भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा * ६७९


मनुष्यको बाल्यावस्थामें ही जगत्‌की इस वास्तविक स्थिति- का ज्ञान प्राप्त करके यहाँ चिन्तारहित होकर रहना चाहिये। निष्पाप श्रीराम ! जो सबके साथ सौहार्द ( मैत्री ) को जन्म देनेवाली है और सबको आश्वासन प्रदान करती है, उस समताका पूर्णरूपसे आश्रय लेकर संसारमें विचरण करना चाहिये। समतारूपिणी सुन्दर लताका फल परम पवित्र होता है, जो सम्पूर्ण साधन-सम्पत्तियोंसे युक्त होनेके कारण सुन्दर तथा समग्र सौभाग्यकी वृद्धि करने- वाला है। रघुनन्दन ! जिनकी समग्र चेष्टाएँ समताके कारण सुन्दर होती हैं तथा जो न्यायसे प्राप्त वर्णाश्रम व्यवहारमें लगे रहते हैं, उन महापुरुषोंकी सेवामें यह सारी सांसारिक विभूति सेविकाकी भाँति उपस्थित हो जाती है। समतासे जो सारभूत अक्षय सुख प्राप्त होता है, वह न तो राज्यसे मिल सकता है और न प्रेयसी जनोंके समागमसे ही सुलभ हो सकता है। राघवेन्द्र ! तुम समताको सम्पूर्ण द्वन्द्वोंकी शान्तिकी चरम सीमा, रोषावेश तथा संशयरूपी रोगका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण दुःखरूपी आतप ( धूप ) के तापसे बचानेके लिये मेघ समझो। जो समतारूपी अमृतसे ओतप्रोत है, उसके लिये सारे शत्रु मित्र बन जाते हैं। वह यथार्थदर्शी होता है ऐसा मनुष्य तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। प्रबुद्ध हुए अपने चित्तरूपी चन्द्रमाके सारभूत अमृतसे भी बढ़े-चढ़े साम्यका अनुभव करते हुए ही जनक आदि समस्त तत्त्वज्ञ जीवन निर्वाह करते हैं। समताका अभ्यास करनेवाले जीवका क्रोध, लोभ आदि अपना दोष भी शान्ति एवं उदारताके रूपमें परिणत होकर गुण बन जाता है, दुःख भी नित्य- सुख हो जाता है और मृत्यु जीवन बन जाती है।

समतारूपी सौन्दर्यसे सुन्दर लगनेवाले महात्मा- पुरुषको योगशास्त्रवर्णित सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्माके प्रति क्रमसे मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षारूपिणी महिलाएँ सदा गले लगाती हैं। उसके प्रति वे आसक्त-सी रहती हैं। समतासे युक्त पुरुष सदा अभ्युदयशील होता है। समतायुक्त पुरुषके चित्तमें कभी चिन्ताका उदय नहीं होता तथा इस जगत्में ऐसी कोई सम्पत्तियाँ नहीं हैं, जो समतासम्पन्न पुरुषको प्राप्त न हुई हों। जो अपने और पराये सभीके कार्योंमें समभाव रखने- वाला है, साधुस्वभाव (अपराधियोंको भी क्षमा करनेवाला) है, जिसका सबके प्रति उत्तम व्यवहार है तथा जो चिन्तामणिके समान उदार है, ऐसे पुरुषको मनुष्य और देवता सभी चाहते हैं। श्रीराम ! जो सदाचारसम्पन्न और सबका हित करनेवाला है, अत्यन्त प्रसन्न रहता है तथा जिसका चित्त सबके प्रति समान है, ऐसे मनुष्यको न तो आग जलाती है और न जल ही डुबाता या गलाता है। जो पुरुष आनन्द और उद्वेगसे रहित होकर जो कार्य जैसे होना चाहिये, उसे उसी तरह करता है तथा सबको समान दृष्टिसे देखता है, उसकी तुलना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? सदाचारसम्पन्न और सबका हित करनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषपर मित्र, बन्धु, शत्रु, राजा, व्यवहारपरायण मनुष्य तथा बड़े-बड़े बुद्धिमान् लोग भी विश्वास करते हैं। तत्त्वज्ञानसम्पन्न समदर्शी पुरुष अपने न्यायप्राप्त स्वाभाविक कर्मकी परम्पराओंमें लगे हुए न तो अनिष्टकी प्राप्तिसे भागते हैं और न इष्टकी प्राप्तिसे सन्तुष्ट होते हैं। समतासे प्रसन्नचित्तवाले महात्मा पुरुष समस्त देवताओं- द्वारा पूजे जाते हैं। समदर्शी पुरुष जो कुछ करता है, जो भोजन करता है, न्यायप्राप्त होनेसे जिसपर आक्रमण करता है और अनुचित जानकर जिसकी निन्दा करता है, उसके उन सब कार्योंकी सारी जनता सदा प्रशंसा करती है। समदर्शी पुरुषद्वारा किया गया कार्य शुभ दिखायी दे या अशुभ, देरसे पूरा हुआ हो या आज ही तत्काल हो गया हो, उसे सब लोग उत्तम मानकर उसका अभिनन्दन करते हैं।

लगातार बड़े भयानक सुख-दुःख उपस्थित होनेपर भी समदर्शी पुरुष उनसे थोड़ा-सा भी उद्विग्न नहीं होते हैं। राजा शिबिने अपनी इस समदर्शिताके ही कारण शरणमें