संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामचन्द्रजीके प्रश्नके अनुसार उत्तम बोधकी प्राप्तिमें शास्त्र आदि कैसे कारण बनते हैं, यह बतानेके लिये श्रीवसिष्ठजीका उन्हें कीरकोपाख्यान सुनाना—लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे कीरोंका सुखी होना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—दूसरोंको मान देनेवाले गुरुदेव ! जो यह सत्स्वरूप ब्रह्म केवल अपने अनुभवसे ही जानने योग्य है, बड़े-बड़े महापुरुषोंकी वाणी भी इसका यथार्थ निरूपण नहीं कर सकती। ऐसी अवस्थामें समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित जो परम ज्ञेय ब्रह्म स्वयं प्रकाशरूप है तथा जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंसे अतीत तुरीयरूपसे उपलब्ध होता है, वह अत्यन्त दुर्गम (दुर्बोध) हो गया है (क्योंकि गुरु और शास्त्र आदि जाग्रत् अवस्थाके ही अन्तर्गत हैं। उनसे) उस तुरीय पदका ज्ञान होना कठिन है। विकल्परूपी सारवाले शब्द-अर्थरूप शास्त्रोंसे ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर भ्रान्तिरूप अनर्थपरम्पराकी प्राप्तिके लिये गुरु, शास्त्र आदिकी कल्पना क्यों की गयी है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! गुरु और शास्त्र आदि जिस प्रकार उत्तम बोधके प्रति कारण होते हैं, वह संक्षेपसे बताता हूँ, सुनो—कभीकी बात है, कीरक देशमें कुछ ऐसे लोग थे, जो बहँगी ढोकर जीवन-निर्वाह करते थे। वे चिरकालसे दरिद्रता एवं दुर्भाग्यका सामना करते थे। दुःखसे वे इस तरह सूख गये थे, जैसे ग्रीष्मकी प्रचण्ड धूपसे पुराने पेड़ सूख जाते हैं। वे चिथड़ोंकी गुदड़ी सीकर उसे ओढ़ते थे। दुरन्त दरिद्रताके कारण उनका मुँह उदास और हृदय दुखी रहता था। जैसे तालाबका पानी निकल जानेसे कमल सूखने लगते हैं, उसी तरह वे भी क्षीण हो रहे थे। अपनी दुर्गतिसे संतप्त होकर उन लोगोंने आजीविकाके लिये विचार किया कि हम लोग किस युक्तिसे अपना पेट भर सकते हैं। इस विषयपर विधिपूर्वक सोच-विचारकर वे इस निश्चयपर पहुँचे कि हमलोग दिनभर सुबहसे शामतक लकड़ीका बोझ ढोयेंगे और उसीको बेचकर जीविका चलायेंगे। ऐसा निश्चय करके वे लकड़ी लानेके लिये वनके भीतर गये। वे जिस किसी युक्तिसे जीविका चलाते थे, वही आपत्तिमें पड़ जाती थी। वे जिस दिन जो कमाते, उसी दिन वह खा जाते थे। इस तरह प्रतिदिन जंगलमें जाकर वहाँसे लकड़ी लाने और उसे बेचकर किसी तरह जीवन-निर्वाह करने लगे। जिस वनके भीतर वे जाते थे, उसमें गुप्त और प्रकटरूपसे सब प्रकारके रत्न, उत्तमोत्तम काष्ठ और सुवर्ण भी थे। उन बोझ ढोनेवाले लकड़हारोंमेंसे कुछ लोग कुछ ही दिनोंमें उन सुवर्णों और रत्नोंको भी पा गये। मानद ! कुछ कीरकनिवासी चन्दनकी लकड़ियाँ, कुछ अच्छे-अच्छे फूल और फल ला-लाकर बेचते और चिरकालतक उनसे जीविका चलाते रहे। कुछ खोटी बुद्धिवाले भाग्यहीन लोग, जो वनकी गलियोंमें घूम-घूमकर जीविका चलानेवाले थे, कभी अच्छी चीजोंको न पाकर खराब लकड़ियाँ ही लाते और उन्हें बेचकर जीवन-निर्वाह करते थे। लकड़ी लानेके लिये उद्यत रहनेवाले वे सब लोग एक बार एक महान् जंगलमें पहुँच गये। वहाँ कुछ लोग उत्तमोत्तम रत्न आदि पाकर दरिद्रतारूपी ज्वरसे शीघ्र ही मुक्त हो गये। एक दिन उस वनके एक प्रदेशसे एक लकड़हारेको चिन्तामणि नामक मणि प्राप्त हो गयी। उस चिन्तामणिसे उन्हें सारे धन-वैभव मिल गये। और वे सभी वहाँ परम सुखी हो बड़े आनन्दसे रहने लगे। लकड़ी लानेके लिये उद्यत होकर वे वनमें जाते थे किन्तु सौभाग्यवश उन्हें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंको देनेवाली मणि मिल गयी और वे स्वर्गके देवताओंकी भाँति निर्द्वन्द्व हो सुखसे रहने लगे। लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे ही बहुमूल्य चिन्तामणि पाकर वे उसके द्वारा समस्त धन-वैभवके सार-सर्वस्वसे सम्पन्न हो महान्