संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६६९
| असम्भव ही है, फिर इन सबकी सत्ता कैसे उपस्थित हो गयी ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! देश, काल, क्रिया, द्रव्य, भेद, संकल्प और चित्त इन सबकी सत्ता अज्ञानमात्र ही है। अज्ञानसे भिन्न इनकी सत्ता न है, न पहले कभी थी।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! तत्त्वदृष्टिसे कारणके अभावमें द्वैत और एकत्वकी सम्भावना ही नहीं रह जाती। फिर न कोई बोध्य रह जाता है न बोधक। बोध्य-बोधकके अभावमें बोधका होना भी कैसे सम्भव होगा ? ( जिसका बोध होता है वह कर्म कारक तो होना ही चाहिये। कर्म माननेपर द्वैतकी आपत्ति होती है और कर्म न माननेपर बोध किस वस्तुका हो, यह प्रश्न खड़ा हो जाता है।)<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अज्ञानी जीव ही बोधके द्वारा अपने अज्ञानविनाशरूप फलका आश्रय होकर आत्मबोधता (बोधकर्मता) को प्राप्त होता है। इसीसे बोध शब्द भी बोध्यता (बोधरूप फलवाली सकर्मकता) को प्राप्त होता है। ये सब बातें अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही कहने योग्य हैं। हम-जैसे जीवन्मुक्तोंके लिये नहीं (जीवन्मुक्त पुरुष तो ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटीसे रहित हो शुद्ध ज्ञानस्वरूप हो जाता है। उसके लिये बोधकी सकर्मकताका निरूपण अनावश्यक हो जाता है)।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! 'मैं जीवन्मुक्त हूँ' ऐसा अनुभव होनेसे यह सिद्ध है कि बोध ही अहंकाररूप परिणामको प्राप्त होता है। यह बोध अहंभावको प्राप्त हुआ तो यथार्थ बोध नहीं रह गया। उसमें भिन्नता आ गयी। अनन्त, जलसे भी बढ़कर निर्मल, चिन्मय, परमात्मस्वरूप आप-जैसे जीवन्मुक्त पुरुषोंमें यह बोधभिन्न अहंता कैसे सम्भव होती है ? | श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! बोधस्वरूप जीवन्मुक्तकी स्वरूपभूता जो बोधता है, वही उसमें विशुद्ध अहंता कहलाती है। तत्त्वज्ञानीका मैं और तुम भी उसके स्वरूपभूत ज्ञानसे भिन्न नहीं हैं। उसमें जो द्वैतरूप व्यवहार देखा जाता है, वह वायु और उसके स्पन्दनकी भाँति अद्वैतरूप ही है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! संसारको स्वप्नकी भाँति मिथ्या समझ लेनेमात्रसे कौन-सा अभीष्ट फल सिद्ध होता है ? स्वप्न आदिमें पदार्थोंकी साकारता कैसे शान्त होती है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अध्यात्मशास्त्रके पूर्वापरके विवेकपूर्वक विचारसे ज्ञानोदय होनेपर पदार्थोंमें साकारता या स्थूलताकी भावना शान्त हो जाती है। वे सब-के-सब चिन्मय ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा अटल निश्चय हो जाता है। इसी तरह स्वप्नके पदार्थोंमें भी (जागनेपर) स्थूलताकी भावना निवृत्त हो जाती है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—जिसकी भावना स्थूलताको छोड़कर अत्यन्त सूक्ष्मताको प्राप्त हो गयी है, वह जगत्को कैसा देखता है ? उसका यह संसारभ्रम कैसे शान्त होता है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—वासनाके क्षीण हो जानेपर पुरुष जगत्को उजड़ा हुआ, असत्के सदृश, आकाशमें दीखनेवाले गन्धर्वनगरके समान और वर्षाद्वारा मिटाये गये चित्रके तुल्य देखता है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—मुने ! वासनाके क्षीण हो जानेपर जिसके लिये जगत्की स्थिति स्वप्नके तुल्य हो जाती है, उस पुरुषकी जागतिक पदार्थोंके विषयमें जब स्थूलताकी भावना मिट जाती है, तब फिर क्या होता है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी दृष्टिमें जगत् केवल संकल्परूप है, उस पुरुषकी वह अति सूक्ष्म वासना भी उत्तरोत्तर क्रमसे विलीन हो जाती है। |