संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण प्रकरण उ०] * कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र-गुरुको कारण बताना * ६७७
बन गये। उनके दरिद्रताजनित भय, मोह, विषाद और दुःख सदाके लिये मिट गये और वे मन-ही-मन आनन्दमें मग्न रहकर दूसरी लाभ-हानिके विषयमें समताको प्राप्त हो गये। (सर्ग १९६)
कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना
श्रीरामचन्द्रजी बोले—दूसरोंको मान देनेवाले मुनिश्रेष्ठ ! ऐसी कृपा कीजिये जिससे बहँगी ढोनेवाले उन कीरकोंके इस प्रसंगका तात्पर्य भलीभाँति समझमें आ जाय और कोई संदेह न रह जाये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महातपस्वी श्रीराम ! ये जो भूमण्डलके मनुष्य हैं, ये ही वे बहँगी ढोनेवाले कीरक हैं और उनका जो दारिद्र्यजनित दुःख था, वह इन मनुष्योंका महान् अज्ञान है। जो महान् वन बताया गया है, वह सद्गुरु, सत्-शास्त्र आदिका क्रम है। वे जो आहार जुटानेके लिये उद्योगशील थे, उसके द्वारा इन भोगार्थी मनुष्योंकी ओर संकेत किया गया है। अत्यन्त कृपण मनुष्य अन्य सब कार्योंकी उपेक्षा करके मुझे भोगराशियाँ प्राप्त हों, इस उद्देश्यसे शास्त्र आदिमें—उनके बताये हुए उपायोंमें प्रवृत्त होता है। भोगपरवश होकर भोग-सामग्रीके लिये ही शास्त्रोंमें प्रवृत्त होनेपर भी जीव क्रमशः अभ्यास करके अपने लिये परम अभीष्ट आदिपद (परब्रह्म परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है। जैसे लकड़ीके लिये उद्यत हुए भारवाहकको मणि प्राप्त हो गय, वैसे ही भोग-संग्रहके लिये शास्त्रमें प्रवृत्त हुए मनुष्य भी निष्काम भावसे शास्त्रोक्त साधनोंका अनुष्ठान करके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई यह सोचकर कि 'देखूँ तो शास्त्र और विवेक-विचारसे क्या लाभ होता है' यों सन्देहयुक्त कौतूहलवश शास्त्रोंमें प्रवृत्त होता है। फिर तदनुकूल साधन करके उत्तम पदको प्राप्त कर लेता है। जिसे परब्रह्मरूप उत्तम तत्त्वका साक्षात्कार नहीं हुआ, वह पुरुष धन और भोगके लिये सन्देहपूर्वक शास्त्र आदिमें प्रवृत्त होता है (जब उसे अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे शास्त्र आदिपर पूरा विश्वास हो जाता है, तब तदनुकूल पारमार्थिक साधनोंका आश्रय लेकर) वह उस परमपदको प्राप्त कर लेता है। लोग अपनी वासनाके अनुसार किसी और ही प्रकारके फलकी आशासे शास्त्रोक्त साधनोंमें प्रवृत्त होते हैं, परन्तु बहँगी ढोनेवाले कीरकोंको जैसे मणि मिल गयी, वैसे ही उन्हें भी और ही उत्कृष्ट-फल (मोक्ष) की प्राप्ति हो जाती है।
जो स्वभावसे ही निरन्तर परोपकारमें लगा होता है, वह साधु कहा गया है। उसकी चेष्टा, उसका आचार-व्यवहार सबके लिये प्रमाण होता है। साधु पुरुषोंके सदाचारसे प्रेरित होकर ही अज्ञानी लोग शास्त्रोक्त फलमें संदेह रहते हुए भी भोगप्राप्तिकी आशासे शास्त्र आदिमें प्रवृत्त होते हैं। भोगके लिये शास्त्रोक्त कर्ममें प्रवृत्त हुआ पुरुष उससे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है, जैसे लकड़ीकी इच्छा रखनेवाले कीरकको वनसे चिन्तामणि प्राप्त हो गयी थी। जिस प्रकार वनसे किसीको चन्दन काष्ठ, किसीको साधारण रत्न और किसीको चिन्तामणि मिल जाती है, उसी प्रकार शास्त्रसे कोई काम, कोई अर्थ, कोई धर्म, कोई धर्म-अर्थ-काम तीनों और कोई सम्पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। रघुनन्दन ! शास्त्र आदिमें त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का ही मुख्यरूपसे उपदेश है। ब्रह्मकी प्राप्ति तो वाणीका विषय ही नहीं है। इसलिये ब्रह्मका प्रतिपादन करने-वाले शास्त्रोंमें भी पद और वाक्योंकी मुख्य वृत्तिसे उसका निरूपण सम्भव नहीं हो सका है। जैसे वसन्त आदि ऋतुओंकी शोभा उनके लाये हुए फूल, फल और पल्लव आदिकी उत्पत्तिसे सूचित होती हुई स्वयं अपने अनुभवसे ही प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्मकी प्राप्ति