भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ


वृत्तान्तमें सत्यता-बुद्धि नहीं होती (अतएव उसे वहाँकी घटनासे हर्ष और शोक नहीं होते हैं)। वैसे ही तत्त्वज्ञानी पुरुषको दृश्य पदार्थोंमें सत्यता-बुद्धि नहीं होती (इसलिये अनुकूल-प्रतिकूल घटनाओंसे उसे हर्ष-शोकका अनुभव नहीं होता।)। भगवन् ! सम्यक् ज्ञान होनेपर देहसे सम्बन्ध रखनेवाले भोगपदार्थों और उनकी प्राप्तिके उपायोंसे ज्ञानीको उसी तरह सर्वथा विरक्ति रहती है, जैसे स्वप्नसे जगे हुए पुरुषकी स्वप्नगत पदार्थोंमें ममता और आसक्ति नहीं रहती। वैराग्यसे बोधकी और बोधसे वैराग्यकी वृद्धि होती है। वे दीवाल और प्रकाशके समान एक-दूसरेसे अभिव्यक्त होते हैं। अन्धकारमें दीपक जलानेसे दीवाल अभिव्यक्त होती है और दीवालपर पड़नेसे प्रकाशकी विशेष अभिव्यक्ति होती है। जिस बोधसे वैराग्य सम्पन्न होता है, वस्तुतः उसीका नाम बोध है। जिससे धन, स्त्री, पुत्र आदिकी सुख-सुविधा-वृद्धि पहलेसे भी बढ़ जाती हो, वह बोध या बुद्धिमानीके रूपमें जड़ता ही स्थित है। बोधका बोधत्व इतना ही है कि उससे वैराग्यकी वृद्धि हुई अर्थात् वैराग्य होनेसे ही बोध सार्थक समझा जाता है। जिस पुरुषमें वैराग्य नहीं है, उसकी विद्वत्ता भी मूर्खता ही है। बोध और वैराग्यरूपी उत्कृष्ट सम्पत्ति ही मोक्ष कहलाती है। उस मोक्षरूप अनन्त शान्तपदमें स्थित हुए पुरुषको कभी शोक नहीं करना पड़ता। जो सदा अपने आत्मामें ही रम रहा है, शान्त, विरक्त एवं अहंकाररहित हो गया है, उस ज्ञानी पुरुषकी आकाशके समान संकल्प-रहित एवं निर्मल स्थिति हो जाती है। सहस्र-सहस्र प्रयत्न-शील पुरुषोंमेंसे कोई बिरला ही ऐसा बलवान् और उत्साही होता है, जो उठकर वासनाजालको उसी तरह छिन्न-भिन्न कर देता है, जैसे कोई-कोई सिंह पिंजड़ेको तोड़ डालता है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उस पुरुषके भीतर वासनाशून्य भाव प्रकट होनेपर उसे यह सुदृढ़ बोध प्राप्त हो जाता है कि सारा दृश्य ब्रह्म ही है। इससे उसकी बुद्धि एकमात्र निर्वाणरूप परब्रह्ममें ही सुस्थिर हो जाती है। तत्पश्चात् उसमें मोक्ष नामक अनन्त शान्तिका उदय होता है।

(सर्ग १९४)


श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्‌की असत्ता एवं 'सर्वं ब्रह्म' के सिद्धान्तका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानवान् पुरुषकी समाधि-अवस्थामें अथवा व्यवहारकालमें जो शिलाके समान घनीभूत निश्चल स्थिति है, वह निर्मल मुक्ति कहलाती है। राघव ! पाप और दुःखका निवारण करनेवाले उस मोक्षपदमें स्थित होकर हमलोग समाधि और व्यवहारमें भी इसी तरह समभावसे रहते हैं।

श्रीराम बोले—ब्रह्मन् ! जैसे मृगतृष्णामें जल, समुद्र आदिके जलमें तरङ्ग और भँवर, सुवर्णमें कटक-कुण्डल आदि आभूषण तथा स्वप्न और संकल्पमें पर्वत—ये सब बिना हुए ही प्रतीत होते हैं, वैसे ब्रह्ममें यह जगत् कभी उत्पन्न नहीं हुआ, कभी प्रकाशमें नहीं आया। उसका आरम्भ भी नहीं हुआ और उसमें कोई आकार भी नहीं है। इस प्रकार सर्वथा असत् होकर भी वह अज्ञानियोंको भासित होता है। पहले ही यह कुछ भी कभी उत्पन्न नहीं हुआ; क्योंकि इसकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। इसलिये वन्ध्यापुत्रके समान इस जगत्‌की सत्ता केवल काल्पनिक है। कल्पनाके सिवा और किसी रूपमें इसकी सत्ता नहीं है। इस जगत्-भ्रान्तिका कारण ही क्या है, जिससे यह प्रकट होती ? कारणके बिना किसी भी कार्यका होना कहीं भी सम्भव नहीं है। वस्तुतः निर्विकार, अजर, अमर ब्रह्म भी इसका कारण नहीं हो सकता; क्योंकि पूर्वावस्थाका क्षय हुए बिना कोई भी वस्तु यहाँ कहीं भी सविकार नहीं हो सकती। यदि वाणीका अविषय ब्रह्म ही कारणरूपसे विद्यमान है तो कहाँ, किसको और किस प्रकार जगत् शब्दके अर्थकी प्रतीतियाँ होंगी। वास्तवमें यह जगत् आकाशके समान निर्मल, शिलाके समान घनीभूत