भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 718

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६७१

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जाग्रत्-जगत् स्वप्न जगत्के समान असत् होता हुआ ही सत्केतुल्य प्रतीत हो रहा है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई; क्योंकि उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। यह स्वप्नके तुल्य प्रकट होकर अर्थ-क्रियाकारी भी प्रतीत होता है।

श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! स्वप्न आदिमें और संकल्प एवं मनोरथ आदिमें जो दृश्यका अनुभव होता है, वह जाग्रत् व्यवहारके अनुभवसे उत्पन्न जाग्रत्-रूप संस्कारसे होता है। किंतु यह जाग्रत् किससे अनुभवमें आता है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! यदि जाग्रतके संस्कारसे ही स्वप्नका भान होता है तो सपनेमें गिरा हुआ अपना घर कैसे प्रातःकाल जागनेपर सुरक्षितरूपसे उपलब्ध होता है।

श्रीरामजी बोले— भगवन् ! जाग्रत्-पदार्थका स्वप्नमें भान नहीं होता; किंतु अन्य पदार्थ ही स्वप्नमें भासित होता है। वह अन्य पदार्थ ब्रह्म ही है, यह बात मेरी समझमें आ गयी। अब इतना ही पूछना शेष है कि वह अन्य पदार्थरूप ब्रह्म अपूर्व जगत्‌के रूपमें कैसे भासित होता है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! सब कुछ अपूर्व-सा ही भासित होता हो, ऐसा नियम नहीं है। कोई पदार्थ जिसका पहले अनुभव नहीं हुआ है, चित्तमें अपूर्व प्रतीत होता है और कोई जिसका पहले अनुभव हो चुका है, अपूर्व नहीं प्रतीत होता। वह अनुभव सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें किये हुए अभ्यासके अनुसार ही भासित होता है।

श्रीरामजीने पूछा— ब्रह्मन् ! इस तरह आपके उपदेश-से यह बात तो समझमें आ गयी कि जाग्रत्-जगत् भी स्वप्नके समान ही है। किंतु यह स्वप्न-तुल्य प्रतीत होनेवाला जगद्रूपी यक्ष भी क्रूर ग्रहकी भाँति कष्ट देता है। अतः किस प्रकार इस रोगकी चिकित्सा की जाय?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! यह जो संसार-

रूपी स्वप्न है, इसका क्या कारण हो सकता है? कार्य-से कारण भिन्न नहीं है, यह बात सर्वत्र देखी गयी है। इस प्रकार इस विषयमें विचार करो।

श्रीरामजी बोले— स्वप्नकी उपलब्धिक कारण है चित्त। इसलिये स्वप्न-जगत् चित्तरूप ही है। इसी प्रकार आपके विचारसे यह जाग्रत्-जगत् भी जो आदि-अन्तसे रहित और असार है, चित्तरूप ही है। इस निश्चयसे जगत्-रूपी रोगकी चिकित्सा स्वतः सिद्ध है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा— महामते ! मैं कह चुका हूँ कि चेतनका चेत्यकी ओर उन्मुख होना ही चित्त है। इस दृष्टिसे चित्त महान् चैतन्यघन ही है। वही जगत्‌के आकारमें स्थित है। अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्न, जाग्रत् आदि कुछ भी चिन्मय ब्रह्मसे भिन्न नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। इसलिये यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च अजर-अमर, शान्त, अजन्मा एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है।

श्रीरामचन्द्रजी बोले— भगवन् ! आपके सदुपदेशसे मैं यह मानता हूँ कि जीवात्माको भ्रान्तिके कारण द्रष्टापन और भोक्तापनके साथ सृष्टिके जन्म नाश आदि सारे भ्रम परमपद-स्वरूप परब्रह्ममें प्रतीत हो रहे हैं।

श्रीवसिष्ठजीने कहा— राघवेन्द्र ! जो रससे भी रस-तत्त्वके ज्ञाता हैं— सारसे भी सार वस्तुको मथकर निकालने और जाननेमें समर्थ हैं, ऐसे विद्वानोंकी विचार-व्यापारसे युक्त जो कोई नवीन दृष्टि है, वह पहली है तथा समस्त विचारों और शास्त्रके श्रवण, मनन, निदिध्यासनके परिपाकसे परिनिष्ठित जो परम तत्त्वरूप अर्थ है, उसका अपरोक्ष अनुभव करानेवाली जो तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्माओंकी दृष्टि है, वह दूसरी है। उन्हीं दो दृष्टियोंका अवलम्बन करके मैंने सम्पूर्ण विश्वके स्वरूपपर तबतकके लिये इस प्रकार विचार किया और विचार करना आवश्यक समझा है, जबतक कि यह बोध न हो जाय

सं० यो० व० उ० २४-