भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६६८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमांनस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

किसने अनुभव किया है तथा उसकी वह सत्ता वहाँ किस रूपमें रहती है !

श्रीरामजीने कहा—ब्रह्ममें जगत्‌की सत्ता उस समय ज्ञानस्वरूपा ही होती है और ज्ञानियोंके अनुभवमें भी आती है। अतः वह प्राकृत आकाशके समान शून्य-रूप तो नहीं होती। इसलिये उस सत्ताको असत् नहीं कहा जा सकता।

श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहो ! यदि ऐसी बात है तो वह ज्ञान ही तीनों लोकोंका स्वरूप है। किंतु जो विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है, उसके जन्म और मरण कैसे हो सकते हैं ?

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! यदि इस प्रकार सृष्टि उस ब्रह्ममें स्थित नहीं है तो यह भ्रान्ति कहाँसे और कैसे आ गयी ! यह मुझे बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! कार्य-कारणताका अभाव होनेसे ही ब्रह्ममें न सृष्टि है न प्रलय। यह जो जगत् भासित होता है, वह जिसको और जिस रूपमें भास रहा है। वह सब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटी केवल आत्मा ही है।

श्रीरामजीने पूछा—यह बात तो असंगत-सी लगती है। जो यन्त्रका चालक चेतन है, वह जड यन्त्र-रूप कैसे हो सकता है ? द्रष्टा ईश्वर स्वयं ही दृश्य कैसे बन सकता है ! काठ दाहक बनकर अग्निको जला दे, क्या यह कभी सम्भव है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! द्रष्टा दृश्यभावको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि दृश्यकी सत्ता सम्भव ही नहीं है। केवल द्रष्टा ही प्रकाशित होता है, जो एकमात्र सच्चिदानन्दघनस्वरूप एवं सर्वात्मा है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! तब सृष्टिके आदिमें अनादि, अनन्त, शुद्ध चिन्मय ब्रह्म ही जगत्‌का संकल्प करता है। इसीसे इस जगत्‌का भान होता है। यदि ऐसा न होता तो चेत्य जगत्‌का प्राकट्य कैसे हो सकता था ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—किसी भी चेत्यकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है। चेत्यके अत्यन्त अभावके ही कारण चेतनकी नित्यमुक्तता और अवर्णनीयता सिद्ध होती है।

श्रीरामजीने पूछा—यदि ऐसी बात है तो ये अहंता आदि चेत्य कैसे और कहाँसे उत्पन्न हुए हैं, जगत्‌का भान कैसे होता है और स्पन्दन आदिका अनुभव क्यों होता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! मैं पहले ही बता चुका हूँ कि कारणकी सत्ता न होनेसे आदिकालमें ही किसी वस्तुकी उत्पत्ति नहीं हुई थी। ऐसी दशामें चेत्य कहाँसे होगा ? इसलिये सब कुछ शान्तस्वरूप परब्रह्म ही है। सृष्टिकी प्रतीति केवल भ्रममात्र है।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जो वाणीकी पहुँचसे बाहर है, चेत्य और चलन आदिसे रहित है, सदा स्वप्रकाश और निर्मक है, उस नित्यमुक्त परब्रह्ममें किसको किस निमित्तसे और कैसा भ्रम हो सकता है ( जब ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं और वह नित्यमुक्त ज्ञानस्वरूप है तो उसमें किसको और कैसे भ्रम हो सकता है ! फिर यह जगत् नामक भ्रम क्या बला है ! ) इसका उत्तर मुझे दीजिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सृष्टिरूप भ्रमका कोई कारण नहीं है; इसलिये यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि उसकी सत्ता त्रिकालमें भी नहीं है। तुम, मैं आदि सब कुछ एकमात्र शान्तस्वरूप निर्विकार ब्रह्म ही है।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! फिर तो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, भेद, संकल्प और चित्त सभी वस्तुओंकी उत्पत्ति