संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
है। सत्यसंकल्प परमात्माकी संवित् (अनुभूति) मात्ररूप है। अतः उसे जिस वस्तुका भान हुआ, वह अभानरूप कैसे हो सकता है ?
रघुनन्दन ! चेतन जीवकी जो उत्पत्ति बतायी गयी है, उसका अभिप्राय इतना ही है कि जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, यह बात समझमें आ जाय। जीवकी उत्पत्ति वास्तविक है, यह बताना अभीष्ट नहीं है। वस्तुतः चेतनस्वरूप जीव चिन्मय परब्रह्म परमात्माका अंश है; इसलिये कृत्रिम नहीं है। किंतु अज्ञानसे चेत्य अर्थात् दृश्य जगत्की ओर उन्मुख हो जानेके कारण ही वह जीव शब्दसे कहा जाता है। जीवनसे अर्थात् प्राण और कर्मेन्द्रियोंको धारण करनेसे तथा चेतनसे अर्थात् ज्ञानेन्द्रियोंको धारण करनेसे वह जीव कहलाता है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस यथार्थ आत्मस्वरूपको भूलकर चिन्मय जीवात्मा जब यह देखने लगता है कि मैं यह मनुष्य आदि शरीर हूँ और यह पृथ्वी आदि मेरा आधार है, तब वह उसीमें दृढ़ आस्था बाँध लेता है। असत्यमें सत्यबुद्धि करके ही जीव भावनावश बँध जाता है और अपने भीतर बारंबार भावना एवं नानात्व-का अनुसरण करने लगता है। जो जिसमें अत्यन्त आसक्त होगा, वह उसे क्यों न देखेगा ? जगत्की जो भ्रान्ति हो रही है, वह असत्य ही है, तो भी भावनाके कारण इस प्रकार प्रौढ़ताको प्राप्त हो गयी है। सबके कारणभूत सनातन ब्रह्मसे भिन्न दूसरा कोई जगत्का कारण नहीं है। वह कारण भी कार्यताके बिना सम्भव नहीं है और निर्विकार कूटस्थ सच्चिदानन्दघन अद्वितीय ब्रह्ममें कार्यता और कारणता आदिका होना कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये इस जगत्की प्रतीति अज्ञानके कारण ही हो रही है।
(सर्ग १८६–१८९)
श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानकी ज्ञेयता-पत्ति अर्थात् जो ज्ञानस्वरूप है, उसे ज्ञेय—जड दृश्य समझ लेना ही बन्धन है और उस ज्ञेयता—जड दृश्यबुद्धिका सर्वथा निवारण ही मोक्ष कहलाता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! ज्ञानकी ज्ञेयता-बुद्धिका निवारण कैसे होता है ? उस ज्ञेयता-बुद्धिका सर्वथा निवारण हो जानेपर यहाँ बन्धताबुद्धि कैसे निवृत्त होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—शम, दम आदि साधनोंसे युक्त सच्चिदानन्द परमात्माका सम्यग्ज्ञानरूप प्रबोध प्राप्त होनेसे भ्रान्ति-बुद्धि दूर हो जाती है। उस भ्रान्ति-बुद्धिके दूर हो जानेपर इस प्रकार ज्ञेयता—जड दृश्यबुद्धिकी अत्यन्ता-भावरूपा परम शान्तिमयी स्वरूपभूता निराकार मुक्ति प्राप्त होती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! कैवल्य बोधरूप सम्यग्ज्ञान क्या कहलाता है, जिसकी पूर्णरूपसे प्राप्ति हो जानेपर यह जीव बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सबका अधिष्ठानभूत जो चिन्मात्र ज्ञान है, वह त्रिकालमें भी ज्ञेयरूप नहीं हो सकता। वह केवल अन्वय ज्ञान अवर्णनीय है। इस प्रकार जो आन्तरिक बोध है, उसे सम्यग्ज्ञान कहा गया है।
श्रीरामजीने पूछा—ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्माके अंदर उससे भिन्न ज्ञेयता क्या है ? यह बताइये, साथ ही इस बातपर भी प्रकाश डालिये कि 'ज्ञान' शब्दकी व्युत्पत्ति कैसे करनी चाहिये। अवबोधनार्थक 'ज्ञा' धातुसे भावमें ल्युट् प्रत्यय होनेपर ज्ञान शब्द बनता है या करणमें प्रत्यय होनेपर ?*
* 'ल्युट् च' (पा० सू० ३।३।११५) इस सूत्रसे भावमें ल्युट् प्रत्यय होता है तथा 'करणाधिकरणयोश्च' (पा० सू० ३।३।११७) इस सूत्रसे करण और अधिकरण अर्थमें ल्युट् प्रत्यय होता है। 'भावमें' प्रत्यय होनेपर ज्ञान शब्दका अर्थ होगा—जानना, समझना, बोध होना। करणमें प्रत्यय होनेपर ज्ञानका अर्थ होगा—ज्ञानका साधन, जिससे जाना जाय वह करण।