भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६६७


श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! बोधमात्र ही ज्ञान है। अतः यहाँ भावसाधनमात्र ज्ञानको ही ग्रहण किया गया है अर्थात् भावमें प्रत्यय करनेसे जो ज्ञान शब्द बनता है, वही यहाँ अभीष्ट है। ज्ञान और ज्ञेयमें कोई भेद नहीं है, जैसे पवन और स्पन्दनमें (वायु और उसकी गतिशीलतामें) भेद नहीं होता है।

श्रीरामजीने पूछा— यदि ऐसी बात है तो यह ज्ञान, ज्ञेय आदिका भ्रम, जो खरगोशके सींगकी भाँति मिथ्या ही है, तीनों कालोंमें व्यवहारके योग्य कैसे सिद्ध होता है !

श्रीवसिष्ठजीने कहा— बाह्य पदार्थोंके भ्रमसे ही यहाँ भ्रमबुद्धि उत्पन्न हुई है, ऐसा जानना चाहिये। वास्तवमें किसी ही बाह्य अथवा आभ्यन्तरिक पदार्थका अस्तित्व सम्भव नहीं है। इसलिये ज्ञान और ज्ञेय आदिका भेद-भ्रम मिथ्या ही है। (स्वप्नकालमें अथवा भ्रान्तिज्ञानमें सहस्रों असत् पदार्थ व्यवहारमें आते हैं। अतः यह ज्ञान और ज्ञेय आदिका भ्रम असत्य होनेपर भी इसका अज्ञानियोंके व्यवहारमें आना असम्भव नहीं है।)

श्रीरामजीने पूछा— मुने ! तुम, मैं आदि जो यह प्रत्यक्ष दृश्यपदार्थ हैं, जो भूत आदिरूपसे अनुभवमें आता है, वह है ही नहीं, यह कैसे समझा जाय ? कृपया मुझे बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा— निष्पाप रघुनन्दन ! सृष्टिके आरम्भकालमें विराट् पुरुष ब्रह्मा आदिके रूपमें कोई भी पदार्थ उत्पन्न ही नहीं हुआ। इसलिये किसी ज्ञेय अथवा दृश्य वस्तुकी सत्ता सम्भव ही नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा— मुने ! भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें होनेवाला जो यह जगत्‌का दर्शन है, जिसका प्रतिदिन सबको अनुभव हो रहा है, इसके होते हुए आप यह कैसे कह रहे हैं कि यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ; इसलिये कभी किसीको इसका दर्शन भी नहीं हुआ।

सं० यो० व० अं० २३—


श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! स्वप्नके पदार्थ, मृगतृष्णाका जल तथा संकल्पित पदार्थ— ये सब न तो कभी उत्पन्न हुए और न वास्तवमें कभी देखे गये। फिर भी, भ्रमवश इनकी प्रतीति हो जाती है। इसी तरह मैं, तुम आदि रूप जो जगत् है, यह न कभी उत्पन्न हुआ और न तत्त्वदृष्टिसे देखनेपर कभी उपलब्ध ही हुआ। इसलिये सर्वथा मिथ्या है, तथापि भ्रमवश इसकी प्रतीति होती है।

श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! मैं, तुम, यह इत्यादि रूपसे पूर्णतः अनुभवमें आनेवाला यह जगत् सृष्टिके आदिमें उत्पन्न ही नहीं हुआ, यह कैसे समझा जाय ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! कारणसे ही कार्य उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं। यह एक निश्चित सिद्धान्त है। प्रलयकालमें तीनों लोकोंका जो पूर्णतः लय हो गया, तब पुनः इसकी उत्पत्तिके लिये कोई कारण ही नहीं रह गया था (कारण न होनेसे सृष्टि हुई ही नहीं, इसलिये जो कुछ दीखता है, सब मिथ्या प्रतीति मात्र है)।

श्रीरामजीने पूछा— मुने ! महाप्रलय हो जानेपर जो अजन्मा, अविनाशी परब्रह्म अवशिष्ट रह गया, वही नूतन सृष्टिकी उत्पत्तिका कारण कैसे नहीं हो सकता ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! कारणमें जो कार्य सद्रूपसे विद्यमान है, वही उससे प्रकट होता है, जो उसमें है ही नहीं, वह कैसे प्रकट हो सकता है। क्या कभी घटसे पटकी उत्पत्ति होती है ? कभी नहीं।

श्रीरामजीने कहा— महाप्रलय आनेपर जगत् सूक्ष्मरूपसे ब्रह्ममें रहता है। वही सृष्टिके समय पुनः उससे प्रकट हो जाता है।

श्रीवसिष्ठजी बोले— परम बुद्धिमान् निष्पाप रघुनन्दन ! महाप्रलयके अन्ततक उस ब्रह्ममें जगत्‌की सत्ताका

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