संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
६५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हैं। अभ्यासकी कमीके कारण अभी तुम्हें कल्याणप्रद ज्ञानमें विश्रामकी प्राप्ति नहीं हुई है। कुछ कालके पश्चात् अभ्यासके सुदृढ़ हो जानेपर तुम्हें पूर्ण विश्राम प्राप्त हो जायगा। (सर्ग १५२-१५५)
मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन, अग्निका स्वर्गलोक-गमन, भासद्वारा आत्म-कथाका वर्णन तथा बहुत-से आश्चर्योंका वर्णन करके आत्मतत्त्वका निरूपण
तदनन्तर मुनिने भविष्यमें व्याधके तप करके ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त करने, उसकी कायाकी वृद्धि होने, मृत्युको प्राप्त होने, फिर राजा सिंधु बनकर मन्त्रीके मुखसे तत्त्व सुननेकी बातका सविस्तर वर्णन करके कहा—'व्याध ! मैंने भविष्यमें होनेवाली सारी घटनाओंका अतीतकी तरह तुमसे वर्णन कर दिया। अब इस समय तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा भलीभाँति सोच-समझकर करो।'
अग्निने कहा—विपश्चित् ! मुनिका पूर्वोक्त वचन सुनकर व्याधका चित्त विस्मयसे पूर्ण हो गया। वह क्षणभरतक ठगा-सा खडा रहा। फिर तुरंत वह तथा वे मुनि स्नान करनेके लिये चले गये। इस प्रकार अकारण ही सुहृद् बने हुए वे दोनों व्याध और महामुनि शास्त्र-चिन्तन करते हुए वहाँ तपस्या करने लगे। तदनन्तर थोडे ही समयमें मुनिको निर्वाणकी प्राप्ति हो गयी। वे आयुके अवसानमें अपने पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग करके परमपदमें लीन हो गये। उधर व्याध चिरकालतक तपस्या करता रहा। जब सैकड़ों युग बीत गये, तब उसकी कामना पूर्ण करनेके लिये पद्मयोनि भगवान् ब्रह्मा वहाँ आये। बेचारा व्याध अपनी वासनाके आवेशको निवारण करनेमें समर्थ न हो सका; अतः मुनिद्वारा पहले ही बतायी हुई अपने वरकी व्यर्थताको जानते हुए भी उसने ब्रह्माजीसे वही वर माँगा। तब ब्रह्माजी 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर अपनी अभीष्ट दिशाकी ओर चले गये और वह व्याध अपनी तपस्याका फल भोगनेके लिये पक्षीकी तरह आकाशकी ओर उड़ चला। वहाँ वह गरुडके सदृश महान् वेगसे ऊपर-नीचे टेढ़ी-मेढ़ी अनेक उड़ानें भरता हुआ आकाशको पूर्ण-सा करने लगा। यों करते-करते उसका बहुत-सा समय बीत गया। इतने लम्बे समयके बीतनेके पश्चात् भी जब उसके अविद्या-भ्रमका अन्त नहीं आया, तब उस विषयसे उसे वैराग्य हो गया। तदनन्तर वैराग्य हो जानेके कारण उसने आकाशमें ही प्राणोंका विरेचन करनेवाली योगधारणा बाँधकर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया और उसका शरीर मुर्दा-सा होकर नीचेकी ओर लटक गया। उसका प्राणवायुसमन्वित चित्त तो उस अव्यक्ताकाशमें ही राजा विदूरथकी शत्रुरूपा पूर्वोक्त सिन्धुताको प्राप्त हो गया। (अर्थात् पूर्वोक्त राजा विदूरथके शत्रु राजा सिन्धुका रूप धारण कर लिया) जो सारे भूमण्डलका पालन करनेवाली थी तथा वह शरीर सैकड़ों मेरुका-सा विशालकाय होकर महाशवके रूपमें परिणत हो गया। फिर तो दूसरी पृथ्वीके सदृश वह विशाल शव अशनि एवं वज्रके गिरनेका-सा शब्द करता हुआ आकाशसे भूतलपर गिर पड़ा।
विपश्चितोंमें श्रेष्ठ पुरुष ! इस प्रकार मैंने तुमसे उस महाशवका वर्णन कर दिया। जिस भूमण्डलरूप जगत्में वह शव गिरा था, वही यह जगत् है, जो हमलोगोंके खमनगरके सदृश स्फुरित हुआ है।
भो श्रेष्ठ विपश्चित् ! साधुशिरोमणे ! तुम पुनः प्रकृत व्यवहारके समान स्थिर भूमण्डलमें अपनी अभीष्ट दिशाको चले जाओ। गतिकोविद ! प्रजावर्गके स्वामी इन्द्र स्वर्गलोकमें अपने सौवें यज्ञका अनुष्ठान करना चाहते
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन * ६५३
हैं। उन्होंने मन्त्रद्वारा मुझे आमन्त्रित किया है, अतः मैं तो वहाँ जाता हूँ।
भास बोले—राजन् ! यह कहकर भगवान् अग्नि अपने स्वरूपसे तो वहीं अन्तर्धान हो गये, परंतु अग्नि-रूपसे वे निर्मल आकाशमें बिजलीकी अग्निकी तरह जाते हुए दीख पड़े। तथा मैं भी चित्तद्वारा अपनी प्राक्तन अविद्याके संस्कारोंको वहन करता हुआ पुनः स्वयं अपने दिगन्तगमनरूप कर्मका निर्णय करनेके लिये आकाशमें भ्रमण करता हुआ स्थित रहा। उस समय आकाशमें मुझे फिर अगणित जगत् दृष्टिगोचर हुए। उनकी रूपरेखाएँ भिन्न-भिन्न थीं तथा उनके आचार-विचार भी अनेक तरहके थे। भूपाल ! उन लोकोंमें कहीं बहुत-से प्राणी एकीभूत हो गये थे, जिससे उनके अङ्ग छत्ते-सरीखे भासित होते थे। उनमें चेतना थी। वे मन्दगतिसे चलते थे और दर्शकोंके हृदयोंको हर लेते थे। ऐसे बहुत-से प्राणी मुझे आकाशमें दृष्टिगोचर हुए। इस प्रकार मैं चिरकालतक देखता रहा, किंतु स्वप्नकालिक मनोमात्र देह होनेके कारण उनका विनाश होते हुए तो देखा; परंतु मुझे अविद्याका अन्त नहीं दीख पड़ा। तब मैं उस दृश्यवर्गसे उद्विग्न हो गया और किसी एकान्त स्थानमें जाकर मोक्षसिद्धिके लिये तपस्या करनेको उद्यत हुआ।
उसी समय इन्द्रने मुझसे कहा—'विपश्चित् ! चित्ता-काशमें तुम्हारे लिये दूसरी मृगयोनि उपस्थित है; क्योंकि तुम्हारी यह चित्-शक्ति चिरकालतक मृगयोनिमें ही संसरण करना चाहती है। इस प्रकार मैने तुम्हारे अवश्यम्भावी वृत्तान्तको देख लिया है। तुम मृगयोनिमें उत्पन्न होकर राजा दशरथकी उस महापुण्यस्वरूपा सभा-में पहुँचोगे। वहाँ मेरे द्वारा कहा हुआ सारा-का-सारा ज्ञान तुम्हारी समझमें आ जायगा। इसलिये अब तुम संसारसे खिन्न होकर भूतलपर मृगयोनिमें जन्म धारण करो। वहाँ तुम्हें इस सम्पूर्ण कल्पित आत्मवृत्तान्तका पूर्णरूपसे स्मरण होगा। पुनः जब मृगयोनिसे मुक्त हो जाओगे, तब तुम्हें पुरुषरूपकी प्राप्ति होगी। उस समय जब ज्ञानाग्निद्वारा तुम्हारा शरीर दग्ध हो जायगा, तब तुम्हारा हृदयस्थ आत्मज्ञान स्फुरित होगा। उस आत्मज्ञानके स्फूरणसे तुम उस अविद्या नामक भ्रान्तिको, जो चिरकालसे तुम्हारे हृदयमें स्थित है, त्यागकर स्पन्दरहित वायुके समान उत्तम निर्वाणको प्राप्त हो जाओगे।'
देवराज इन्द्रके यों कहनेपर उसी समय 'इस वनमें मैं यह मृग हूँ' ऐसी मेरी निश्चित प्रतिभा उद्भूत हुई। तभीसे मैं उसी श्रेष्ठ पर्वतनगर मन्दार-वनके भीतरी कोनेमें तृण और दूर्वाङ्कुरोंका आहार करनेवाला मृग हो गया। रघूद्वह ! तदनन्तर एक समय सीमावर्ती एक सामन्त शिकार खेलनेके लिये वहाँ आया। उसे देखकर मैं भयभीत हो गया और छलाँग मारकर भागा; परंतु उसने आक्रमण करके मुझे पकड़ लिया और घर ले जाकर तीन दिनतक वहाँ रखा। तत्पश्चात् वह तुम्हारे मनोविनोदके लिये मुझको यहाँ ले आया। निष्पाप राम ! यों मैंने अपनी सारी आत्मकथाका, जो संसारकी मायाके समान तथा नाना प्रकारके आश्चर्यरूपी रससे पगी है, तुमसे वर्णन कर दिया। इस प्रकार नाना प्रकारकी शाखा-प्रशाखाओंके विस्तारसे युक्त यह अविद्या अनन्त है। यह आत्मज्ञानके अतिरिक्त और किसी भी उपायसे शान्त नहीं हो सकती।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वह विपश्चित् वहाँ इतना कहकर चुप हो गया, तब उसी क्षण प्रशंसनीय बुद्धिवाले श्रीराम उससे यों बोले।
श्रीरामजीने पूछा—प्रभो ! यदि दूसरेका सङ्कल्परूपभूत मृग अपने आत्मामें दृष्टिगोचर हुआ है तो इससे सिद्ध हुआ कि इसी प्रकार असंकल्प पुरुष दूसरेके सङ्कल्परूप सृष्टिमें वस्तुएँ देख सकता है। परंतु यह कैसे सम्भव होगा—इसे बतलानेकी कृपा कीजिये।
६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विपश्चित्ने कहा—राघव ! पहले जिस जगत्के भूतलपर वह महाशव गिरा था, उसी भूमिपर इन्द्र यज्ञके गर्वसे गर्वीले होकर विचरण कर रहे थे । वहीं आकाशमें महर्षि दुर्वासा ध्यानमग्न होकर बैठे थे । इन्द्रको यह पता नहीं था कि ये मुनि हैं । उन्होंने अज्ञानवश मुर्दा समझकर उन्हें पैरसे ठोकर मार दी । इससे महर्षि दुर्वासा कुपित हो गये और इन्द्रको शाप देते हुए बोले—'देवराज ! तुम जिस भूतलपर जाना चाहते हो, तुम्हारे उस अवनितलको ब्रह्माण्डके समान विशाल एव महाभयंकर शव शीघ्र ही चूर-चूर कर देगा । मुर्दा समझकर जो तुमने मेरा अतिक्रमण किया है, इस कारण मेरे शापसे तुम शीघ्र ही उस पृथ्वीको प्राप्त होओगे ।' वस्तुतः तो एक ( व्यावहारिक ) जगत् न सत् है और न दूसरा ( कल्पित ) जगत् असत् ही है, क्योंकि ये दोनों, जैसी प्रतिभा उदित होती है, तदनुकूल प्रतीत होते हैं । इसलिये इनमें किसे सत् कहा जाय अथवा किसे असत् कहा जाय । अथवा राघव ! इस प्रसङ्गमें मैं तुम्हें एक दूसरी युक्ति बतलाता हूँ, जिससे बात स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगी, उसे सुनो । महाभाग ! जिसमें सब कुछ है, जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं सर्वात्मक एवं सर्वव्यापक है, उस ब्रह्ममें सभी कुछ सम्भव है । इसलिये सर्वात्मामें सङ्कल्पजनित पदार्थ परस्पर मिलते हैं—यह बात अवगत होती है, क्योंकि लोकमें भी देखा जाता है कि जहाँ छाया रहती है, वहीं धूप भी रहता है । ऐसा सम्भव न हो तो उसे सर्वात्मताकी प्राप्ति ही कैसे होगी ? इसलिये सर्वात्मामें संकल्पनगर परस्पर नहीं मिलते हैं—यह भी सत् है और परस्पर मिलते हैं—यह भी सत् है । इस प्रकार जो सत्य नहीं है, उसका अस्तित्व नहीं है और जो मिथ्या नहीं है, वह भी नहीं है; क्योंकि सर्वात्मामें सब कुछ सर्वत्र सर्वथा एवं सर्वदा वर्तमान है ।
रघुनन्दन ! यह ब्रह्मसत्ता ऐसी है, जो स्वयं ही अपनेसे अपना सृजन करती है तथा उसीके प्रभावसे अविद्या सादि एवं अनादिरूपसे अनुभूत होती है । इस ज्ञानदृष्टिसे सभी कुछ क्षणभरमें ही प्रमाणभूत हो जाता है और अन्य दृष्टिसे ऐसा नहीं होता, इसीलिये विद्वान्-लोग ज्ञानदृष्टिसिद्ध वस्तुको ही सारभूत मानते हैं । पूर्ण दृष्टि होनेपर ज्ञानता तथा अज्ञानता एवं सत् और असत्की स्थितिका कुछ भी भेद नहीं है; क्योंकि सत्य ब्रह्ममें सत् और असत्—दोनों एक-से हैं, इसलिये सब कुछ काष्ठवत् मौन अर्थात् चिद्रूप ही है। जो दृश्य है, वह अनन्त है, वही ब्रह्मता है और वही परमपद है, इसलिये यह सब कुछ चिदाकाशमयी सर्गश्री भी सृष्टिके आदिमें स्वप्न-तुल्य शान्त ब्रह्मस्वरूप ही है—यह स्वतः सिद्ध हो जाता है। (सर्ग १५६-१५९)
राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देते हुए सभाको विसर्जित करना, दूसरे दिन सभामें वसिष्ठजीद्वारा कथाका आरम्भ, ब्रह्मके वर्णनद्वारा अविद्याके निराकरणके उपाय, जितेन्द्रियकी प्रशंसा और इन्द्रियोंपर विजय पानेकी युक्तियाँ
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! विपश्चित् यह कह ही रहा था कि सूर्यदेव मानो उस वृत्तान्तका अवेक्षण करनेके लिये अपने दूरतक फैले हुए किरणरूपी पादोंसे दूसरे लोकको चले गये । तब दिनका अन्त सूचित करनेवाला नगाड़ा अपने शब्दसे दसों दिशाओको पूर्ण करता हुआ-सा उसी प्रकार बज उठा मानो संतुष्ट हुई दिशाओंसे जय-जयकारकी ध्वनि आ रही हो । इधर महाराज दशरथ विपश्चित्को अपने राज्यके अनुरूप क्रमशः गृह, स्त्री और धन आदि विभव प्रदान करनेके लिये आदेश देते हुए सिंहासनसे उठ पड़े। फिर तो राजा दशरथ
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देना * ६५५
श्रीराम और वसिष्ठ आदि सभी सभासदोंने परस्पर क्रमानुसार एक-दूसरेको प्रणाम आदिके द्वारा सत्कार किया और फिर सभा विसर्जित करके वे अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। वहाँ उन्होंने स्नान-संध्या आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर भोजन किया और रात बिताकर प्रातःकाल वे पुनः सभामें आ गये। फिर तो वह सभा पहलेके ही तरह पूर्णरूपसे स्थित हो गयी। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा अपनी किरणोंसे अमृतकी वर्षा करता है, वैसे ही मुनीश्वरने अपने मुखरूपी किरणोंसे आह्लाद उगलते हुए उस यथाप्रस्तुत कथाका क्रमशः वर्णन करना आरम्भ किया।
राजन् ! यह अविद्या नहीं है। यह असत् होती हुई सत्-सी स्थित है। उपर्युक्त प्रकारका महान् प्रयत्न करनेपर भी विपश्चित् उसका निर्णय नहीं कर सका। इस प्रकार जबतक इस अविद्याका पूर्णतया ज्ञान नहीं हो जाता तभीतक यह अनन्त प्रतीत होती है; किंतु पूर्णरूपसे जान लिये जानेपर तो मृगतृष्णा-नदीके समान इसका अस्तित्व ही मिट जाता है।
श्रीरामजीने पूछा—गुरुदेव ! भासद्वारा वर्णित मुनि और व्याधका जो सुख-दुःखादि नाना दशाओंसे युक्त वृत्तान्त है, यह क्या किसी कारणान्तरसे घटित हुआ था या स्वभावज है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यह अपना आत्मा परमात्मारूप महासागर है। इसमें इसी प्रकारके शून्यात्मक प्रतिभासरूप आवर्त निरन्तर अपने-आप स्वाभाविक ही उठते रहते हैं।
श्रीराम ! सत्य वस्तुमें 'यह जाग्रत् है, यह स्वप्न है' इस प्रकारकी जो भिन्नता प्रतीत होती है, उसका उन दोनोंकी समानरूपताका पूर्णरूपसे अनुभव हो जानेपर विनाश हो जाता है। जो जाग्रत् है, वही स्वप्न है और जो स्वप्न है, वही जाग्रत् है; क्योंकि कालान्तरमें 'निश्चय ही यह ऐसा नहीं है' ऐसी बाधबुद्धि दोनोंमें समान होती है। जैसे जीवनपर्यन्त नियमरहित सैकड़ों स्वप्न होते हैं, उसी तरह निर्वाणरहित महान् अज्ञानमें सैकड़ों जाग्रत् भी होते हैं। जैसे लोग उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले बहुत-से स्वप्नोंका स्मरण करते हैं वैसे ही पूर्वजन्मकी स्मृति करानेवाले योगसे सम्पन्न प्रबुद्ध पुरुषोंको सैकड़ों जन्मोंका भी स्मरण होता है। जैसे दृश्य और जगत्—दोनों नित्य ही एकार्थक हैं, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न—ये दोनों शब्द भी एकार्थक कहे जाते हैं।
रघुकुलभूषण राम ! जैसे तरङ्गें नदीके जलमें द्रवरूपसे स्थित हैं, उसी तरह सृष्टिरूपी लहरें चित्स्वभाव (चेतनका सङ्कल्प) होनेके कारण चेतनमें ही स्थित हैं। यह चित्तकी छाया ही 'जगत्' नामसे प्रस्फुरित होती है। यह आकाररहित होते हुए भी मूर्तिमती-सी होकर द्रव्यकी छायाके समान व्याप्त है। आत्मा ही अपना बन्धु है और आत्मा ही अपना शत्रु है। यदि आत्माद्वारा आत्माकी रक्षा न की गयी तो फिर उसकी रक्षाका दूसरा कोई उपाय नहीं है। जीवकी बाल्यावस्थाको ज्ञानहीन होनेके कारण पशुता-सी और वृद्धावस्थाको मृत्यु-तुल्य ही समझना चाहिये। यदि विवेक सम्पन्न हो तो युवावस्था ही उसका जीवन है। इस संसारको, जो बिजलीके कौंधनेके समान चञ्चल है, प्राप्त होकर सद्-शास्त्र-चिन्तन एवं सत्पुरुषोंके सङ्गद्वारा अज्ञानरूपी कीचड़से आत्माका उद्धार करना चाहिये। अहो ! खेद है। ये मनुष्य कैसे क्रूर हैं, जो कीचड़में फँसे हुए अपने आत्माका भी उद्धार नहीं कर रहे हैं। भला, इनकी क्या गति होगी। * जैसे मिट्टीकी
* आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्माऽऽत्मना न चेत् त्रातस्तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥
शैशवं वार्धकं ज्ञेयं तिर्यक्त्वं मृतिरेव च ।
तारुण्यमेव जीवस्य जीवितं तद्विवेकि चेत् ॥
संसारमिममासाद्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ।
सच्छास्त्रसाधुसम्पर्कैः कर्दमात् सारमुद्धरेन् ॥
६५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
बनी हुई वेताल-सभा उसके रहस्यसे अनभिज्ञ ग्रामीण पुरुषको भय आदि दुःख प्रदान करनेवाली होती है, किंतु जिसे उसके यथार्थ रहस्यका यों ज्ञान हो गया है कि यह मृन्मयी ही है, उसके लिये वह दुःखदायिनी नहीं होती, वैसे ही यह ब्रह्ममयी दृश्यलक्ष्मी अज्ञानीको भयादि क्लेश पहुँचाती है; किंतु 'यह दृश्य ब्रह्म ही है' यों यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वह कष्टदायिनी नहीं होती। इस दृश्यके तत्त्वका परिज्ञान हो जानेसे यह अशान्त होता हुआ भी शान्त तथा स्थित होता हुआ भी विलीन हो जाता है और दृश्यमान होता हुआ भी दिखायी नहीं पड़ता। जैसे अपने स्वप्नकालमें स्पष्टरूपसे अनुभवमें आया हुआ भी स्वाप्न-जगत् उसका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे अथवा जाग जानेसे असत्य ही हो जाता है, वैसे ही चिदाकाशमें अनुभूयमान अतएव सत्य-सी स्थित हुई भी यह सृष्टि तत्त्वका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे केवल शून्यरूप ही अवशिष्ट रह जाती है।
• श्रीरामजीने पूछा—मुनिवर ! जब इन्द्रियोंपर विजय पाये बिना इस अज्ञानका उपशमन नहीं होता, तब मुझे यह बतलानेकी कृपा कीजिये कि इन इन्द्रियोंको कैसे जीता जा सकता है ?
• श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! जैसे मन्द दृष्टिवाले पुरुषके लिये सूक्ष्म पदार्थके निरीक्षणमें दीपक उपयोगी नहीं होता, उसी तरह प्रचुर भोगोंमें आसक्त, भौतिक पुरुषार्थ-सम्पादनमें संलग्न, जीविकोपार्जनमें दत्तचित्त तथा इन्द्रियजयविहीन पुरुषके लिये केवल शास्त्रादि साधन उपयोगी नहीं होते। इसलिये तुम इन्द्रियजयमें निमित्तभूत इस युक्तिको अविकल रूपसे श्रवण करो। इस युक्तिके आश्रयसे अपने प्रयत्नद्वारा सम्पादित थोड़ी-सी भी साधन-सम्पत्ति सुखपूर्वक सिद्धिको प्राप्त हो जाती है। इस इन्द्रियरूपी सेनाका चित्त ही सेनापति है, अतः उसपर विजय पा लेनेसे इन्द्रियोंपर स्वतः विजय प्राप्त हो जाती है—ठीक उसी तरह, जैसे जूतेसे सुरक्षित पैरवाले पुरुषके लिये सारी पृथ्वी ही चर्माच्छादित-सी हो जाती है। जो चित्तावच्छिन्न चेतन जीवको संविदाकाशरूप ( ज्ञान-स्वरूप) ब्रह्ममें एकीभूत करके अपने स्वरूपमें स्थित है, उस पुरुषका मन शारदीय कुहरेकी तरह स्वयं ही शान्त हो जाता है। जिसने निरन्तर अपने संवेदन ( ज्ञान ) रूपी प्रयत्नके द्वारा चित्तवृत्तिको विषयरूपी मांससे हटा लिया है, उसे तत्त्वज्ञानियोंका स्वाराज्य पद प्राप्त हुआ ही समझिये। जो स्वधर्मविरुद्ध कार्योंमें आत्मप्रवृत्तिका त्याग करके शम और संतोषका उपार्जन करता हुआ स्थित है, वही जितेन्द्रिय है। जिसका मन अपने अंदर आत्मरसिकता और बाहर नीरसताका अभ्यास करनेमें उद्विग्न नहीं होता, उसका मन शान्त हो जाता है। प्रयत्नपूर्वक भलीभाँति निरोध कर देनेसे मन अपने आश्रय-स्थान ( विषयानुधावनरूप दुर्व्यसन ) का त्याग कर देता है और जब वह चञ्चलतासे निर्मुक्त हो जाता है तब विवेककी ओर मुड़ता है। विवेक सम्पन्न मन उदार आत्मा और विजितेन्द्रिय कहा जाता है। फिर वह भवसागरमें वासनारूपी तरङ्गोके वेगसे विमोहित नहीं होता। इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर वह साधु-समागम और सत्-शास्त्रोंके अनुशीलनसे जगत्को यथार्थरूपसे सत्यब्रह्म-स्वरूप देखने लगता है। उस सत्यब्रह्मके अवलोकनसे संसारभ्रम उसी प्रकार शान्त हो जाता है, जैसे जलका ज्ञान हो जानेपर मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाली जलकी भ्रान्ति मिट जाती है। चेत्यभिन्न चिन्मात्र ही यह जगद्रूपसे स्थित है—ऐसा सत्य बोध जिसे प्राप्त हो गया है, उसे बन्ध-मोक्षकी दृष्टि कहाँसे प्राप्त हो सकती है ? 'अहं' 'त्वं' आदिरूप यह जगत् अविद्यामात्र ही है। यह मिथ्या होनेके कारण शान्त अतएव केवल शून्य-स्वरूपवाला है और चिदाकाशमें ही स्थित है।
अहो बत नराः क्रूरा गतिः केषां भविष्यति ।
कुर्वन्ति कर्दमोन्मग्ने नात्मन्यपि निजोदयम् ॥
( नि० प्र० उ० १६२ । १८, २१ से २३ )
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * दृश्यजगत्की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ताका प्रतिपादन * ६५७
रघुनन्दन ! जिनका चित्त उस ब्रह्ममें रम गया है और प्राण उसीमें लीन हो गये हैं, वे परस्पर ज्ञानोपदेश करते तथा ब्रह्मविषयक चर्चा करते हुए संतुष्ट होते हैं और आनन्द मनाते हैं । इस प्रकार निरन्तर परमात्मामें युक्तचित्तवाले तथा प्रेमपूर्वक भजन करनेवाले योगियोंको उस बुद्धियोगकी प्राप्ति होती है, जिससे वे उस परमपदको प्राप्त हो जाते हैं।* जब तृणमात्रके संरक्षणमें भी यत्नपूर्वक किया गया साधन ही उपकारी होता है, तब भला, त्रिलोकसमूहका संरक्षण यत्नके बिना कैसे सिद्ध हो सकता है । मनका अङ्कुररूप जो राज्यादि सुख है, वह क्या कोई सुख है ? अर्थात् वह तो अत्यन्त ही तुच्छ है; क्योंकि तत्त्वज्ञानमें पूर्णतया विश्राम प्राप्त हो जानेपर देवराजका पद भी तृणवत् लगने लगता है । जैसे दृश्य-प्रपञ्चमें रत पुरुष सुप्तावस्था अथवा जाग्रदवस्थामें दृश्यको ही देखते हैं, वैसे ही दृश्यसे विरक्त हुए शान्त ज्ञानी महात्मा उस परमपदरूप परमात्माको ही देखते हैं। श्रीराम ! इस परमपदको तुम महान् अभ्यासरूपी वृक्षका फल समझो। यह बिना घोर प्रयत्न किये कभी सिद्ध नहीं हो सकता । यदि अज्ञानी भी मेरे द्वारा कहे गये इस शास्त्रका बारंबार आवृत्तिद्वारा आस्वादन करे, श्रवण करे अथवा वर्णन करे तो वह तत्त्वज्ञानी हो सकता है । विचारपूर्वक मनन किये गये इस उत्तम शास्त्रसे जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, उन ज्ञानोंसे अन्य शास्त्र भी उसी प्रकार रुचिकर लगने लगते हैं, जैसे नमकसे व्यञ्जन । तत्त्वज्ञोंका विषयभूत जो परम ब्रह्म है, वह सभी अवस्थाओंमें भेदादि मलसे रहित सदा एकरस ही रहता है । उसमें कभी किंचिन्मात्र भी द्वैतादि मलका अस्तित्व नहीं रहता । चिदाकाशमें जो यह जगत् स्फुरित होता है, वह चिदाकाशका स्वभाव है, जो सूर्यकी प्रभाके समान इस चिदाकाशमें ही विकसित होता है । (सर्ग १६०-१६५)
दृश्यजगत्की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ता तथा ब्रह्मसे अभिन्नताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्यप्रपञ्चके रूपमें फैला हुआ है । इसलिये ये घट, गड्ढे और पट आदि सब पदार्थ वस्तुतः शुद्ध चैतन्यरूप ही हैं । जैसे स्वप्नमें शुद्ध चेतना ही घट-पटादि पदार्थोंके रूपमें भासित होती है और जैसे जल ही तरङ्गरूपमें प्रतीत होता है, वैसे ही विशुद्ध चेतन-तत्त्व ही इस दृश्यरूपमें प्रकाशित हो रहा है । तत्त्वज्ञ पुरुष घट-पट आदि समस्त भौतिक पदार्थोंको ब्रह्मघन, चैतन्यघन, परमार्थघन और शान्तस्वरूप एकरस आनन्दघनका ही प्रसार मानते हैं । श्रीराम ! आत्मख्याति, असत्ख्याति, अख्याति और अन्यथाख्याति—ये जो शब्दार्थ-दृष्टियाँ हैं, तत्त्वज्ञानी पुरुषके लिये खरगोशके सींगकी भाँति असत् हैं । इनमेंसे कोई कभी भी सम्भव नहीं है । केवल चेष्टाशून्य, शान्तस्वरूप, व्यावहारिक नाम आदिसे रहित, ज्ञाता (साक्षी) परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हैं। वह जो चिन्मय प्रकाशके स्फुरणसे आकाशस्वरूप शरीर (मूर्त जगत्), जो कि बिना दीवालके चित्र-सा पदार्थोंकी सत्तामात्र है, प्रतीत होता है; वास्तवमें अविनाशी ही है। जैसे जलमें तरङ्गैं होती हैं, उसी प्रकार शान्तस्वरूप परमात्मामें सदा और सर्वत्र वह जगत्
* तच्चित्तास्तद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च तन्नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । जायते बुद्धियोगोऽसौ येन ते यान्ति तत्पदम् ॥
(नि० प्र० उ० १६३ । ४०-४१)
कुछ अन्तरसे यही दोनों श्लोक गीता (१० । ९-१०) में आये हैं।
६५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
चिन्मयरूपसे ही विद्यमान है। जगत् जिस रूपमें प्रतीत हो रहा है, वैसा ही प्रतीत होता हुआ भी चेतनाकाशरूप होनेके कारण न सर्वथा असत् है और न सत् ही है। सारा दृश्य कुछ है और नहीं भी है। सर्वथा अनिर्वचनीय है। जिस रूपमें इस जगत्की स्थिति है, ऐसा ही इसका रूप है, या ऐसा नहीं है, यह सत् है या असत् है—संसारचक्रके विषयमें उठनेवाले इन प्रश्नोंका यथार्थ उत्तर—जगत्का यथार्थ स्वरूप तत्त्वज्ञानी महात्मा ही जानता है, दूसरा नहीं।
रघुनन्दन ! चिन्मय आकाशमें ही जो चिन्मय आकाशका स्फुरण हो रहा है, उसीने उसीको जगत् समझा है। तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् वह जगत् कहाँ टिक पाता है?
पूर्णपरब्रह्म परमात्मासे ही यह पूर्ण ब्रह्ममय जगत् उसके प्रकट न करनेपर भी प्रकट हुआ-सा प्रतीत होता है। यह प्रतीति भी ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही है। जो स्वयं मेरे अनुभवमें आ रहा है, उस आत्मतत्त्वको इस प्रकार अत्यन्त विशदरूपसे बारंबार उच्चस्वरसे प्रकट कर रहा हूँ, तो भी कुछ मन्दाधिकारी लोगोंके भीतर जो मूढ़ता घर किये बैठी है, वह खम्-तुल्य जगत्में 'यह जाग्रत् सत्य ही है' ऐसे विश्वासका आज भी त्याग नहीं कर रही है। यह महान् खेदका विषय है। जो समझदार होनेके कारण तत्त्वज्ञानका अधिकारी है, वह भी उस भ्रान्त धारणाको शीघ्र नहीं छोड़ रहा है। यह कैसा मोह है!
(सर्ग १६६—१६८)
जीवनमुक्त तथा परमात्मामें विश्रान्त पुरुषके लक्षण तथा आत्मज्ञानीके सुखपूर्वक शयनका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिसकी बुद्धि अन्तर्मुखी है—आत्मस्वरूप परमात्मामें लगी हुई है तथा जिसे सुखके साधन सुख और दुःखके साधन दुःख नहीं दे पाते हैं, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे अज्ञानियोंकी चित्तवृत्ति सब ओर फैले हुए विषयभोगोंमें आसक्त हो उनसे दूर नहीं हटती है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन परमात्मामें अविचल निष्ठा रखनेवाले जिस तत्त्वज्ञानी पुरुषकी विवेकशालिनी बुद्धि वहाँसे विचलित नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका चित्त अपनी चपलता छोड़कर चिन्मात्रस्वरूप परमात्मामें विश्राम लेकर वहीं रम गया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका मन परमात्मामें विश्राम लेनेके पश्चात् फिर वहाँसे हटकर इस दृश्यजगत्में नहीं रमता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
जो विशुद्ध बोधस्वरूप ज्ञानी महात्मा एकमात्र चेतनाकाशमय परमात्माके चिन्तनमें अनायास ही दृढ़तापूर्वक संलग्न होनेके कारण किसी लौकिक सुखका अनुभव नहीं करता है, वह परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। जिसके सभी पदार्थोंके विषयमें सारे संदेह विवेकद्वारा वास्तवमें नष्ट हो गये हैं, वह परमपद-स्वरूप परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। व्यवहारमें लगे होनेपर भी जिसके मनमें कहीं किसी भी पदार्थके प्रति अनुराग या आसक्ति नहीं है, वह परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। जो प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करता है तथा जिसके सभी कार्य कामना और संकल्पसे शून्य होते हैं, वह परमात्मामें विश्रान्त कहा गया है। जिस महापुरुषने विश्रामशून्य, आधाररहित तथा लंबे संसारमार्गमें उसकी चिन्मात्ररूपताका साक्षात्कार करके आत्मामें विश्राम पा लिया है, उसकी सर्वत्र विजय है। जन्म-जरा आदि सांसारिक दुःखसे ऊपर उठकर भवसागरके पार पहुँचा हुआ श्रेष्ठ ज्ञानी महात्मा परम विश्रान्ति-सुखका अनुभव करता हुआ आत्मामें प्रतिष्ठित होता है।
सारे जगत्का अभाव करके परम पूर्णताको प्राप्त हुआ आत्मज्ञानी पुरुष खूब छककर ब्रह्मानन्दमय अमृतका पान करता और सुखसे सोता है; कैसी अद्भुत बात है? आत्मज्ञानी
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री-पुत्र आदि परिवारका परिचय * ६५९
पुरुष विषयानन्दके अभावमें भी निरतिशय ब्रह्मानन्द पाकर महान् आनन्दमें निमग्न हो जाता है, अविनाशी अद्वैत सुखका अनुभव करता है तथा दूसरे प्रकाशोंसे प्रकाशित न होनेवाले परमात्माके महान् प्रकाशसे सम्पन्न हो सुखसे सोता है; यह कैसी विलक्षण स्थिति है ? जिसके काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि रूप अन्धकारका नाश हो गया है, जो परमात्माके महान् प्रकाशका रसिक बन गया है तथा केवल अमूर्त आनन्दरसमें ही आह्लादका अनुभव करता है, वह आत्मज्ञानी पुरुष ही सुखसे सोता है; यह कितनी अद्भुत बात है ? आत्मज्ञानी पुरुषका जो सुखपूर्वक शयन है, उसमें अनन्त दुःखोंके अनुभवके विषयमें वह विरत होता है और वर्णाश्रमोचित व्यवहारमें लोकसंग्रहके लिये वह लगा रहता है—उससे विरत नहीं होता । बाह्य पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नहीं होती है तथा वह आन्तरिक सुखका निरन्तर अनुभव करता रहता है । जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा स्थूलसे भी स्थूल है, उस आत्माको चिदाकाशरूपी शय्यापर सुलाकर आत्मज्ञानी पुरुष अपूर्व सुखसे सोता है । इस हमारे जगत्को अपने आत्मस्वरूप चेतनाकाशके एक कोनेमें खप्रके समान देखता हुआ वह विशद चिदाकाशस्वरूप आत्मज्ञानी पुरुष सुखसे सोता है । लोकपरम्पराके अनुसार प्राप्त व्यवहाररूप मनोरम तृणराशिसे निर्मित चटाईपर विश्रामको प्राप्त हुआ आत्मज्ञानी पुरुष सुखपूर्वक सोता है । ( सर्ग १६९ )
जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री, पुत्र आदि परिवारका परिचय तथा उस मित्रके साथ रहनेवाले उस महात्माके स्वभावसिद्ध गुणोंका उल्लेख, तत्त्वज्ञानीकी स्थिति, जगत्की ब्रह्मरूपता तथा समस्त वादियोंके द्वारा ब्रह्मके ही प्रतिपादनका कथन
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जीवन्मुक्त पुरुषका मित्र कौन है जिसके साथ वह क्रीडा करता है ? उसकी क्रीडाका क्या स्वभाव है ? अपने आत्मस्वरूपमें अवस्थिति ही उसकी क्रीडा है अथवा रमणीय भोग-स्थानोंमें विहार करनेसे जो प्रसन्नता प्राप्त होती है, उसीको वह अपनी क्रीडा समझता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जो अपना परम्परा-प्राप्त सहज कर्म है, जो लोकसंग्रहके लिये किया जाने-वाला अपना शास्त्रीय कर्म है तथा जो प्रयत्नसे अभ्यासमें लाया गया सत्-शास्त्रोंका अभ्यास, विचार, सत्संग, शम, दम, तितिक्षा, उपरति, शौच, संतोष, ईश्वर-ध्यान और संयम आदि अपना कर्म है—ये तीनों प्रकारके कर्म, जो निन्य या निषिद्ध नहीं हैं, वास्तवमें एक ही हैं । केवल उपाधिभेदसे तीन नामोंद्वारा कहे गये हैं । वह एकमात्र त्रिविध कर्म ही जीवन्मुक्त पुरुषका स्वाभाविक मित्र है । वह मित्र पिताके समान आश्वासन देनेवाला, स्त्रीके समान लज्जाद्वारा अकर्तव्यसे रोकनेवाला तथा जिनका निवारण करना कठिन है, ऐसे संकटोंमें भी सदा साथ देनेवाला है । उसके सेवनमें किसी प्रकारकी शङ्काके लिये स्थान नहीं है । वह परमानन्दकी सिद्धिमें पूर्ण सहायक है तथा क्रोधके अवसरोंपर भी कोपरहित होनेके कारण सान्त्वनारूप अमृत प्रदान करनेवाला है । ऐसे स्वकर्म नामक अपने सखीक मित्रके साथ वह जीवन्मुक्त पुरुष स्वभावसे ही रमता है, किसी दूसरेसे प्रेरित होकर नहीं ।
श्रीरामजीने पूछा—मुनीश्वर ! उसके इस मित्रकी स्त्री और पुत्र आदि कौन है तथा उनका स्वरूप क्या है ?—उनमें कौन-कौन-से गुण हैं ? यह संक्षेपसे ही मुझे बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महामते ! इस स्वकर्म नामक मित्रके 'स्नान,' 'दान,' 'तप' और 'ध्यान' नामवाले चार महात्मा पुत्र हैं । उनके सद्गुणोंसे सारी प्रजा उनमें
६६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भलीभाँति अनुरक्त रहती है। इसकी पत्नीका नाम 'समता' है, जो इसे बहुत ही प्रिय है। वह सदा अपने प्रियतमकी हृदयवल्लभा होकर रहती है। चन्द्रलेखाके समान दर्शन-मात्रसे ही लोगोंको आह्लाद प्रदान करती है। सदा संतुष्ट रहती और प्रियतममें अनुराग रखती है। करुणाके कारण सब ओर अपना वैभव बाँटती रहती है। चित्तको चुरा लेनेवाली और आनन्दकी जननी है। सदा पतिके साथ रहती और कभी अलग नहीं होती है। साधो ! जो सदा धैर्य और धर्ममें लगायी जाती है, वह 'बुद्धि' ही इस समता रानीकी प्रतीहारी (द्वारपालिका) है। वह सदा उसके सामने विनम्र रहकर उसे सुख देनेमें तत्पर रहती है। वह उस धर्म-धुरन्धर धन्यभागी वीर पुरुषके आगे-आगे दौड़ती है। इस महातेजस्वी राजाके मित्रकी दूसरी स्त्री 'मैत्री' है, जो राज्यपर बढ़े हुए शत्रुओंको पराजित करनेके लिये राजाको उचित मन्त्रणा प्रदान करती है। वह सदा 'समता'के साथ राजाके कंधे-से-कंधा भिड़ाकर चलती है। इसके सिवा इन माननीय नरेशको आर्य-मर्यादारूपी समस्त कार्योंके विषयमें बड़ी चतुराईके साथ उपदेश देनेवाली आचार्यस्वरूपा 'सत्यता' इसका स्वार्थ सिद्ध करनेवाली धनाध्यक्षा है। इस तरहके उत्तम परिवारवाले मित्र एवं मन्त्रीरूप अपने कर्मके साथ सर्वत्र व्यवहार निर्वाह करता हुआ जीवन्मुक्त पुरुष न तो लौकिक लाभमें हर्ष मानता है और न हानि होनेपर कुपित ही होता है। निर्वाण मोक्षमें मन लगाये रहने-वाला वह मननशील मुनि युद्धादि व्यवहारमें तत्पर होनेपर भी चित्रलिखित योद्धाकी भाँति ज्यों-का-त्यों ही निर्लेप स्थित रहता है। निरर्थक वादविवादोंमें वह पत्थरकी प्रतिमाकी भाँति मूक बना रहता है। बेमतलबकी बातोंको सुननेमें वह परले सिरेका बहिरा बना रहता है। लोकाचारके विरुद्ध सभी कर्मोंमें मुर्देके समान निश्चेष्ट होता है और सदाचारका विवेचन करते समय वह सहस्र जिह्वावाले वासुकि एवं देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता बन जाता है। उसकी वाणीसे सदा पवित्र चर्चा ही प्रकट होती है। अपने या दूसरोंके कुटिलतापूर्ण दोषोंको वह शीघ्र ही ताड़ लेता है। वस्तुविषयक अत्यन्त दुरूह संदेहका भी पलक मारते-मारते निर्णय करके शीघ्र ही उसके स्वरूपका विवेचन कर देता है। उसकी दृष्टिमें समता और हृदयमें उदारता होती है। वह दानवीर होनेके कारण सबको यथायोग्य धन वितरण करता है। उसका स्वभाव कोमल, स्नेहमय और मधुर होता है। वह सुन्दर एवं पुण्यकीर्ति होता है। जिनकी बुद्धि प्रबुद्ध—तत्त्वज्ञानके प्रकाशसे आलोकित है। वे प्रयत्नसे ऐसे नहीं बनते हैं। जैसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि आदि कभी दूसरेकी प्रेरणासे प्रकाशित नहीं होते, वह प्रकाश उनका स्वाभाविक गुण होता है, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुषोंका यह स्वभावसिद्ध गुण बताया गया है।
शान्त तत्त्वज्ञानी पुरुष चलते-फिरते, खड़े होते, जागते और सोते समय भी सदा एकमात्र सच्चिदानन्द परमात्मामें ही समाहित रहता है। जो भेदमें भी अभेदनिष्ठ है, दुःखमें भी सुखमयी स्थितिवाला है और बाह्य संसारमें रहकर भी अन्तर्मुख होनेके कारण संसारमें नहीं है। ऐसे ज्ञानी महात्माके लिये दूसरा कौन-सा कर्तव्य या प्राप्तव्य शेष रह जाता है ? बाहरके कार्य—व्यवहार करता हुआ भी तत्त्वज्ञ पुरुष हृदयसे न तो कुछ त्याग करता है और न ग्रहण ही करता है। वह सदा अकार्य नित्य परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है। ज्ञानीपुरुष अज्ञानके आवरणसे मुक्त होता है। उसका अन्तःकरण सदा शान्ति और आनन्दका ही अनुभव करता है। उसके शत्रु-मित्रादि-विषयक विकल्प नष्ट हो जाते हैं। उसमें आत्मसुखस्वरूप सार वस्तुकी ही प्रचुरता होती है तथा वह सदा परम शान्तिरूप अमृतसे तृप्त रहता है।
चारों ओर सुन्दर जगत्के रूपमें यह परब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है। वह स्फुरण और अस्फुरण (सृष्टि
१०१—**कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका खण्डन * ६६१
और प्रलयकाल) मे भी अपने निर्विकार स्वरूपमें ही अकेला स्थित रहता है। दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें भासित होकर भी निर्मल, प्रशान्त चेतनाकाशरूप ही है। परंतु अज्ञानियोंकी दृष्टिमें अनादिकालसे प्रलय और सृष्टिके उदयरूपसे ही उदित है।
अज्ञ जनताके निश्चयको छोडकर तत्त्वज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें ज्यों-का-त्यो स्थित हुआ यह जगत् सदा निर्विकार ब्रह्मरूप ही है। यदि तरङ्ग चेतन हो और वह युक्तिसे यह समझ ले कि मै तरङ्ग नहीं, जल ही हूँ तो उसकी तरङ्गता कैसे रह सकती है ? वेदान्तियों, जैनियों, सांख्यवादियों, बौद्धों, व्यास आदि आचार्यों, पाशुपतों तथा वैष्णव आदि आगमोंने भलीभाँतिसे प्रतिपादन करके जो-जो दृष्टिकोण उपस्थित किये हैं, उन सबके रूपमें भी हमारा प्रतिपाद्य ब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है। उन्होने अपनी-अपनी दृष्टिसे विभिन्न नामोद्वारा उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है। उन वादियोंके अपने-अपने निश्चयके अनुसार पारलौकिक ऐहलौकिक सुख-रूप सारे फलोंके रूपमें वह ब्रह्म ही उपलब्ध होता है। ब्रह्मकी ऐसी ही महिमा है; क्योंकि उसका स्वरूप सर्वात्मक है। (सर्ग १७०—१७३)
निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका खण्डन, चिदाकाशके ही जगद्रूपसे स्फुरित होनेका कथन, ब्रह्मके उन्मेष और निमेष ही सृष्टि और प्रलय हैं, मन जिसमें रस लेता है वैसा ही बनता है, चिदाकाश अपनेको ही दृश्य-रूपसे देखता है तथा अज्ञानसे ही परमात्मामें जगत्की स्थिति प्रतीत होती है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टियाँ ब्रह्मरूपी समुद्रकी तरङ्ग हैं। उनमें चैतन्य ही जल है। जीवन्मुक्तोके अनुभवमें आनेवाला यह चिन्मय जगत् अज्ञानियोके दुःखमय जगत्से भिन्न है। वह सच्चिदानन्दमयी दूसरी ही सृष्टि है। उसमें द्वैत और एकत्व आदिके दुःखमय भेद किस निमित्तसे रह सकते हैं ? दृश्यका अत्यन्ताभावरूप जो बोध है, उसीको परमपद कहा गया है। वही ब्रह्म है और 'वह ब्रह्म मै हूँ' इस प्रकारका ज्ञान मोक्ष है। ब्रह्म ही सब कुछ है। (क्योकि 'सर्वंमभवत्' इस श्रुतिसे यही बात सिद्ध होती है) तथा वह कुछ भी नहीं है। (क्योंकि 'नेति-नेति' कहकर श्रुतिने इसीका समर्थन किया है)। रघुनन्दन ! ज्ञानी पुरुष ब्रह्मको इसी रूपमें जानता है। सम्यक् ज्ञानसे परम निर्वाणरूप मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है। उसमें ज्यों-का-त्यों स्थित हुआ यह सारा विश्व अत्यन्त प्रलयको प्राप्त हो जाता है। वहाँ न अनेकत्व है, न एकत्व; न कुछ है, न कोई है। वह समस्त सदसद्भावोंकी सीमाका अन्त कहा गया है। जहाँ दृश्यकी सत्ता अत्यन्त असम्भव है, जो शुद्ध बोधका उदय रूप है, जहाँ समस्त विक्षेपोका अभाव हो जाता है तथा जो निरतिशयानन्दरूपसे स्थित और परम शान्त है, उस चिन्मय परमात्माको ही परमपद समझना चाहिये।
यह परमात्मा जबतक अज्ञान रहता है, तभीतक अविद्या-रूप मलकी स्थिति है। उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर सब कुछ विशुद्ध परब्रह्म ही है, यह अचल निश्चय हो जाता है। जो अनादि, अनन्त, चिन्मय परमाकाशरूप है, उस परमात्मामें मल कहाँसे हो सकता है (क्योकि ज्ञान होते ही अविद्यारूपी मल घुल जाता है)। प्रिय श्रीराम ! विचारदृष्टिसे देखा जाय तो कुछ भी स्फुरित नहीं होता है; क्योकि यह परम चेतन तो अत्यन्त विशुद्ध कहा गया है। जो एकमात्र सच्चिदानन्दमय है, उसका अपने आपमें कल्पित संकल्प ही इस दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें फैला हुआ है। वास्तवमें तो परब्रह्ममे न पृथ्वी आदि भूत हैं, न शरीर है और न चैतन्यसे भिन्न दूसरा ही कोई दृश्यभाव है; किंतु एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही अपने संकल्पद्वारा
१०२—**श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा
६६२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
समष्टि मनोरूप होकर जगत्के आकारमें बारंबार स्फुरित हो रहा है । विचारदृष्टिसे देखनेपर यह जगत्का स्फुरण भी कुछ नहीं है । केवल सच्चिदानन्दघन ही स्वयं अपने स्वरूपमें भासित हो रहा है । जहाँसे वाणीं लौट आती है, उस निरतिशयानन्दमय परमपदकी प्राप्तिसे तूष्णीम्भाव—स्वरूपभूत निश्चञ्चता ही शेष रहती है ( वह निश्चञ्चता व्यवहारकालमे भी नहीं हटती है ) । जीवन्मुक्त पुरुष संसारके व्यवहारमे तत्पर रहता हुआ भी शुद्ध चिदाकाशरूप ही होता है और उसी रूपमें वह मुक्तवत् स्थित रहता है । ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! चिदाकाश, ब्रह्म, चिन्मात्र, आत्मा, चिति, महान् और परमात्मा—इन सब शब्दोंको पर्यायवाची ( समानार्थक ) ही समझना चाहिये । ब्रह्म नेत्रकी भाँति उन्मेष और निमेषरूप है अथवा वायुके समान स्पन्द और अस्पन्दरूप है । उसका जैसा प्रलयरूप निमेष है, वैसा ही सृष्टिरूप उन्मेष भी है । इन्हींका नाम जगत् है । उसने आँखें खोलीं तो संसारकी सृष्टि हो गयी और आँखें बंद कीं तो जगत्का प्रलय हो गया । परंतु वह परब्रह्म परमात्मा निमेष और उन्मेष—दोनों अवस्थाओमें एकरूप ही रहता है । सौम्य रघुनन्दन ! इस कारण यह सम्पूर्ण जगत् जिस रूपमें स्थित है, इसी रूपमें इसे शान्त, अजन्मा, अजर, सभी अवस्थाओंमें सत् और चिदाकाशरूप ही समझना चाहिये ।
जिसका चित्त जिस वस्तुमें रस लेता है, उसका वह चित्त वैसा ही हो जाता है । अतः एकमात्र परब्रह्म परमात्माका रसिक हुआ जो ज्ञानीका मन है, वह ब्रह्मभाव को ही प्राप्त हो जाता है और जिसका मन जिसमें रस पाता है, उसने उसीको सत् समझा है । जिसकी ज्ञानदृष्टिमें दृश्य-अदृश्य, सत्-असत् तथा मूर्त-अमूर्त सब कुछ ब्रह्म ही है, उसकी दृष्टिमें यहाँ अथवा और कहीं भी न तो कर्त्ता-भोक्ता जीवकी सत्ता है और न उसका अभाव ही ( क्योंकि एकमात्र वही ब्रह्मरूपसे शेष रह जाता है ) ।
सहस्रों वादी मिलकर भी सत्से अतिरिक्त वस्तुकी सत्ताका उपपादन नहीं कर सकते तथा उससे भिन्न जगत्का कोई यथार्थ कारण नहीं उपलब्ध होता । इसलिये स्वतः यह बात सिद्ध हो गयी कि आदिकालसे ही चिदाकाश अपने आपको ही दृश्यरूपसे देखता है ।
जैसे स्वप्नमें स्वयं चिन्मय जीवात्मा ही स्वप्न-जगत् के रूपसे भासित होता है, वैसे ही यहाँ सृष्टिके आरम्भ में चिदाकाशके सिवा इस दृश्यका अन्य कोई कारण नहीं पाया जाता । ( सर्ग १७४-१७६ )
सृष्टिकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें कोई अज्ञानी है ही नहीं ( वह एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुको देखता ही नहीं है ) । अतः जिसका अस्तित्व ही नहीं है, ऐसे आकाश-वृक्षके सदृश अज्ञानीके विषयमें विचार करना कैसा होगा ? अज्ञानका बोधस्वरूप आत्माके ही भीतर भान होता है; अतः वही उसका अधिष्ठान है । जगत् अज्ञानका अङ्ग है, अतः अज्ञानरूप ही है । जैसे स्वप्न और सुषुप्ति—दोनों निद्राके अन्तर्गत होनेसे निद्राके ही अङ्ग हैं; इसलिये उन्हें केवल निद्रारूप ही कहा जा सकता है, वैसे ही जगत्का स्वरूप भी अपने अधिष्ठानभूत चिन्मय परमात्मासे भिन्न नहीं है । जैसे शुद्ध जलराशिमें लहर, भँवर और द्रवता आदिके रूपमें जल ही प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्ममें सर्ग नामक ब्रह्म ही भासित होता है । जैसे निर्मल वायुमें स्पन्दन, आवर्त्त और विवर्त्त आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मरूप वायुमें सृष्टिरूपी स्पन्दन भासित होता है । जैसे महाकाशमें अनन्तता, छिद्रता और शून्यता आदि
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना * ६६३
आकाशरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सृष्टि भी परात्पर ब्रह्मरूप ही है। जैसे निद्रा आदिमे स्पष्टरूपसे उपलब्ध होनेपर भी ये सारे स्वप्नगत पदार्थ असन्मय ही हैं, उसी प्रकार ये सृष्टिके पदार्थ भी हैं, अतः इनकी सत्ता नहीं है। परंतु सत्स्वरूप परमात्मामें उपलब्ध होनेके कारण उससे अभिन्न ही हैं। जैसे निद्राकालमें मनुष्य एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थित होता है, वैसे ही अजन्मा परमात्मा अपनी सत्तामें ही एक सर्गसे दूसरे सर्गके रूपमें स्थित होते हैं। जैसे साम्प्रतिक सर्वदर्शनरूप परमात्मामें वर्तमान घट, पट आदि शब्द और उनके अर्थ स्थित हैं, उसी प्रकार अद्वितीय महाचैतन्यरूप परमात्मामें भूत और भविष्य कालकी सारी सृष्टियाँ स्थित हैं। जैसे परमात्मामें ही सृष्टिरूप परमात्माका भान होता है, वैसे ही चितिमें ही चिन्मय शब्द और उनके अर्थभूत सर्गोंका चितिके द्वारा ही भान होता है।
इस जगत्में न कोई आकृति है, न संसार है, न संसारका अभावरूप मोक्ष है, न जन्म है, न नाश है, न सत्ता ( भावविकार ) है और न असत्ता ही है। केवल परम शान्त ब्रह्मका ही अपने आपमें स्फुरण होता है अथवा यहाँ ब्रह्मसे भिन्न किसी प्रकारका स्फुरण भी नहीं है। यद्यपि ब्रह्म अनेकानेक सृष्टिरूपी पुतलियोंके समुदायसे भरा हुआ है, तथापि वस्तुतः उसमें जगतरूपी लताएँ, उनकी चोटियाँ, जड़ें, उनकी रचनाएँ और उनकी जड़ोंका भूमिमें प्रवेश—ये सब अलभ्य हैं। वह आदि-अन्तसे रहित है, कालके द्वारा भी उसके जन्म और नाश नहीं होते तथा वह पूर्णरूपसे विशुद्ध एवं सच्चिदानन्दघन है।
चिन्मय प्रकाशरूप परमार्थकाश ही, जो सब पदार्थोंसे रहित है, स्वप्नकी भाँति द्रष्टा, दृश्य और दर्शन रूपसे प्रतीत हो रहा है। इसलिये यह जगत् एकमात्र चेतनाकाश ही है। आकाशमें भ्रमवश होनेवाली वृक्षसमूहोंकी स्फुरणाके समान ब्रह्मरूपी समुद्रमें जो नाम-रूपात्मक जलकणोंका स्फुरण हो रहा है, वही यह सृष्टि है। आकाशमें जो वृक्षसमूहकी प्रतीति होती है, वह तो आकाशसे भिन्न-सी लगती है; क्योंकि उसमें आकाशकी शून्यता नहीं दिखायी देती। परंतु परमब्रह्मरूपी महासागरमें जो सृष्टिरूपी जलबिन्दु विद्यमान हैं, वे उससे किंचिन्मात्र भी भिन्न नहीं हैं।
( सर्ग १७७-१७९ )
श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना और वसिष्ठजीके पूछनेपर कुन्ददन्तका अपने संशयकी निवृत्ति तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिको स्वीकार करते हुए अपना अनुभव बताना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मेरे मनमें एक संदेह है, आप उसका निवारण कीजिये। एक दिनकी बात है, मैं विद्यामन्दिरके भीतर विद्वानोंकी सभामें बैठा था। उसी समय विदेह जनपदसे वहाँ एक श्रेष्ठ तपस्वी श्रीसम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण आया। आकर उसने उस ब्राह्मणसभाको प्रणाम किया। फिर जब वह एक आसनपर बैठा, तब मैने भी उठकर उसे प्रणाम किया और पूछा—'ब्रह्मन् ! आप लंबा रास्ता तय करके आये हैं; इसलिये थक गये होगे। किसी विशेष उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यत्नशील-से दिखायी देते हैं। बताइये, आज कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है?'
ब्राह्मणने कहा—महाभाग ! आपका कहना ठीक है। मैं अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विशेष प्रयत्नशील हूँ। यहाँ जिस प्रयोजनसे आया हूँ, उसे भी सुन लीजिये। मैं विदेह देशका ब्राह्मण हूँ और विद्याध्ययन कर चुका हूँ। मेरे दाँत कुन्दके फूलकी भाँति उज्ज्वल
६६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हैं; इसलिये मुझे लोग 'कुन्ददन्त' कहते हैं। एक दिन मेरे मनमें संसारसे वैराग्य हुआ और मैं भ्रमजनित क्लेशकी शान्तिके लिये देवताओ, ब्राह्मणो तथा मुनीश्वरोंके स्थानोंमें भ्रमण करने लगा। तब श्रीपर्वतपर एक तपस्वीसे भेंट होनेपर वे मुझे गौरी-आश्रममें स्थित वृद्ध तपस्वीके पास ले गये। वृद्ध तपस्वीने श्रीपर्वतवासी तपस्वीकी, उनके सात भाइयोकी, उन सबके तपकी, वरदान और शापकी एवं घरके अंदर ही उन सातोंके सप्तद्वीपाधिपति होकर अन्तमें प्रलय-कालमें विलीन होनेकी बाते बतायीं। तदनन्तर उन आठवें अपने मित्र तपस्वीकी मृत्युसे दुखी हुआ मै उन कदम्ब वृक्षके नीचे रहनेवाले तपस्वीके पास गया। वे तीन मास प्रतीक्षा करनेके बाद समाधिसे विरत हुए। तब मैने नम्रतापूर्वक उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया। इसपर वे इस प्रकार बोले।
कदम्ब वृक्षके नीचे रहनेवाले तपस्वीने कहा—निष्पाप ब्राह्मण ! मैं समाधिसे विरत होकर एक क्षण भी नहीं रह सकता; अतः शीघ्र ही बड़ी उतावलीके साथ मैं फिर समाधिमें ही प्रवेश करूँगा। इस समय मेरा वास्तविक उपदेश भी अभ्यासके बिना तुम्हें नहीं लगेगा। इसलिये दूसरी युक्ति सुनो और वैसा ही करो। अयोध्या नामसे प्रसिद्ध जो पुरी है, वहाँ दशरथ नामक राजा राज्य करते हैं। उनके पुत्र श्रीराम नामसे विख्यात हैं। तुम उन्हींके पास चले जाओ। उनके कुलगुरु मुनिवर वसिष्ठ सभामें मोक्षके उपायकी दिव्य कथा कहेंगे। ब्रह्मन् ! चिरकालतक उस कथाको सुनकर तुम भी मेरी ही भाँति पावन परमपदमें विश्राम प्राप्त करोगे।
ऐसा कहकर वे तापस मुनि समाधिरूपी अमृतके महासागरमें निमग्न हो गये और मै इस देशमें आपके पास आया हूँ।
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—गुरुदेव ! वही यह कुन्ददन्त नामक द्विज है, जिसने मेरे पास बैठकर यहाँ मोक्षोपाय नामक इस सम्पूर्ण संहिताको सुना है। आप इससे पूछिये। इसका संशय निवृत्त हुआ या नहीं।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठने कुन्ददन्तकी ओर देखकर पूछा—'निष्पाप विप्रवर कुन्ददन्त ! कहो, क्या तुमने मेरे इस उत्तम मोक्षदायक उपदेशको सुनकर ज्ञेय तत्त्वको जाना?'
कुन्ददन्त बोला—भगवन् ! समस्त संशयोंका विनाश करनेवाला मेरा चित्त ही इस समय मेरी विजयका सूचक है। मेरे सारे संदेहोंकी निवृत्ति हो गयी और मैने अवश्य जाननेके योग्य अखण्ड ब्रह्मतत्त्वको जान लिया। विशुद्ध ज्ञेय तत्त्वका मुझे ज्ञान हो गया। मैने क्षयरहित द्रष्टव्य वस्तुका दर्शन कर लिया और पाने योग्य सब कुछ मैं पा गया। इस समय ब्रह्मरूप परमपदमें विश्राम कर रहा हूँ। मैने आपके मुखसे सुनकर चिन्मय परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लिया। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब परमार्थ सच्चिदानन्दघनरूपी मेघ है, जो चिन्मय आकाशमें अपनेसे अभिन्न जगत्के रूपमें छाया है। सर्वात्मक होनेके कारण सर्वरूपी सर्वव्यापी परमात्माका सर्वत्र, सदा सबके द्वारा और सब कुछ होना पूर्णरूपसे सम्भव है। सरसोंके एक दानेके छिद्रके भीतर असंख्य ब्रह्माण्डोंका किस प्रकार होना सम्भव है और किस प्रकार उनका होना कदापि सम्भव नहीं है, यह सब मैने पूर्णरूपसे समझ लिया। जो-जो वस्तु जब जिस रूपमें यहाँ भासित होती है और सम्पूर्ण प्राणियोंके अनुभवमें आती है, वह-वह उस समय उस रूपमें केवल सर्वघन परमात्मा ही है। इस तरह विचार करनेसे सिद्ध हो जाता है कि सब कुछ आदि-अन्तसे रहित एक नित्य विज्ञानानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है।
(सर्ग १८०—१८४)
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है * ६६५
सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है, वह ब्रह्मका संकल्प होनेसे उससे भिन्न नहीं है; जीवात्माको अज्ञानके कारण ही जगत्की प्रतीति होती है—इसका प्रतिपादन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कुन्ददन्तके इस प्रकार कहनेपर प्रशंसनीय महात्मा भगवान् वसिष्ठ मुनिने यह परमार्थोचित वचन कहा ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—हर्षकी बात है कि महात्मा कुन्ददन्तको शास्त्रश्रवणसे विज्ञानानन्दघन परमात्मामें विश्राम प्राप्त हो चुका है। सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म ही है—इस तत्त्वको ये हाथपर रखे हुए आँवलेकी तरह देख रहे हैं। निश्चय ही भ्रममात्र जिसका स्वरूप है, ऐसा यह विश्व इन्हें अजन्मा ब्रह्म ज्ञात होने लगा है। भ्रान्ति इनके लिये ब्रह्मरूप ही हो गयी है। वही ब्रह्म जो शान्त, एक और निर्विकार है। जो जैसे, जिसके द्वारा, जहाँ, जिस प्रकारका, जितना, जब और जिस हेतुसे है, वह वैसे, उसके द्वारा, वहाँ, उस प्रकारका, उतना, उस कालमें और उसी हेतुसे कल्याणमय, शान्त, जन्मादिरहित, मौन, अमौन, अजर, सर्वव्यापी, सुशून्य, अशून्य, आदि-अन्तसे रहित एवं अक्षय ब्रह्म ही है। व्यवहारमें ब्रह्म स्वयं दृश्य, स्वयं द्रष्टा, स्वयं चेतन, स्वयं जड़, स्वयं सब कुछ और स्वयं कुछ भी नहीं है। वास्तवमें वह सच्चिदानन्द परमात्मा अपने आपमें ही स्थित है। दृश्यजगत् ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही दृश्यजगत् है। यह न तो शान्त है, न अशान्त है; न निराकार है और न साकार ही है ।
जैसे जागनेपर स्वप्न आदि निराकार भासित होते हैं, वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार हो जानेपर यह शरीर भी निराकार ही प्रतीत होता है। चैतन्यमात्र ही इसका स्वरूप है। यह स्वप्नकी भाँति अनुभवमें आनेपर भी असत् ही है। ये भ्रमवश दिखायी देनेवाले सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदि भाव वास्तवमें नहीं हैं। जैसे चित्रलिखित चित्रवधू चित्रसे अतिरिक्त नहीं है, वैसे ही यह दृश्यमान जगत् परमात्मासे भिन्न नहीं है। जैसे चित्रकारद्वारा बनायी जानेवाली चित्रगत सेना बुद्धिस्थ चित्रसे भिन्न नहीं है, वैसे ही ब्रह्मकी चित्ता-दशामें मूर्त सृष्टि नाना रूपोंमें प्रतीत होती हुई भी उससे भिन्न न होनेके कारण नानात्वसे रहित है।
रघुनन्दन ! जैसे समुद्रमें जलराशिका स्फुरण होनेपर ही उसमें भँवर उठते हैं, उसी प्रकार विशुद्ध चिदाकाशका अपने सत्यसंकल्पके अनुसार जो स्फुरण है, उसीको जगत् कहते हैं । परमात्मचैतन्यमें समुद्रमें जलराशिकी भाँति वस्तुतः चिदात्मक जगद्भावोंका जो अकस्मात् भान होता है, उसे मनीषी पुरुष संकल्प आदि नाम देते हैं। कालसे, अभ्यासयोगसे, विचारसे, समभावसे, जातिकी सात्त्विकतासे और अन्तःकरणके सात्त्विक एवं निर्मल होनेसे सम्यग्ज्ञानसम्पन्न यथार्थदर्शी तत्त्वज्ञ पुरुषकी बुद्धि द्वैत और अद्वैतसे रहित चिन्मात्रस्वरूप हो जाती है । चिदाकाशरूप परमात्मा चिदाकाशमें ही स्फुरित होनेवाले अपने इस रूपको—द्रष्टा-दृश्यरूप जगत्को देखता हुआ सदा साक्षीरूपसे प्रकाशित होता है। वह उससे भिन्न नहीं है। एक चेतनसत्ताके उपजीवी होनेसे द्रष्टा और दृश्य दोनों एक हैं; क्योंकि चिदाकाश सर्वव्यापी है। जैसे शून्यत्व और आकाशमें कोई भेद नहीं है, उसी तरह जगत् और ब्रह्ममें भी भेद नहीं है ।
श्रीराम ! सृष्टिके आरम्भकालमें परमात्माके मनमें अपने प्रकृतिसहित विलीन हुए प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मवासनानुसार जो कुछ नियत रूपसे भान हुआ, वह जैसा था और जिस प्रकारके कार्य-कारणभावसे स्थित था, वह आज भी उसी रूपमें स्थित है और वही जगत् कहलाता है । सर्वशक्तिमान् परमात्माको जिस-जिसका जैसे संकल्प होता है, वह-वह उसी रूपमें हो जाता
६६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
है। सत्यसंकल्प परमात्माकी संवित् (अनुभूति) मात्ररूप है। अतः उसे जिस वस्तुका भान हुआ, वह अभानरूप कैसे हो सकता है ?
रघुनन्दन ! चेतन जीवकी जो उत्पत्ति बतायी गयी है, उसका अभिप्राय इतना ही है कि जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, यह बात समझमें आ जाय। जीवकी उत्पत्ति वास्तविक है, यह बताना अभीष्ट नहीं है। वस्तुतः चेतनस्वरूप जीव चिन्मय परब्रह्म परमात्माका अंश है; इसलिये कृत्रिम नहीं है। किंतु अज्ञानसे चेत्य अर्थात् दृश्य जगत्की ओर उन्मुख हो जानेके कारण ही वह जीव शब्दसे कहा जाता है। जीवनसे अर्थात् प्राण और कर्मेन्द्रियोंको धारण करनेसे तथा चेतनसे अर्थात् ज्ञानेन्द्रियोंको धारण करनेसे वह जीव कहलाता है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस यथार्थ आत्मस्वरूपको भूलकर चिन्मय जीवात्मा जब यह देखने लगता है कि मैं यह मनुष्य आदि शरीर हूँ और यह पृथ्वी आदि मेरा आधार है, तब वह उसीमें दृढ़ आस्था बाँध लेता है। असत्यमें सत्यबुद्धि करके ही जीव भावनावश बँध जाता है और अपने भीतर बारंबार भावना एवं नानात्व-का अनुसरण करने लगता है। जो जिसमें अत्यन्त आसक्त होगा, वह उसे क्यों न देखेगा ? जगत्की जो भ्रान्ति हो रही है, वह असत्य ही है, तो भी भावनाके कारण इस प्रकार प्रौढ़ताको प्राप्त हो गयी है। सबके कारणभूत सनातन ब्रह्मसे भिन्न दूसरा कोई जगत्का कारण नहीं है। वह कारण भी कार्यताके बिना सम्भव नहीं है और निर्विकार कूटस्थ सच्चिदानन्दघन अद्वितीय ब्रह्ममें कार्यता और कारणता आदिका होना कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये इस जगत्की प्रतीति अज्ञानके कारण ही हो रही है।
(सर्ग १८६–१८९)
श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानकी ज्ञेयता-पत्ति अर्थात् जो ज्ञानस्वरूप है, उसे ज्ञेय—जड दृश्य समझ लेना ही बन्धन है और उस ज्ञेयता—जड दृश्यबुद्धिका सर्वथा निवारण ही मोक्ष कहलाता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! ज्ञानकी ज्ञेयता-बुद्धिका निवारण कैसे होता है ? उस ज्ञेयता-बुद्धिका सर्वथा निवारण हो जानेपर यहाँ बन्धताबुद्धि कैसे निवृत्त होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—शम, दम आदि साधनोंसे युक्त सच्चिदानन्द परमात्माका सम्यग्ज्ञानरूप प्रबोध प्राप्त होनेसे भ्रान्ति-बुद्धि दूर हो जाती है। उस भ्रान्ति-बुद्धिके दूर हो जानेपर इस प्रकार ज्ञेयता—जड दृश्यबुद्धिकी अत्यन्ता-भावरूपा परम शान्तिमयी स्वरूपभूता निराकार मुक्ति प्राप्त होती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! कैवल्य बोधरूप सम्यग्ज्ञान क्या कहलाता है, जिसकी पूर्णरूपसे प्राप्ति हो जानेपर यह जीव बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सबका अधिष्ठानभूत जो चिन्मात्र ज्ञान है, वह त्रिकालमें भी ज्ञेयरूप नहीं हो सकता। वह केवल अन्वय ज्ञान अवर्णनीय है। इस प्रकार जो आन्तरिक बोध है, उसे सम्यग्ज्ञान कहा गया है।
श्रीरामजीने पूछा—ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्माके अंदर उससे भिन्न ज्ञेयता क्या है ? यह बताइये, साथ ही इस बातपर भी प्रकाश डालिये कि 'ज्ञान' शब्दकी व्युत्पत्ति कैसे करनी चाहिये। अवबोधनार्थक 'ज्ञा' धातुसे भावमें ल्युट् प्रत्यय होनेपर ज्ञान शब्द बनता है या करणमें प्रत्यय होनेपर ?*
* 'ल्युट् च' (पा० सू० ३।३।११५) इस सूत्रसे भावमें ल्युट् प्रत्यय होता है तथा 'करणाधिकरणयोश्च' (पा० सू० ३।३।११७) इस सूत्रसे करण और अधिकरण अर्थमें ल्युट् प्रत्यय होता है। 'भावमें' प्रत्यय होनेपर ज्ञान शब्दका अर्थ होगा—जानना, समझना, बोध होना। करणमें प्रत्यय होनेपर ज्ञानका अर्थ होगा—ज्ञानका साधन, जिससे जाना जाय वह करण।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६६७
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! बोधमात्र ही ज्ञान है। अतः यहाँ भावसाधनमात्र ज्ञानको ही ग्रहण किया गया है अर्थात् भावमें प्रत्यय करनेसे जो ज्ञान शब्द बनता है, वही यहाँ अभीष्ट है। ज्ञान और ज्ञेयमें कोई भेद नहीं है, जैसे पवन और स्पन्दनमें (वायु और उसकी गतिशीलतामें) भेद नहीं होता है।
श्रीरामजीने पूछा— यदि ऐसी बात है तो यह ज्ञान, ज्ञेय आदिका भ्रम, जो खरगोशके सींगकी भाँति मिथ्या ही है, तीनों कालोंमें व्यवहारके योग्य कैसे सिद्ध होता है !
श्रीवसिष्ठजीने कहा— बाह्य पदार्थोंके भ्रमसे ही यहाँ भ्रमबुद्धि उत्पन्न हुई है, ऐसा जानना चाहिये। वास्तवमें किसी ही बाह्य अथवा आभ्यन्तरिक पदार्थका अस्तित्व सम्भव नहीं है। इसलिये ज्ञान और ज्ञेय आदिका भेद-भ्रम मिथ्या ही है। (स्वप्नकालमें अथवा भ्रान्तिज्ञानमें सहस्रों असत् पदार्थ व्यवहारमें आते हैं। अतः यह ज्ञान और ज्ञेय आदिका भ्रम असत्य होनेपर भी इसका अज्ञानियोंके व्यवहारमें आना असम्भव नहीं है।)
श्रीरामजीने पूछा— मुने ! तुम, मैं आदि जो यह प्रत्यक्ष दृश्यपदार्थ हैं, जो भूत आदिरूपसे अनुभवमें आता है, वह है ही नहीं, यह कैसे समझा जाय ? कृपया मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— निष्पाप रघुनन्दन ! सृष्टिके आरम्भकालमें विराट् पुरुष ब्रह्मा आदिके रूपमें कोई भी पदार्थ उत्पन्न ही नहीं हुआ। इसलिये किसी ज्ञेय अथवा दृश्य वस्तुकी सत्ता सम्भव ही नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा— मुने ! भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें होनेवाला जो यह जगत्का दर्शन है, जिसका प्रतिदिन सबको अनुभव हो रहा है, इसके होते हुए आप यह कैसे कह रहे हैं कि यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ; इसलिये कभी किसीको इसका दर्शन भी नहीं हुआ।
सं० यो० व० अं० २३—
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! स्वप्नके पदार्थ, मृगतृष्णाका जल तथा संकल्पित पदार्थ— ये सब न तो कभी उत्पन्न हुए और न वास्तवमें कभी देखे गये। फिर भी, भ्रमवश इनकी प्रतीति हो जाती है। इसी तरह मैं, तुम आदि रूप जो जगत् है, यह न कभी उत्पन्न हुआ और न तत्त्वदृष्टिसे देखनेपर कभी उपलब्ध ही हुआ। इसलिये सर्वथा मिथ्या है, तथापि भ्रमवश इसकी प्रतीति होती है।
श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! मैं, तुम, यह इत्यादि रूपसे पूर्णतः अनुभवमें आनेवाला यह जगत् सृष्टिके आदिमें उत्पन्न ही नहीं हुआ, यह कैसे समझा जाय ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! कारणसे ही कार्य उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं। यह एक निश्चित सिद्धान्त है। प्रलयकालमें तीनों लोकोंका जो पूर्णतः लय हो गया, तब पुनः इसकी उत्पत्तिके लिये कोई कारण ही नहीं रह गया था (कारण न होनेसे सृष्टि हुई ही नहीं, इसलिये जो कुछ दीखता है, सब मिथ्या प्रतीति मात्र है)।
श्रीरामजीने पूछा— मुने ! महाप्रलय हो जानेपर जो अजन्मा, अविनाशी परब्रह्म अवशिष्ट रह गया, वही नूतन सृष्टिकी उत्पत्तिका कारण कैसे नहीं हो सकता ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! कारणमें जो कार्य सद्रूपसे विद्यमान है, वही उससे प्रकट होता है, जो उसमें है ही नहीं, वह कैसे प्रकट हो सकता है। क्या कभी घटसे पटकी उत्पत्ति होती है ? कभी नहीं।
श्रीरामजीने कहा— महाप्रलय आनेपर जगत् सूक्ष्मरूपसे ब्रह्ममें रहता है। वही सृष्टिके समय पुनः उससे प्रकट हो जाता है।
श्रीवसिष्ठजी बोले— परम बुद्धिमान् निष्पाप रघुनन्दन ! महाप्रलयके अन्ततक उस ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका
६६८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमांनस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
किसने अनुभव किया है तथा उसकी वह सत्ता वहाँ किस रूपमें रहती है !
श्रीरामजीने कहा—ब्रह्ममें जगत्की सत्ता उस समय ज्ञानस्वरूपा ही होती है और ज्ञानियोंके अनुभवमें भी आती है। अतः वह प्राकृत आकाशके समान शून्य-रूप तो नहीं होती। इसलिये उस सत्ताको असत् नहीं कहा जा सकता।
श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहो ! यदि ऐसी बात है तो वह ज्ञान ही तीनों लोकोंका स्वरूप है। किंतु जो विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है, उसके जन्म और मरण कैसे हो सकते हैं ?
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! यदि इस प्रकार सृष्टि उस ब्रह्ममें स्थित नहीं है तो यह भ्रान्ति कहाँसे और कैसे आ गयी ! यह मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! कार्य-कारणताका अभाव होनेसे ही ब्रह्ममें न सृष्टि है न प्रलय। यह जो जगत् भासित होता है, वह जिसको और जिस रूपमें भास रहा है। वह सब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटी केवल आत्मा ही है।
श्रीरामजीने पूछा—यह बात तो असंगत-सी लगती है। जो यन्त्रका चालक चेतन है, वह जड यन्त्र-रूप कैसे हो सकता है ? द्रष्टा ईश्वर स्वयं ही दृश्य कैसे बन सकता है ! काठ दाहक बनकर अग्निको जला दे, क्या यह कभी सम्भव है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! द्रष्टा दृश्यभावको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि दृश्यकी सत्ता सम्भव ही नहीं है। केवल द्रष्टा ही प्रकाशित होता है, जो एकमात्र सच्चिदानन्दघनस्वरूप एवं सर्वात्मा है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! तब सृष्टिके आदिमें अनादि, अनन्त, शुद्ध चिन्मय ब्रह्म ही जगत्का संकल्प करता है। इसीसे इस जगत्का भान होता है। यदि ऐसा न होता तो चेत्य जगत्का प्राकट्य कैसे हो सकता था ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—किसी भी चेत्यकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है। चेत्यके अत्यन्त अभावके ही कारण चेतनकी नित्यमुक्तता और अवर्णनीयता सिद्ध होती है।
श्रीरामजीने पूछा—यदि ऐसी बात है तो ये अहंता आदि चेत्य कैसे और कहाँसे उत्पन्न हुए हैं, जगत्का भान कैसे होता है और स्पन्दन आदिका अनुभव क्यों होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! मैं पहले ही बता चुका हूँ कि कारणकी सत्ता न होनेसे आदिकालमें ही किसी वस्तुकी उत्पत्ति नहीं हुई थी। ऐसी दशामें चेत्य कहाँसे होगा ? इसलिये सब कुछ शान्तस्वरूप परब्रह्म ही है। सृष्टिकी प्रतीति केवल भ्रममात्र है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जो वाणीकी पहुँचसे बाहर है, चेत्य और चलन आदिसे रहित है, सदा स्वप्रकाश और निर्मक है, उस नित्यमुक्त परब्रह्ममें किसको किस निमित्तसे और कैसा भ्रम हो सकता है ( जब ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं और वह नित्यमुक्त ज्ञानस्वरूप है तो उसमें किसको और कैसे भ्रम हो सकता है ! फिर यह जगत् नामक भ्रम क्या बला है ! ) इसका उत्तर मुझे दीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सृष्टिरूप भ्रमका कोई कारण नहीं है; इसलिये यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि उसकी सत्ता त्रिकालमें भी नहीं है। तुम, मैं आदि सब कुछ एकमात्र शान्तस्वरूप निर्विकार ब्रह्म ही है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! फिर तो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, भेद, संकल्प और चित्त सभी वस्तुओंकी उत्पत्ति
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६६९
| असम्भव ही है, फिर इन सबकी सत्ता कैसे उपस्थित हो गयी ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! देश, काल, क्रिया, द्रव्य, भेद, संकल्प और चित्त इन सबकी सत्ता अज्ञानमात्र ही है। अज्ञानसे भिन्न इनकी सत्ता न है, न पहले कभी थी।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! तत्त्वदृष्टिसे कारणके अभावमें द्वैत और एकत्वकी सम्भावना ही नहीं रह जाती। फिर न कोई बोध्य रह जाता है न बोधक। बोध्य-बोधकके अभावमें बोधका होना भी कैसे सम्भव होगा ? ( जिसका बोध होता है वह कर्म कारक तो होना ही चाहिये। कर्म माननेपर द्वैतकी आपत्ति होती है और कर्म न माननेपर बोध किस वस्तुका हो, यह प्रश्न खड़ा हो जाता है।)<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अज्ञानी जीव ही बोधके द्वारा अपने अज्ञानविनाशरूप फलका आश्रय होकर आत्मबोधता (बोधकर्मता) को प्राप्त होता है। इसीसे बोध शब्द भी बोध्यता (बोधरूप फलवाली सकर्मकता) को प्राप्त होता है। ये सब बातें अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही कहने योग्य हैं। हम-जैसे जीवन्मुक्तोंके लिये नहीं (जीवन्मुक्त पुरुष तो ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटीसे रहित हो शुद्ध ज्ञानस्वरूप हो जाता है। उसके लिये बोधकी सकर्मकताका निरूपण अनावश्यक हो जाता है)।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! 'मैं जीवन्मुक्त हूँ' ऐसा अनुभव होनेसे यह सिद्ध है कि बोध ही अहंकाररूप परिणामको प्राप्त होता है। यह बोध अहंभावको प्राप्त हुआ तो यथार्थ बोध नहीं रह गया। उसमें भिन्नता आ गयी। अनन्त, जलसे भी बढ़कर निर्मल, चिन्मय, परमात्मस्वरूप आप-जैसे जीवन्मुक्त पुरुषोंमें यह बोधभिन्न अहंता कैसे सम्भव होती है ? | श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! बोधस्वरूप जीवन्मुक्तकी स्वरूपभूता जो बोधता है, वही उसमें विशुद्ध अहंता कहलाती है। तत्त्वज्ञानीका मैं और तुम भी उसके स्वरूपभूत ज्ञानसे भिन्न नहीं हैं। उसमें जो द्वैतरूप व्यवहार देखा जाता है, वह वायु और उसके स्पन्दनकी भाँति अद्वैतरूप ही है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! संसारको स्वप्नकी भाँति मिथ्या समझ लेनेमात्रसे कौन-सा अभीष्ट फल सिद्ध होता है ? स्वप्न आदिमें पदार्थोंकी साकारता कैसे शान्त होती है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अध्यात्मशास्त्रके पूर्वापरके विवेकपूर्वक विचारसे ज्ञानोदय होनेपर पदार्थोंमें साकारता या स्थूलताकी भावना शान्त हो जाती है। वे सब-के-सब चिन्मय ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा अटल निश्चय हो जाता है। इसी तरह स्वप्नके पदार्थोंमें भी (जागनेपर) स्थूलताकी भावना निवृत्त हो जाती है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—जिसकी भावना स्थूलताको छोड़कर अत्यन्त सूक्ष्मताको प्राप्त हो गयी है, वह जगत्को कैसा देखता है ? उसका यह संसारभ्रम कैसे शान्त होता है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—वासनाके क्षीण हो जानेपर पुरुष जगत्को उजड़ा हुआ, असत्के सदृश, आकाशमें दीखनेवाले गन्धर्वनगरके समान और वर्षाद्वारा मिटाये गये चित्रके तुल्य देखता है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—मुने ! वासनाके क्षीण हो जानेपर जिसके लिये जगत्की स्थिति स्वप्नके तुल्य हो जाती है, उस पुरुषकी जागतिक पदार्थोंके विषयमें जब स्थूलताकी भावना मिट जाती है, तब फिर क्या होता है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी दृष्टिमें जगत् केवल संकल्परूप है, उस पुरुषकी वह अति सूक्ष्म वासना भी उत्तरोत्तर क्रमसे विलीन हो जाती है। |
६७० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इस तरह सर्वथा वासनाशून्य होकर वह शीघ्र ही निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो अनेक जन्मोंसे बद्धमूल अनेक शाखा-प्रशाखाओंसे सुशोभित तथा जन्म-मरणरूपी बन्धनमें डालनेवाली है, वह घोर वासना किस उपायसे पूर्णतः शान्त हो जाती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यथार्थ तत्त्वज्ञानसे जब यह भ्रममात्र दृश्यचक्र स्थूलरूपतासे रहित अनुभूत हो जाता है, तब क्रमशः उसकी वासनाका क्षय होने लगता है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जब दृश्यचक्र स्थूलाकारतासे रहित अनुभूत हो जाता है, तब और क्या होता है ? पूर्ण शान्ति कैसे होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! स्थूलाकारताका भ्रम मिट जानेपर जब जगत्की केवल चित्तमात्ररूपता अवगत हो जाती है और चित्तवृत्तियोंके निरोधसे जगत्में गौरवबुद्धि नहीं रहती है, तब जगत्के प्रति होनेवाली आस्था शान्त हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! चित्त कैसा है ? उसका विचार कैसे किया जाता है ? और उसके स्वरूपका भलीभाँति विचार कर लेनेपर क्या होता है ? यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! चेतनका चेतनीय विषयोंकी ओर उन्मुख होना ही चित्त कहलाता है। इस समय जो चर्चा चल रही है। यही इसका विचार है। इससे इसकी वासना शान्त हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चित्तके रहते हुए चेतनका अचेत्य परमात्माकी ओर उन्मुख होना कितनी देरके लिये सम्भव हो सकेगा ? (क्योंकि चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर ही परमात्मामें अटल स्थिति हो पाती है) अतः यह बताइये कि निर्वाण-पद प्रदान करनेवाली जो चित्तकी अचित्तता है, उसका उदय कैसे हो सकता है ? (दूसरे शब्दोंमें चित्तके नाशका ही उपाय बतानेकी कृपा करें।)
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जब चेत्य जगत्की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है, तब चितिशक्ति जीवात्मा कैसे और कहाँसे उसका चिन्तन या अनुभव करेगा ? चेत्यकी सत्ता न होनेसे चित्तकी सत्ता भी चिरकालसे ही नहीं है। फिर किसके नाशका उपाय बताया जाय ?
श्रीरामजीने पूछा—जिस चेत्यका सबको अनुभव होता है, उसका होना कैसे सम्भव नहीं है ? जिसका अनुभव हो रहा है, उसका इस तरह अपलाप, उसकी सत्ताको अस्वीकार कैसे किया जा रहा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अज्ञानीकी दृष्टिमें जो जगत्का स्वरूप है, वह सत्य नहीं है और ज्ञानीकी दृष्टिमें उसका जैसा स्वरूप है, वह अद्वितीय ब्रह्ममय होनेके कारण वाणीका विषय नहीं है। (अतः यहाँ अज्ञानियोंके ही जगत्की सत्ताका निराकरण किया गया है।)
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! अज्ञानियोंका त्रैलोक्य कैसा है और वह सत्य कैसे नहीं है तथा तत्त्वज्ञानियोंका जगत् जैसा है, वह वाणीका विषय कैसे नहीं हो सकता ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अज्ञानियोंका जो जगत् है, वह आदि-अन्तसे युक्त तथा द्वैतरूप है। परंतु तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह नहीं है। उनकी दृष्टिमें जगत्की सत्ता सम्भव ही नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही कभी उसकी उत्पत्ति नहीं हुई।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जो आदिकालसे ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसकी सत्ता कभी सम्भव नहीं है। वह असद्रूप और आभासशून्य है। यदि जगत्का भी यही स्वरूप है तो उसका अनुभव कैसे हो रहा है ?
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६७१
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जाग्रत्-जगत् स्वप्न जगत्के समान असत् होता हुआ ही सत्केतुल्य प्रतीत हो रहा है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई; क्योंकि उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। यह स्वप्नके तुल्य प्रकट होकर अर्थ-क्रियाकारी भी प्रतीत होता है।
श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! स्वप्न आदिमें और संकल्प एवं मनोरथ आदिमें जो दृश्यका अनुभव होता है, वह जाग्रत् व्यवहारके अनुभवसे उत्पन्न जाग्रत्-रूप संस्कारसे होता है। किंतु यह जाग्रत् किससे अनुभवमें आता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! यदि जाग्रतके संस्कारसे ही स्वप्नका भान होता है तो सपनेमें गिरा हुआ अपना घर कैसे प्रातःकाल जागनेपर सुरक्षितरूपसे उपलब्ध होता है।
श्रीरामजी बोले— भगवन् ! जाग्रत्-पदार्थका स्वप्नमें भान नहीं होता; किंतु अन्य पदार्थ ही स्वप्नमें भासित होता है। वह अन्य पदार्थ ब्रह्म ही है, यह बात मेरी समझमें आ गयी। अब इतना ही पूछना शेष है कि वह अन्य पदार्थरूप ब्रह्म अपूर्व जगत्के रूपमें कैसे भासित होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! सब कुछ अपूर्व-सा ही भासित होता हो, ऐसा नियम नहीं है। कोई पदार्थ जिसका पहले अनुभव नहीं हुआ है, चित्तमें अपूर्व प्रतीत होता है और कोई जिसका पहले अनुभव हो चुका है, अपूर्व नहीं प्रतीत होता। वह अनुभव सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें किये हुए अभ्यासके अनुसार ही भासित होता है।
श्रीरामजीने पूछा— ब्रह्मन् ! इस तरह आपके उपदेश-से यह बात तो समझमें आ गयी कि जाग्रत्-जगत् भी स्वप्नके समान ही है। किंतु यह स्वप्न-तुल्य प्रतीत होनेवाला जगद्रूपी यक्ष भी क्रूर ग्रहकी भाँति कष्ट देता है। अतः किस प्रकार इस रोगकी चिकित्सा की जाय?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! यह जो संसार-
रूपी स्वप्न है, इसका क्या कारण हो सकता है? कार्य-से कारण भिन्न नहीं है, यह बात सर्वत्र देखी गयी है। इस प्रकार इस विषयमें विचार करो।
श्रीरामजी बोले— स्वप्नकी उपलब्धिक कारण है चित्त। इसलिये स्वप्न-जगत् चित्तरूप ही है। इसी प्रकार आपके विचारसे यह जाग्रत्-जगत् भी जो आदि-अन्तसे रहित और असार है, चित्तरूप ही है। इस निश्चयसे जगत्-रूपी रोगकी चिकित्सा स्वतः सिद्ध है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— महामते ! मैं कह चुका हूँ कि चेतनका चेत्यकी ओर उन्मुख होना ही चित्त है। इस दृष्टिसे चित्त महान् चैतन्यघन ही है। वही जगत्के आकारमें स्थित है। अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्न, जाग्रत् आदि कुछ भी चिन्मय ब्रह्मसे भिन्न नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। इसलिये यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च अजर-अमर, शान्त, अजन्मा एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है।
श्रीरामचन्द्रजी बोले— भगवन् ! आपके सदुपदेशसे मैं यह मानता हूँ कि जीवात्माको भ्रान्तिके कारण द्रष्टापन और भोक्तापनके साथ सृष्टिके जन्म नाश आदि सारे भ्रम परमपद-स्वरूप परब्रह्ममें प्रतीत हो रहे हैं।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— राघवेन्द्र ! जो रससे भी रस-तत्त्वके ज्ञाता हैं— सारसे भी सार वस्तुको मथकर निकालने और जाननेमें समर्थ हैं, ऐसे विद्वानोंकी विचार-व्यापारसे युक्त जो कोई नवीन दृष्टि है, वह पहली है तथा समस्त विचारों और शास्त्रके श्रवण, मनन, निदिध्यासनके परिपाकसे परिनिष्ठित जो परम तत्त्वरूप अर्थ है, उसका अपरोक्ष अनुभव करानेवाली जो तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्माओंकी दृष्टि है, वह दूसरी है। उन्हीं दो दृष्टियोंका अवलम्बन करके मैंने सम्पूर्ण विश्वके स्वरूपपर तबतकके लिये इस प्रकार विचार किया और विचार करना आवश्यक समझा है, जबतक कि यह बोध न हो जाय
सं० यो० व० उ० २४-