भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चेष्टाओंसे भी क्या प्रयोजन है ? अहंकारवश ही मनुष्य इन राज्य आदिसे सम्बन्ध रखता है, किंतु मेरा वह अहंकार ही गल गया है (अतः मेरे लिये इनकी आवश्यकता नहीं रह गयी है) । जैसे हाथी अपने खुरोंके प्रहारसे कोमल कमलको कुचल डालता है, उसी प्रकार कामदेवने मानवती कामिनियोंके द्वारा मनुष्योंके मनको मथ डाला है । मुनीन्द्र ! यदि अभी निर्मल बुद्धिके द्वारा इस चित्तकी चिकित्सा नहीं की जाती तो फिर इसकी चिकित्साका अवसर ही कहाँ रह जायगा ? (क्योंकि रोग बढ़ जानेपर उसकी चिकित्सा कठिन हो जाती है ।) विषयोंकी विषमता ही विष है । लोकप्रसिद्ध विषको वास्तवमें विष नहीं कहा जाता, क्योंकि विष एक ही शरीरका (जिसके द्वारा उसका सेवन किया जाता है, उसीका) नाश करता है, परंतु विषय (-विष) जन्म-जन्मान्तरोंतक जीवको मौतके मुँहमें डालते रहते हैं । सुख-दुःख, मित्र, भाई-बन्धु, जीवन और मरण—ये सब (बन्धनकेकारण होते हुए भी ) ज्ञानी पुरुषके चित्तको नहीं बाँधते (अज्ञानीका ही मन इससे बँधता है) ।

ब्रह्मन् ! आप प्राचीन और अर्वाचीन बातोंके जाननेवाले महात्माओंमें श्रेष्ठ हैं । इसलिये जिस प्रकार मैं शोक, भय और खेदसे मुक्त हो यथार्थ ज्ञानसे सम्पन्न हो जाऊँ, वैसा उपदेश मुझे शीघ्र प्रदान कीजिये । अज्ञान एक भयंकर वनके समान है । जैसे वनमें मृगोंको फँसानेके लिये जाल बिछे होते हैं, काँटेदार झाड़-झंखाड़ फैले रहते हैं तथा जगह-जगह बहुत-से ऊँचे-नीचे स्थान रहते हैं, उसी प्रकार अज्ञानरूपी वन भी विषयवासनाके जालसे आवेष्टित, दुःखरूपी कण्टकोंसे व्याप्त तथा सम्पत्ति-विपत्ति-रूपी ऊँचे-नीचे स्थानोंसे युक्त है। महात्मन् ! जैसे रातमें ऐसी अन्धकार-राशि नहीं होती, जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे नष्ट न हो जाती हो, उसी प्रकार संसारमें ऐसी दुश्चिन्ताएँ नहीं हैं, जो उत्तम अन्तःकरणवाले महात्मा पुरुषोंके सङ्गसे क्षीण न हो जायें । आयु वायुसे टकरायी हुई मेघोंकी घटासे झरते हुए जल-बिन्दुओंके समान क्षणभङ्गुर है । भोग मेघमालाके बीचमें चमकती हुई बिजलीके समान चञ्चल हैं तथा युवावस्थाके मनोरञ्जन जलके वेगके समान चपल हैं—ऐसा विचारकर मैंने इन सबको त्याग दिया और तुरंत ही चिरकालतक बनी रहनेवाली शान्तिको आजसे अपने चित्तपर शासन करनेके लिये सुदृढ़ अधिकार-मुद्रा समर्पित कर दी है ।*

जैसे मृग तुच्छ तृणोंके लोभसे ठगे जाकर गड्डोंमें गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार अन्तःकरणकी वृत्तियाँ निस्सार विषयोंद्वारा ठगी जाती और विक्षेपरूपी दुःखोंको भोगनेके लिये उनके गहरे गर्तमें गिर जाती हैं । जैसे देवता विविध भोग-सामग्रियोंसे परिपूर्ण तथा चतुर्दश भुवनोंके भीतर विचरण करनेवाले अपने शीघ्रगामी विमानका परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार विविध भोगवासनाओंसे विस्तारको प्राप्त हुआ और समस्त लोकोंमें बे रोक-टोक विचरनेवाला मनुष्योंका यह चञ्चल चित्त भी कभी चपलताको नहीं छोड़ता ।

अतः महात्मन् ! जन्म-मरण आदि दुःखोंसे रहित, देह आदि उपाधियोंसे शून्य तथा भ्रान्ति-रहित वह महान् विश्रान्तिदायक परमपद कौन-सा है, जहाँ पहुँच जानेसे शोकका अभाव हो जाता है ? समस्त कर्मोंका सुचारुरूपसे अनुष्ठान करनेवाले तथा सदा लौकिक व्यवहारमें ही तत्पर रहनेवाले जनक आदि महापुरुष कैसे उत्तम पदको प्राप्त हुए ? दूसरोंको अधिक मान देनेवाले महामुने ! वह कौन-सा उपाय है, जिससे संसाररूपी पङ्कका अनेक अङ्गोंसे सम्पर्क हो जानेपर भी मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता ? किस दृष्टि (बुद्धि) का


* जैसे राजा दुष्ट अधिकारियोंसे शासनका अधिकार छीनकर किसी गुणवान्‌को उस पदपर प्रतिष्ठित करनेके लिये अधिकार-पत्र देता है, उसी प्रकार मैंने चित्तभूमिसे भोगवासना आदिका अधिकार हटाकर वहाँ शाश्वत शान्तिको प्रतिष्ठित किया है ।