भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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६८२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्रकारसे व्यवहार करते हुए स्थित हैं। उनकी दृष्टियों बहुविध प्रारब्ध-भोगके अनुकूल होती हैं । संसार-सागरसे पार होनेमें न तो वनवास कारण है, न अपने देशमें ही रहना कारण है और न कष्टसाध्य तपस्या ही कारण है। कर्मका परित्याग करना अथवा कर्मोंका आश्रय लेना भी संसारकी निवृत्तिमें कारण नहीं है। सत्कर्मोंके आचरणोंसे जो ख्याति- लाभ और ऐश्वर्य आदि विचित्र फलसमूह प्राप्त होते हैं, वे भी संसार-बन्धनसे छुटकारा दिलानेमें कारण नहीं हैं। संसार-सागरसे उद्धार पानेके लिये तो एकमात्र अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थिति ही कारण है । जिसका मन कहीं भी आसक्त नहीं है, वह भवसागरसे पार हो जाता है । जिसका मन आसक्तिसे रहित है, वह मुनि नित्य शुभ कर्मोंका अनुष्ठान और अशुभ कर्मोंका त्याग करता हुआ फिर संसार-बन्धनमें नहीं आता । जिसकी बुद्धि खोटी—विषयोंमें आसक्त है, जिसने अपने मनको विषयोंमें खुला छोड़ रखा है, वह शठ संसार-समुद्रमें डूबता ही है। जिसकी बुद्धिने विषयोंमें रसानुभव किया है, उसकी वह बुद्धि दुःखपर दुःख देनेवाली है। शहदके घड़ेमे घुसी हुई मक्खीकी तरह उसे न तो वहाँसे हटाया जा सकता है और न मारा ही जा सकता है । काकतालीय संयोगसे कदाचित् मोक्षकी सिद्धिके लिये अपने चित्तकी स्वयं ही परमात्मसाक्षात्कारकी ओर प्रवृत्ति हो जाती है । परमात्माका साक्षात्कार होनेपर तत्त्वकी उपलब्धि करके निर्मलताको प्राप्त हुआ चित्त निर्द्वन्द्व, अनासक्त एवं निर्विकार ब्रह्म ही हो जाता है ।

महात्मन् ! रघुनन्दन ! तुम स्वभावसे ही परमार्थ- स्वरूप और राग आदि दोषसे रहित हो । तुम्हारी बुद्धि सम है। तुम्हारा स्वरूपानुभव नित्य उदित है । तुम महात्मा हो । अतः शोक और शङ्कासे रहित एकाकी रहो । जन्म और मरणसे मुक्त जो पावन परमपद है, वह तुम्हीं हो । विशुद्ध चिन्मय ब्रह्मरूप जगत्में प्रकृति, मल, विकार, उपाधि, उपाधिका बोध आदि कहीं किञ्चिन्मात्र भी नहीं हैं । सुस्पष्टरूपसे नित्य चैतन्यनाम ब्रह्म ही विराज रहा है । 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ' ऐसा समझकर निःशङ्कभावसे एकाकी रहो ।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब मुनीश्वर वसिष्ठजी ऐसा उपदेश दे चुके, तब उस सभाके सभी सदस्य समस्त एषणाओंसे रहित और ध्यानमें एकाग्र हो अपनी निर्मल बुद्धिके द्वारा ब्रह्मपदको प्राप्त हो गये । साथ ही वे मुनि भी मौन हो ब्रह्मानन्दके सहज अपरोक्ष अनुभूतिमें प्रवृत्त हो गये । ठीक उसी तरह, जैसे कमलोंकी राशिमें गुनगुनाता हुआ भ्रमर चुप होकर मकरन्दका पान करने लगा हो । (सर्ग १९९)


सिद्धों और सभासदोंद्वारा श्रीवसिष्ठजीको साधुवाद, देव-दुन्दुभियोंका नाद, दिव्य पुष्पोंकी वर्षा, गुरुपूजनमहोत्सव, श्रीदशरथजी और श्रीरामजीके द्वारा गुरुदेवका सत्कार, सभ्यों और सिद्धोंद्वारा पुनः श्रीवसिष्ठजीकी स्तुति

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! निर्वाणसम्बन्धी वाक्यसंदर्भ ( उपदेश ) की समाप्ति होनेपर मुनीश्वर वसिष्ठजीने जब क्रमशः प्राप्त हुए अन्तिम वाक्यका विराम कर दिया, जब समस्त सभासद् तथा आकाशचारी देवना भी मुनिके वचनोंके श्रवणसे शान्त एवं विशुद्ध मनोवृत्तिसे युक्त होकर निर्विकल्प समाधिके समान ब्रह्मैकरसताको प्राप्त हो गये तथा जब शास्त्रज्ञानसे सुशोभित होनेवाले उन सब लोगोंका अन्तरात्मा सत्त्वकी पराकाष्ठाको पहुँचकर परम पावन हो गया, तब गगनगुफामें वास करनेवाले सिद्धोंके मुखसे शीघ्र ही ऐसा साधुवाद निकला, जो आकाशमें गूँज उठा । इसी तरह सभामें बैठे हुए भावितात्मा मुनि विश्वामित्र आदिके द्वारा