भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]

कि जितनी भी दृष्टियाँ और उनके द्रष्टाके द्रष्टापन हैं, वे सब त्रिकालमें भी नहीं हैं। सारा जगत्-असत् है—शून्य है। उसकी प्रतीति भ्रममात्र है। वस्तुतः तो न

कोई शून्यता है और न भ्रम ही है। नित्य-निरन्तर, सर्वत्र एकमात्र अपरोक्ष परमानन्दस्वरूप परब्रह्म ही विराजमान है। (सर्ग १९०)


अज्ञानसे ब्रह्मका ही जगतरूपसे भान होता है। वास्तवमें जगत्‌का अत्यन्ताभाव है और एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है, इस तत्त्वका प्रतिपादन

श्रीरामजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! यदि ऐसी बात है तब तो यह सारा जगत् सदा सर्वपदार्थरूप परमार्थमय ब्रह्म ही है, जो न कभी उत्पन्न होता है और न कभी नष्ट ही होता है। जगत्की प्रतीतिका रूपमें यह भ्रान्ति ही भासित हो रही है। तात्त्विक दृष्टिसे तो वह भ्रान्ति भी नहीं है, केवल परब्रह्मकी ही सत्ता है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! दृश्यकी उत्पत्ति सम्भव न होनेके कारण न द्रष्टा है और न दृश्य ही है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन आदिकी त्रिपुटी कुछ नहीं है। केवल निर्विकार चिदाकाश ही है। जैसे स्वप्न आदिमें एक ही पुरुष द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीरूप होता है, वैसे ही जाग्रत्‌में भी एकमात्र वह जीवात्मा ही स्वयं द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीको धारण करके विराजमान होता है। अतः भासने योग्य पदार्थ, भान तथा भासक स्वयंप्रकाश चेतन ही है, सर्ग आदिमें सृष्टिके तुल्य स्फुरित होता हुआ वह स्वयं ही प्रकाशित होता है। अज्ञानी लोगोंको यह सृष्टि भले ही आश्चर्यके तुल्य प्रतीत

हो। परंतु ज्ञानी महात्माओंकी दृष्टिमें तो यह स्वभावभूत ब्रह्मरूप ही है। सृष्टिके आदिमें जब कि एक विशुद्ध चेतन ही विद्यमान है, तब उसमें संसारकी उत्पत्तिका क्या कारण हो सकता है? दृश्यकी सत्ता किसी तरह भी सम्भव न हो सकनेके कारण केवल ब्रह्म ही जगतरूपसे भासित हो रहा है। इस तरह चिदाकाशस्वरूप परमात्मा ही सृष्टिके आरम्भमें सृष्टिरूपसे स्फुरित होता है। अतः यह जो जगत् है, परमात्मा ही है। शून्यता और आकाशके भेदकी कल्पनाके समान जगत् और ब्रह्मके भेदकी कल्पना भी अज्ञानमात्र ही है। श्रीराम! इस तत्त्वको समझ लेनेपर भी जबतक यह सुन्दर अनुभवसे युक्त एवं दृढ़ न हो जाय, तबतक साधकको पाषाणकी भाँति मौन एवं निर्विकल्प होकर एकमात्र परमात्मामें ही स्थित रहना चाहिये। जिन विषयभोगोंको बार-बार भोगकर परम वैराग्यके कारण त्याग दिया गया है, उन्हें अज्ञानी पुरुषोंके कहनेपर भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। (सर्ग १९१)


श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे ज्ञानी महात्माकी स्थितिका एवं अपने परब्रह्मस्वरूपका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजी बोले—मुने! यहाँ सब कुछ शान्त, आलम्बनरहित, विज्ञानस्वरूप, अनन्त, रागशून्य, कल्पना-रहित एवं विशुद्ध अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही है। उसके अतिरिक्त न यह दृश्य है न द्रष्टा है न सृष्टि है, न जगत् है, और न जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि ही है। यह जो कुछ दीखता है वह सब असत् ही

है। मुने! इस भ्रान्तिकी उत्पत्ति कहाँसे होती है? इस बातका विचार करना भी उचित नहीं है; क्योंकि भ्रान्तिके अभावका अनुभव हो जानेपर भ्रान्ति रहती ही नहीं, तब उसके कारणका विचार करना कहाँतक संगत हो सकता है? निर्विकार एवं ज्ञानस्वरूप परब्रह्ममें भ्रान्ति हो ही नहीं सकती। यह जो भ्रान्तिरूपताका ज्ञान है वह