संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्की असत्ताका प्रतिपादन * ६७५
और पाषाणके समान मौन, शान्त, अक्षय ब्रह्म ही है। यह परम समस्वरूप, एक, अनादि, अनन्त, शान्त ब्रह्म, महाकाश ही है। इसमें जगत्की बात ही कहाँ है ? जैसे जलमें लहरोंके उठने और शान्त होनेसे जलमें भिन्नता नहीं आती, उसी प्रकार ब्रह्ममें सृष्टि और प्रलयसे भी कोई भिन्नता नहीं आती। सारासार-तत्त्वके ज्ञाता कोई महात्मा पुरुष इस विशुद्ध परमपदमें उसी तरह एकताको प्राप्त हो जाते हैं, जैसे जलकी बूँद जलराशिमें मिलकर एक हो जाती है। परब्रह्म परमात्मामें परब्रह्मस्वरूप ही जो अपर जगत्—भासित होता है, वह विचार करनेसे परब्रह्म ही सिद्ध होता है; क्योंकि निर्मल, शान्त, परब्रह्ममें जगत् और उनके व्यवहारोंका होना सम्भव नहीं है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—रघुनन्दन ! यदि ऐसा मान लें कि यह दृश्य जगत् कारणभूत ब्रह्ममें उसी प्रकार स्थित है, जैसे बीजमें अङ्कुर तो यहाँ सृष्टि आदिकी सत्ता कैसे नहीं सिद्ध हो सकती ?
श्रीरामने कहा—मुने ! बीजमें अङ्कुर यदि अङ्कुररूपसे ही रहता तो उसमें ढूँढ़नेपर मिलता। किन्तु बीजको फोड़कर देखनेपर वह दिखायी नहीं देता है। यदि कहीं बीजके भीतर अवयवोंकी सूक्ष्म सत्ता है तो वह तो बीज ही है, अङ्कुर नहीं है। ब्रह्मके भीतर भी जगत्की सत्ता इसी तरह सिद्ध नहीं होती है। जो जगत्-सत्ता उपलब्ध होती है, वह यदि सूक्ष्मरूपसे ब्रह्ममें हो तो वह तो नित्य ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म अविकारी है। अतः ब्रह्मसे भिन्न जगत्की सत्ता कदापि सिद्ध नहीं होती है। यह जो कोई अनिर्वचनीय जगत् दीखता है, तत्त्वज्ञान हो जानेपर अनुभवमें ही नहीं आता है। अज्ञानावस्थामें भी प्रतीत होनेके कारण सत्, और वस्तुतः असत्तासे परिपुष्ट यह जगत् स्वानुभवैकगम्य होनेसे अनिर्वचनीय ही है। सारा प्रपञ्च परम शान्त, निष्क्रिय, अखण्ड, आभासशून्य, अनादि, अनन्त एवं स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही है। मुझे अपने उस परमात्मस्वरूपका यथार्थ अनुभव है, जो जन्म और मृत्युसे रहित, शान्त, अनादि, अनन्त, महान्, उपाधिशून्य और निराकार है। जो संवित् (चित्तवृत्ति) भीतर स्फुरित होती है, वही वाक्यरूपमें बाहर प्रकट होती है। जैसे जो बीज भूमिमें बोया गया है, वही अङ्कुररूपसे प्रकट होता है। यह जगत् अज्ञानीकी दृष्टिमें सत्य है और ज्ञानवान्की दृष्टिमें मिथ्या। जो इसे ब्रह्म-रूपमें देखता है, उसके लिये ब्रह्म है तथा जो शान्त महात्मा पुरुष हैं, उनके लिये यह शान्त होकर अन्तमें शून्यरूप ही रह जाता है। ब्रह्मन् ! मैं चिदाकाश हूँ। आप चिदाकाश हैं। चित् चिदाकाश है। जगत् चिदाकाश है और चिदाकाश स्वयं चिदाकाश है। आप एकमात्र चिदाकाश-भावको प्राप्त हो एकाकाशरूपतामें ही स्थित हैं। गुरुदेव ! आप मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और ब्रह्माकाशभावमें ही स्थित हैं। मैं अपने आकाशतुल्य विशुद्ध स्वरूपानुभवके द्वारा सर्वात्मक चिदाकाश-सदृश आपको ज्ञेय, पूर्णानन्द ब्रह्मसे अभिन्न जानकर प्रणाम करता हूँ। वास्तवमें चित्-स्वरूप होनेके कारण ही यह जगत् बिना किसी कारणके ही उसमें उत्पन्न और विलीन होता-सा भासित होता है। अतः यह निर्मल परमाकाशरूप ही है। सम्पूर्ण शास्त्रीय युक्तियों तथा समस्त पदोंसे अतीत जो निर्द्वन्द्व ब्रह्मपद है, उसीको पाकर आप ब्रह्माकाशस्वरूप हो गये हैं। समस्त शास्त्रोंके अर्थोंसे परे, चिह्न अथवा आकारसे रहित, नामरूपसे हीन, अनुभव-स्वरूप, शुद्ध, चिन्मय, एक, अजन्मा एवं सबका आदि निर्मल चिदाकाश ही यहाँ विराजमान है। उसमें किसी प्रकारके नामकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। उस ब्रह्ममें मलकी आशङ्का ही व्यर्थ है—वह नित्य निर्मल सच्चिदानन्दघन है।
(सर्ग १९५)