संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मेघोंकी घटाओंके सम्मुख केकारव करके थक जानेके कारण चुप हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल चन्द्रमाके समान मनोहर एवं महान् तत्त्वविचारसे विकसित चित्तवाले श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठ आदि महान् गुरुजनोंके समक्ष उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये ।
( सर्ग २९–३१ )
श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्यचकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कमलनयन राजकुमार श्रीराम जब इस प्रकार मनके मोहका निवारण करनेवाली बात कहने लगे, तब वहाँ बैठे हुए सब लोगोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे । उनकी समस्त सांसारिक वासनाएँ वैराग्यकी वासनासे नष्ट हो गयीं और वे सब लोग दो घड़ीके लिये मानो अमृतमय समुद्रकी तरङ्गोंमें डूबने-उतराने लगे । श्रीरामचन्द्रजीकी वे बातें जिन लोगोंने सुनीं, वे निश्चलताके कारण चित्रलिखित-से प्रतीत होते थे । उनका हृदय आनन्दसे भर गया था । सभामें बैठकर जिन श्रवणसमर्थ पुरुषोंने श्रीरामकी बातें सुनीं, उनके नाम इस प्रकार हैं— वसिष्ठ-विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रणाकुशल जयन्त और धृष्टि आदि मन्त्री, दशरथ आदि नरेश, पुरवासी, पारशव आदि संकर जातिके लोग, विभिन्न सामन्त, लक्ष्मण आदि राजकुमार, वेदवेत्ता ब्राह्मण, भृत्य और अमात्य । अपने महलकी खिड़कियोंमें बैठी हुई महारानी कौसल्या आदि वनिताएँ भी निश्चल होकर श्रीरामकी बातें सुन रही थीं । उस समय उनके आभूषणोंकी खनखनाहटतक नहीं होती थी । आकाशचारी सिद्ध, गन्धर्व, किंनर, नारद, व्यास और पुलह आदि श्रेष्ठ मुनियोंने तथा देवता, देवराज इन्द्र, विद्याधरगण एवं महान् दिव्य नागोंने भी श्रीरामचन्द्रजीकी वे विचित्र अर्थसे परिपूर्ण और परम उदार बातें सुनी थीं ।
रघुकुलरूपी आकाशके चन्द्रमा तथा शशिसे भी सुन्दर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी जब उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये, तब 'साधुवाद' के गम्भीर घोषके साथ आकाशसे सिद्धसमूहोंद्वारा ऐसी पुष्पवृष्टि की गयी, जिससे वहाँ चंदोवा-सा तन गया । फूलोंकी उस वर्षामें ढेर-के-ढेर केवड़ेके फूल चक्कर काट रहे थे । कमलोंके गुच्छ अपनी अद्भुत छटा दिखा रहे थे । कुन्दपुष्पोंकी राशि झड़ रही थी तथा हवामें उड़ते हुए नील कमलोंके पुञ्ज बिखर रहे थे । उस महलके आँगनकी भूमि पट गयी । घर, छत और चबूतरे आच्छादित हो गये तथा नगरके सभी स्त्री-पुरुष अपनी गर्दन ऊँची करके उस पुष्पवर्षाकी शोभा निहारने लगे । आकाशमें खड़े हुए अदृश्य सिद्ध-समूहोंद्वारा की गयी वह पुष्पवृष्टि आधी घड़ीतक लगातार होती रही । सभा और उसमें बैठे हुए लोगोंको आच्छादित-सा करके जब वह पुष्पवर्षा बंद हुई, तब सभासदोंने सिद्धसमूहोंका यह वार्तालाप अपने कानोंसे सुना—
"सृष्टिके आरम्भसे लेकर अबतक सिद्धोंके समुदायमें रहकर स्वर्गके सारे प्रदेशोंमें घूमते हुए हमलोगोंने आज ही वेदोंका सारभूत एवं कानोंके लिये अमृतके समान सुखद यह अपूर्व प्रवचन सुना है । वीतराग होनेके कारण इन रघुकुलचन्द्र श्रीरामने जो उदार बातें कही हैं, उन्हें सम्भवतः बृहस्पतिजी भी नहीं जानते होंगे । अहो ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हमलोगोंने श्रीरामचन्द्रजीके मुखारविन्दसे प्रकट हुआ यह परम पुण्यमय प्रवचन सुना है, जो अन्तःकरणको
१. मोरकी बोलीको केका कहते हैं ।