भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


आये हुए कबूतरकी रक्षाके लिये प्रसन्नचित्तसे अपना शरीर काटकर निकाला हुआ मांस दे दिया था। प्रिय रघुनन्दन ! समतायुक्त हृदयवाले एक भूपाल (शिखिध्वज) प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा भार्याको अपने सामने ही परपुरुषके द्वारा आक्रान्त हुई देख क्षुब्ध नहीं हुए थे। त्रिगर्त देशके राजाने सैकड़ों मनोरथोंसे प्राप्त हुए इकलौते पुत्रको, जो दावमें हारा गया था, अपनी समबुद्धिके ही कारण बिना किसी घबराहटके राक्षसके हाथमें सौंप दिया। राजाओंमें श्रेष्ठ भूपाल जनक उत्सवके लिये सजायी गयी अपनी मिथिलानगरीमें आग लग जानेपर समभावसे ही उसे देखते रहे (उनके मनमें विषाद नहीं हुआ)। समदर्शी शाल्वराजाने न्यायतः बेचे गये अपने ही मस्तकको कमलदलकी भाँति तत्काल काट डाला था। सौवीरनरेशने कुन्दपुष्पोंकी राशिके समान कान्तिमान् तथा श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीको, जो उन्होंने इन्द्रसे जीता था, यज्ञमें ऋत्विजोंके कहनेसे सूखे तिनकेकी भाँति त्याग दिया—इन्द्रको वापस लौटा दिया। ऐसा उन्होंने अपनी समतायुक्त बुद्धिसे ही प्रेरित होकर किया था। समबुद्धिसे ही अपनी जीविकाके लिये काम-धंधा करनेवाले कुण्डप नामक एक चाण्डालने एक गौको मजदूरीमें लेनेकी शर्त ठहराकर एक ब्राह्मणकी पाँच गौओंको, जो कीचड़में फँस गयी थीं, निकाला और मजदूरीमें मिली हुई उस एक गायको पुष्करतीर्थमें उसी ब्राह्मणके हाथोंमें दान कर दिया था। इससे तत्काल आये हुए विमानपर चढ़कर वह देवलोकको चला गया। समताका भरपूर अभ्यास करनेवाले कदम्बवनवासी एक राक्षसने समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली अपनी राक्षसी वृत्तिका त्याग कर दिया। बालचन्द्रमाके समान सुन्दर जडभरतने अपनी समबुद्धिताके कारण ही भिक्षामें मिले हुए आगके अङ्गारोंको गुड़के लड्डुकी भाँति खा लिया था। ऋषि-मुनि और सिद्ध, जो देवताओंद्वारा सम्मानित हुए हैं, वे व्रत एवं तपस्याकी समृद्धिका संचय करते समय समदर्शिताके ही कारण उद्विग्न नहीं हुए थे। रन्तिदेव आदि राजा तथा धर्मव्याध आदि दूसरे साधारण मनुष्य भी समदर्शिताका दृढ़ अभ्यास करनेसे महापुरुषोंके भी पूजनीय हो गये थे। इहलोक और परलोकमें सुखकी सिद्धिके लिये और मोक्षरूप पुरुषार्थमें प्रवृत्तिके लिये भी उत्तम बुद्धिवाले पुरुष सदा समदर्शितासे ही व्यवहार करते हैं। किसीको भी किसी तरहकी पीड़ा न देता हुआ पुरुष न मरणकी इच्छा करे न जीवनकी। न्यायसे जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसका समतापूर्वक आचरण करता हुआ विचरे। जो समतावश गुण और दोषोंको एक-सा जानता है, जिसकी दृष्टिमें सुख-दुःख और छोटे-बड़े समान हैं, जो मान और अपमानको एक-सा समझता है और प्राप्त व्यवहारोंका भी सुचारुरूपसे सम्पादन करके पवित्र हो गया है। समतासे सुशोभित होनेवाला वह पुरुष सर्वत्र निर्द्वन्द्वभावसे विचरण करता है। (सर्ग १९८)


कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए भी जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्वभावतः सत्कर्मोंमें ही प्रवृत्तिका प्रतिपादन

श्रीरामने पूछा—मुने ! जीवन्मुक्त पुरुष सदा एकमात्र ज्ञानमें ही स्थित रहते और आत्मामें ही रमते हैं। ऐसी दशामें वे कर्मोंका परित्याग क्यों नहीं कर देते हैं? क्योंकि उन्हें कर्मसे कोई प्रयोजन नहीं है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी हेय दृष्टि और उपादेय दृष्टि अर्थात् अमुक कर्म त्याज्य है और अमुक ग्राह्य है—ये दोनों दृष्टियाँ क्षीण हो गयी हैं, उसे कर्मका त्याग करनेसे क्या प्रयोजन है? अथवा कर्मका आश्रय लेनेकी भी क्या आवश्यकता है? ज्ञानीके लिये इस जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो उद्वेगकारक होनेके कारण त्याज्य हो अथवा ऐसा कर्म भी नहीं है, जो तत्त्वज्ञानके लिये अवश्य करने योग्य होनेसे उपादेय हो। तत्त्वज्ञ