संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ०] * कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए जीवन्मुक्तकी सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति * ६८१
पुरुषको न तो कर्मोंके त्यागसे कोई प्रयोजन है और न कर्मों-का आश्रय लेनेसे । इसलिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जो कर्म जैसे होता आ रहा है, उसे वह उसी प्रकार करता रहता है । श्रीराम ! जबतक आयु है, तबतक यह शरीर निश्चितरूपसे चेष्टा करता रहता है, अतः वह शान्तभावसे यथाप्राप्त चेष्टा करे । उसका त्याग करनेकी क्या आवश्यकता है ? श्रीराम ! सदा निर्विकार रहनेवाली समतायुक्त निर्मल बुद्धिसे जो कर्म जैसे किया जाता है, वह सदा निर्दोष ही होता है ।
इस भूतलपर कितने ही गृहस्थ जीवन्मुक्त हैं, जो असङ्ग बुद्धिसे यथाप्राप्त वर्णाश्रम-धर्मका अनुसरण करते हैं । उनके सिवा दूसरे राजा जनक-जैसे तत्त्वज्ञ राजर्षि तथा अन्य वीतराग पुरुष भी हैं, जो अनासक्तचित्त एवं चिन्तारहित होकर तुम्हारे सदृश राज्य करते हैं। कुछ लोग वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त वेदोक्त व्यवहारका अनुसरण करते हुए सदा अग्निहोत्रमें लगे रहते हैं और पञ्च-महायज्ञों-से अवशिष्ट अमृतमय अन्नका भोजन करते हैं । चारों वर्णोंमेंसे कुछ लोग सदा ध्यान और देव-पूजन आदि स्वकर्मका अनुष्ठान करते हुए नाना प्रकारकी चेष्टाओं एवं प्रयत्नोंमें लगे रहते हैं । कुछ महान् आशयवाले महापुरुष अपने अन्तःकरणमें सम्पूर्ण फलोंकी आसक्तियोंका त्यागकर सब प्रकारके नित्य-नैमित्तिक कर्म करते हुए तत्त्वज्ञानी होकर भी अज्ञानीकी भाँति स्थित रहते हैं । कुछ लोग उन सूनी वनस्थलियोँमें ध्यान लगाते हैं, जहाँ सपनेमें भी मनुष्योंके दर्शन नहीं होते और भोले-भाले मृगछौने भरे रहते हैं । कुछ लोग उन पुण्यतीर्थों, आश्रमों या देवालयोंमें रहते हैं, जो पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, जहाँ सदा पुण्यात्मा पुरुष निवास करते हैं तथा जहाँका सदाचार मन और इन्द्रियोंके निग्रहसे सुशोभित होता है । कुछ समता-पूर्ण हृदयवाले पुरुष राग-द्वेषका परित्याग करनेके लिये शत्रु-मित्रोंसे भरे हुए अपने देशको छोड़कर अन्य देशमें चले जाते और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगते हैं ।
कितने ही विद्वान् संसार-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये एक वनसे दूसरे वनमें, एक गाँवसे दूसरे गाँवमें, एक स्थानसे दूसरे स्थानमें तथा एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर घूमते फिरते हैं । महापुरी वाराणसीमें, परम पावन तीर्थराज प्रयागमें, श्रीपर्वतपर, सिद्धपुरमें, बदरिकाश्रममें, परम-पुण्यमय शालग्राम तीर्थमें, कल्पोपग्रामकी गुफामें, पुण्यमयी मथुरापुरीमें, कालञ्जर पर्वतपर, महेन्द्र वनकी झाड़ियोंमें, गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दर्दर पर्वतकी चोटियोंपर, सह्य गिरिके भूभागोंमें, विन्ध्यगिरिके कछारोंमें, मलय पर्वतके मध्यभागमें, कैलासके वनसमूहोंमें तथा ऋक्षवान् पर्वतकी गुफाओंमें —इन सबमें, अन्य पर्वतोंपर एवं अन्यान्य वनों और आश्रमोंमें अनेक बहुदर्शी तपस्वी रहते हैं । इनमेंसे कुछ लोगोंने विधिपूर्वक संन्यास लेकर अपने पूर्व-आश्रमके कर्मोंका त्याग कर दिया है । कोई क्रमशः ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंमें स्थित हैं । किन्हींकी बुद्धि तत्त्व-ज्ञानसे प्रबुद्ध है और कितने ही नित्य उन्मत्तों-सी चेष्टा करते हैं । कोई स्वदेशसे दूर चले गये हैं । कितने ही अपना घर-द्वार छोड़ चुके हैं । कुछ लोग एक ही स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं और कुछ लोग रमते राम होकर भ्रमण करते है । महामते ! आकाश और पातालमें निवास करनेवाले इन देवता, दैत्य आदि महापुरुषोंमेंसे किन्हींकी बुद्धि प्रबुद्ध होती है, वे लोक-रहस्यके ज्ञाता, सम्यग् ज्ञानसे निर्मल तथा निर्गुण-सगुण तत्त्वका साक्षात्कार किये होते हैं । कुछ लोगोंकी बुद्धि सर्वथा प्रबुद्ध नहीं होती है, इसलिये उनका चित्त संशयके झूलेमें झूलता रहता है । वे पापाचारसे निवृत्त होकर सत्पुरुषोंका अनुसरण करते हैं । कुछ लोगोंकी बुद्धि आधी प्रबुद्ध होती है, वे ज्ञानके अभिमानमें आकर शास्त्रोक्त कर्म और आचारको त्याग देते हैं और लोक-परलोक दोनोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं ।
श्रीराम ! इस प्रकार इस जनसमुदायमें जन्म-मरणरूप संसारसे छुटकारा पानेकी इच्छावाले बहुत-से लोग नाना