भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त स्थितिका वर्णन * ६७३


भी ब्रह्मरूप ही है। ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। जैसे मृगतृष्णामें जलका, गन्धर्वनगरका और नेत्रदोषके कारण उत्पन्न दो चन्द्रमाका भ्रम विचारसे उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार अविद्या नामक भ्रमकी भी विचारसे उपलब्धि नहीं होती। मुने ! वह भ्रान्ति कहाँसे आयी और क्यों आयी, यह प्रश्न भी यहाँ शोभा नहीं पाता है; क्योंकि जो वस्तु है, उसीपर विचार करनेसे लाभ होता है। जो है ही नहीं, उसपर विचार करनेसे क्या लाभ होगा ? इसलिये कभी कोई भ्रान्ति सम्भव नहीं है। यह आवरणरहित नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही सब ओर व्याप्त है। आज यहाँ जो कुछ भी जगत् भासित होता है, यह परब्रह्म ही है। निरतिशय आनन्दसे परिपूर्ण परब्रह्ममें यह पूर्ण परब्रह्म ही विराज रहा है। जन्मरहित, अमर, इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेके अयोग्य, श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सेवित, निर्विकार तथा सब ओरसे निर्दोष परमपदरूप परमात्मा ही सब ओर परिपूर्ण हो रहा है। वही 'अहम्' (मै) पदसे कहा गया है। फिर भी वह अहंकारसे सर्वथा रहित है। अनेक रूपसे प्रतीत होनेपर भी वह एक है तथा विशुद्ध एवं सदा प्रकाशमान है।

आदि, मध्य और अन्तसे रहित जिस परमपदको देवता तथा ऋषि भी नहीं जानते हैं, वही यह सर्वत्र प्रकाशित हो रहा है। कहाँ है जगत् और कहाँ उसकी दृश्यता ! द्वैत और अद्वैतकी भावनाको उभारने-वाले जो वाक्य संदेह और भ्रम हैं, उनसे हमारा क्या प्रयोजन है ? वास्तवमें सबका आदि, अनामयस्वरूप एक परम शान्त ब्रह्म ही परिपूर्ण है। अपरिच्छिन्न उदयवाले—सर्वव्यापी इस परब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर अज्ञानीकी दृष्टिमें स्फुरित होनेवाला संसाररूपी पिशाच तत्त्वज्ञकी दृष्टिमें नष्ट हो जाता है। वह जडकी भाँति व्यवहारमें लगा हो तो भी उस ज्ञानीकी पूर्वकी भेदबुद्धि उसी तरह गल जाती है, जैसे जलके भीतर कङ्कर नष्ट हो जाती है। यहाँ वास्तवमें न तो अज्ञान है, न भ्रम है, न दुःख है और न सुखका उदय ही है। विद्या-अविद्या, सुख-दुःख—सब कुछ निर्मल ब्रह्म ही है। जितना और जो भी यहाँ है, वह सब विशुद्ध सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। ब्रह्मन् ! वह ब्रह्म मैं ही हूँ। सदा ही सब कुछ एकमात्र मैं ही हूँ। मेरा कहीं अन्त नहीं है। मैं परम शान्त हूँ, सब कुछ हूँ, अथवा कुछ नहीं हूँ। एकमात्र सत्-स्वरूप ही हूँ अथवा वह भी नहीं हूँ, मैं ही परम आश्चर्यरूप निर्वाण नामक परमशान्ति-स्वरूप हूँ।

(सर्ग १९२-१९३)


श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त एवं संकल्पशून्य स्थितिका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुने ! जिसको बोध प्राप्त हो गया है, वह ध्यानस्थ महात्मा केवल अपने चिल्लक्षभाव-में स्थित रहता है। वह न कुछ ग्रहण करता है और न कुछ त्याग ही करता है। समाधि या ध्यानसे उठनेपर भी वह सदा जैसे-का-तैसा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, जैसे दीपक प्रकाश फैलाता हुआ भी कुछ करता नहीं है, वैसे ही ज्ञानी सब कुछ देखता हुआ भी निष्क्रिय बना रहता है। वह मनके मननसे युक्त होनेपर भी कही आसक्त न होने-के कारण बाह्यरूपमें मन, अभिमान और मननसे रहित ही है। उस योगीको समाधिसे उठनेपर विश्वरूप नामक और समाधिकालमें ब्रह्म नामक चिन्मात्रस्वरूप परमार्थ सत्यका ही सर्वत्र दर्शन होता है। उसे सृष्टि और संहार सब चिन्मात्र ही प्रतीत होते हैं। संसार त्रिविध तापोंसे अत्यन्त संतप्त है और निर्वाण अत्यन्त शीतल है (क्योंकि उसमें समस्त तापोंकी शान्ति हो जाती है)। वास्तवमें अत्यन्त शीतल निर्वाण ही शाश्वत है। यह तप्त संसार तो तीनों कालोंमें है ही नहीं। जैसे स्वप्नमें अपने भाई-बन्धुके मरने या जीनेपर भी स्वप्नसे जागे हुए पुरुषकी उस स्वप्नगत

यो० वा० सं० ८५—