संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य-प्रकरण ] * अहंकार और चित्तके दोष * ३९
संसाररूपी अँधेरी रातमें जीवोंके मनको मोहित करनेवाली विशाल माया बिछी हुई है। अहंकार शान्तिरूपी चन्द्रमाको निगलनेके लिये राहुका मुख है, पुण्यरूपी कमलोंका विनाश करनेके लिये हिमरूप वज्र है। और सब भूतोंमें समदर्शितारूपी मेघका विध्वंस करनेके लिये शरद् ऋतु है। ऐसे अहंकारका मैं त्याग करता हूँ*। न मैं अमुक नामवाला हूँ, न विषयोंमें मेरी रुचि है और न मन ही मेरा है। मैं शान्त होकर मनको जीतनेवाले महात्मा पुरुषकी भाँति अपने-आपमें ही स्थित रहना चाहता हूँ। ब्रह्मन् ! यदि अहंकार रहता है तो आपत्तिकालमें मुझे दुःख होता है और यदि नहीं रहता तो मैं निरन्तर सुखका अनुभव करता हूँ। इसलिये अहंकाररहित होना ही श्रेष्ठ है।
मुने ! मैं अहंकारका त्याग करके शान्तचित्त हो उद्वेगशून्य होकर बैठा रहता हूँ; क्योंकि भोगोंके समूहका आधार ही क्षणभङ्गुर है। इस देहरूपी विशाल वनमें जो घनीभूत अहंकाररूपी मोटा-ताजा सिंह है, उसीने इस जगत्का विस्तार किया है (इसे अपनी क्रीडास्थली बनाया है)। मुने ! जैसे शत्रु किसीको मारनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके द्वारा मारण-उच्चाटन आदिका जाल फैलाता है, उसी प्रकार इस अहंकाररूपी महान् शत्रुने संसारमें जीवका पतन करनेके लिये बिना मन्त्र-तन्त्रके ही स्त्री, पुत्र, मित्र आदिके जाल फैला रक्खे हैं। इस अहंकारका मूलोच्छेदपूर्वक निराकरण कर देनेपर ये सभी मानसिक दुश्चिन्ताएँ तुरत अपने-आप विलीन हो जाती हैं। अहंकाररूपी बादलके फट जानेपर शान्तिका विनाश करनेवाला एवं हृदयाकाशमें छाया हुआ महान् मोहरूपी कुहासा धीरे-धीरे न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। महानुभाव मुनीश्वर ! जो सम्पूर्ण आपत्तियोंका घर, शान्ति आदि उत्तम गुणोंसे रहित तथा हृदयके भीतर निवास करनेवाला है, उस अनित्य अहंकारका मैं आश्रय लेना नहीं चाहता (उसके अधीन होना नहीं चाहता)। अपने सुदृढ़ विवेकके द्वारा मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि यह अहंकार नामक वस्तु सब ओरसे अतिशय दुःखरूप ही है। अतः अब मेरे लिये जो कुछ भी कर्त्तव्य शेष रह गया हो, उसे बताते हुए आप मुझे अध्यात्मविषयक उपदेश दीजिये।
मुनीश्वर ! जैसे वायुके प्रवाहमें पड़कर मोर-पंखका अग्रभाग वेगसे हिलता रहता है, उसी प्रकार यह चञ्चल चित्त भी अत्यन्त व्यग्र होकर व्यर्थ ही इधर-उधर दौड़ता रहता है। जैसे कुत्ता अपना पेट भरनेके लिये व्याकुल हो गाँवमें दूर-से-दूरतकके घरों या स्थानोंका चक्कर लगाया करता है, वही दशा इस चञ्चल मनकी है। इसे कहीं भी कोई अनुकूल वस्तु नहीं प्राप्त होती। इसलिये यह दीन बना रहता है। यदि इसे कभी विशाल धनका भंडार प्राप्त हो जाय, तो भी यह भीतरसे तृप्त नहीं होता। जैसे बाँस या बेंतकी बनी हुई पिटारी कभी जलसे नहीं भरती, उसी प्रकार धनसे मनुष्यका जी नहीं भरता। मुने ! जैसे अपने झुंडसे बिछुड़कर जालमें जकड़े हुए मृगको कभी सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार समस्त साधनोंसे शून्य (एवं सत्सङ्गरहित) मन सदा दुर्वासनाओंके जालमें जकड़ा रहता है। इसलिये उसे कभी सुख और संतोष नहीं प्राप्त होता। मुने ! तरङ्गोंके समान चञ्चल वृत्तिको धारण करनेवाला यह मन अपने स्थूल-सूक्ष्म अवयव-विभागको छोड़कर एक क्षणके लिये भी हृदयमें स्थिर नहीं रहता। विषयोंके चिन्तनसे क्षोभको प्राप्त हुआ यह मन मन्दराचलके आघातसे उछलती हुई क्षीरसागर-की दुग्धराशिके समान दसों दिशाओंमें दौड़ता वा
* जैसे चन्द्रमाको राहु निगल जाता है, कमलोंको हिम या ओलोंकी वर्षा नष्ट कर देती है और शरद् ऋतु मेघोंका विध्वंस कर डालती है, उसी प्रकार अहंकार शान्ति, क्षमा, दया तथा प्राणिमात्रमें समभावको नष्ट कर देता है।