाश सर्वव्यापी है। जैसे शून्यत्व और आकाशमें कोई भेद नहीं है, उसी तरह जगत् और ब्रह्ममें भी भेद नहीं है ।

श्रीराम ! सृष्टिके आरम्भकालमें परमात्माके मनमें अपने प्रकृतिसहित विलीन हुए प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मवासनानुसार जो कुछ नियत रूपसे भान हुआ, वह जैसा था और जिस प्रकारके कार्य-कारणभावसे स्थित था, वह आज भी उसी रूपमें स्थित है और वही जगत् कहलाता है । सर्वशक्तिमान् परमात्माको जिस-जिसका जैसे संकल्प होता है, वह-वह उसी रूपमें हो जाता