संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शास्त्रके सम्पूर्ण वाक्यार्थोंसे व्यञ्जनावृत्तिद्वारा ध्वनित होती हुई केवल अपने अनुभवसे ही जानी जाती है। जैसे सुन्दरी युवतीमें मणि, दर्पण और चन्द्रमा आदि सबसे बढ़कर लब्ध लावण्य उपलब्ध होता है, वैसे ही यद्यपि शास्त्रमें धर्म आदि तीनों वर्गोंसे उत्कृष्ट ब्रह्मज्ञान विद्यमान है, तथापि समस्त पदोंसे परे जो परम बोध है, यह अश्रद्धालु मनुष्यको न तो शास्त्रसे, न गुरुके उपदेश-वाक्यसे, न दानसे और न ईश्वरके पूजनसे ही प्राप्त होता है। रघुनन्दन ! ये शास्त्र आदि यद्यपि अश्रद्धालुको ब्रह्म-प्राप्ति करानेमें कारण नहीं हैं, तथापि श्रद्धालुको एकमात्र परमात्मामें विश्राम प्राप्त करानेके पूर्णतः कारण बन जाते हैं; कैसे ? सो बताया जाता है, सुनो। शास्त्रका बारंबार अभ्यास करनेसे श्रद्धालुका चित्त विशुद्ध हो जाता है, तब वह अनायास शीघ्र ही उस पावन परमपदका साक्षात्कार कर लेता है। सत्-शास्त्रसे अविद्याका सात्त्विक भाग उन्नत बनाया जाता है और उस सात्त्विक भागसे इसका तामसिक भाग क्षीण हो जाता है। सत्-शास्त्ररूपी उत्कृष्ट जलसे अविद्याजनित मलको धोनेवाला पुरुष अचिन्त्य वस्तु-शक्तिके प्रभावसे परम शुद्धिको प्राप्त कर लेता है। जैसे ईखके रससे अपने ही अनुभवसे स्वादिष्ट माधुर्यकी उपलब्धि होती है, उसी प्रकार सत्-शास्त्र और सद्गुरुके उपदेशरूप उपायसे 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यार्थका साररूप आत्मज्ञान प्राप्त होता है। जैसे आकाशमें आलोकके सब ओर फैले रहनेपर भी प्रभा और दीवालके संगसे ही वह सुस्पष्टरूपसे अनुभवमें आता है, उसी प्रकार महावाक्यके श्रवण और उसके अधिकारी पुरुषके योगसे ही आत्मज्ञानका अपरोक्ष अनुभव होता है। वही शास्त्रश्रवण सफल है, जिससे ज्ञान प्राप्त होता है, वही ज्ञान सफल है, जिससे समता प्राप्त होती है और वही समता सफल है, जिसके जाग्रत् होनेपर जाग्रत्में भी सुषुप्तिकी भाँति परमात्माके स्वरूपमें निर्विकल्प स्थिति हो जाती है। इस प्रकार यह सब कुछ सत्-शास्त्र एवं सद्गुरुके उपदेश आदिसे प्राप्त हो जाता है। इसलिये पूरा प्रयत्न करके सत्-शास्त्र आदिका अभ्यास करना चाहिये। श्रीराम ! शास्त्रोंके अर्थका विचार करनेसे, गुरुजनोंके उपदेश-वाक्यसे, सत्संगसे, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-शरण—इन नियमोंके पालनसे और मन एवं इन्द्रियोंको वशमें करनेसे वह सम्पूर्ण विश्वपदसे अतीत, सर्वेश्वर, सबका आदि, अनादि एवं सच्चिदानन्दमय परमपद प्राप्त होता है।*
(सर्ग १९७)
श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलतिलक राम ! बोधकी दृढ़ताके लिये मैं पुनः कुछ बातें बता रहा हूँ, सुनो। जो बात बार-बार कही जाती है, वह अज्ञानीके हृदयमें निश्चय ही बैठ जाती है। रघुनन्दन ! पहले मैंने स्थिति-प्रकरणका वर्णन किया था, जिससे यह बात भलीभाँति समझमें आ जाती है कि इस प्रकार उत्पन्न हुआ जगत् केवल भ्रममात्र है। तत्पश्चात् उपशमकी युक्तियोंद्वारा यह बात बतायी गयी थी कि इस जगत्में उत्पन्न हुए प्रत्येक पुरुषको उत्कृष्ट उपशमके गुणसे गौरवशाली होना चाहिये। उपशम प्रकरणमें कहे गये उपशमके क्रमिक साधनोंद्वारा मनुष्यका अत्यन्त उपशान्त होकर यहाँ संतापरहित हो जाना चाहिये। जिसने प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर लिया है, उस तत्त्वज्ञानी-को सांसारिक व्यवहारोंमें कैसे रहना चाहिये, यह थोड़ी-सी बात मेरे मुँहसे तुम्हें और सुननी है। जगत्में जन्म पाकर
* शास्त्रार्थभावनवशेन गिरा गुरूणां सत्सङ्गमेन नियमेन शमेन राम ।
तद्व्याप्यते सकलविश्वपदादतीतं सर्वेश्वरं परममाद्यमनादिधर्म ॥
(नि० उ० १९७। ३४)