शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें(vii) (चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ आफिस वाराणसी द्वारा प्रकाशित)। 10. पं० दुर्गादत्तजी शास्त्री, प्रधान चिकित्सक-श्रीराम मारवाड़ी हिन्दू अस्पताल, वाराणसी द्वारा कृत हिन्दी टीका तथा 11. अम्बाला निवासी पं० लालचन्द्र जी वैद्य शास्त्री, प्रधानाचार्य-श्रीअर्जुन आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी। इनमें अनेक टीकाएँ आज उपलब्ध नहीं हैं। शार्ङ्गधरसंहिता का महत्त्व-मध्यकालीन आयुर्वेदीय प्रवृत्तियों का परिचय प्रदान करने में प्रस्तुत संहिता पूर्णरूप से सक्षम है। मध्यकाल में तान्त्रिकों तथा सिद्धों का सम्प्रदाय उन्नति के शिखर पर पहुँच चुका था। रसशास्त्र भी विकास की ओर अग्रसर था। उक्त काल में मुसलमानों के साथ अनेक नये औषधोपयोगी द्रव्य तथा चिकित्सा-विधियाँ सामने आयीं, जिन्हें आयुर्वेदविदों ने समयोचित समझकर सादर अपना लिया। उस समय फोड़ा चीरने, तुम्बी, सिंगी तथा पच्छ लगाने तक ही शल्यतन्त्र सीमित हो गया था; इसके विशेषज्ञ जर्राह लोग थे। रसायन तथा वाजीकरण-प्रयोग अपनी चरमसीमा पर पहुँच चुके थे। उस समय चिकित्सा का सिद्धान्तपक्ष कमजोर होकर योगों तथा कल्पों की प्रमुखता हो गयी थी। अतएव प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ उपेक्षित हो चली थीं। विद्वान् समयोचित चिकित्सा-ग्रन्थों की रचना करने के लिए बाध्य हो गये थे, जिसके फलस्वरूप शार्ङ्गधरसंहिता का निर्माण हुआ। यही कारण था कि उस समय के आयुर्वेदविद् बोपदेव और हेमाद्रि जैसे सुप्रसिद्ध विद्वान् भी इस ग्रन्थ की टीका लिखने के लिए प्रवृत्त हुए। साथ ही इसका प्रवेश लघुत्रयी में किया गया, जो इस संहिता का मानवर्धन ही था। ग्रन्थ की विशेषताएँ-1. स्फुटरूप में सर्वप्रथम नाड़ीपरीक्षा का ज्ञान इसी ग्रन्थ में प्राप्त होता है। 2. शुक्रस्तम्भक द्रव्यों के प्रयोग, 3. अहिफेन (अफीम), जयपाल (जमालगोटा), जायफल, भाँग आदि द्रव्यों के प्रयोग, 4. विष्णुपदामृत (आक्सीजन) द्वारा समस्त शरीर को तृप्त करने की चर्चा, 5. स्नायुक (नहरुआ) नामक कृमि का वर्णन। इस सम्बन्ध में विद्वानों का मत है, कि यह रोग मुसलमानों द्वारा इस देश में आया। 6. चिकित्सा के लिए विषद्रव्यों के प्रयोगों की अधिकता। जैसे-वत्सनाभ, विषमुष्टि (कुचिला), जयपाल तथा कृष्णसर्पविष के मिश्रण से निर्मित अंजन का विधान। 7. रसौषधों के विशिष्ट तथा अधिकाधिक प्रयोग। 8. चिकित्सा-विधियों में पञ्चकर्म, धारास्वेद, शिरोवस्ति, मूर्धतेल, बिडालक, शोणितस्राव आदि विधियों का विशेष प्रयोग तथा शोणितनिर्हरण (रक्तस्रावण) में 'पद' का प्रयोग उस समय की विशेष देन है। इसी को 'फस्तखोलना' भी कहते हैं। 9. विसूचिका (हैजा) रोग में पार्ष्णिदाह, यकृत्-प्लीहा में स्थानीय दाह का विधान। 10. सूचिकाभरण रस का विलक्षण प्रयोग। 11. विलासिता-प्रधान युग होने के कारण वाजीकरण, वशीकरण, भगसंकोचक, लिंगवृद्धिकर, योनिद्रावक, लोमशातन, केशवर्धन, पलितनाशन, मुखव्यंगनाशक आदि अनेक योगों के विविध प्रयोग। प्रस्तुत ग्रन्थ की एक विशेषता और है-'मानपरिभाषा- निरूपण'। यद्यपि इस विषय का संग्रह अनेक आयुर्वेदीय संहिताओं, परवर्ती ग्रन्थकारों तथा संग्रहकर्ताओं ने अपने-अपने ग्रन्थों में किया है। उस दृष्टि से इसमें जहाँ जो परिवर्तन-परिवर्धन किया गया है, उसे यथास्थान देखें। किसी भी शास्त्र का अध्ययन करने के लिए जिस प्रकार उसके पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान आवश्यक होता है, उसी प्रकार आयुर्वेदीय चिकित्सा-ग्रन्थों में कहे गये योगों का सम्यक् प्रयोग करने के लिए उसकी मान-परिभाषा का ज्ञान परमावश्यक होता है। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर कविराज गंगाधर राय (1799-1855 ई०) ने आयुर्वेद की अनेक कृतियों के साथ एक 'आयुर्वेदीय परिभाषा' नामक लघुग्रन्थ की भी रचना की। उस कृति के उपजीव्य आयुर्वेदीय साहित्य, स्मृतिग्रन्थ तथा कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र आदि रहे हैं। कुछ समय पहले तक यह सरकारी तौल प्रचलित थी-1 रुपया= 1 तोला, 5 तोला = 1 छटाँक, 16 छटाँक, 1 सेर तथा 40 सेर = 1 मन । 'मीयते अनेन इति मानम्' अर्थात् जिस पैमाने से नापा या तौला जाय, उसे नाप, माप या मान कहते हैं। ये आर्यमान अनेक स्थानों में सामान्य नाम-परिवर्तन के साथ आज भी प्रचलित हैं। जैसे-रीवा रियासत में 'खारी' को 'खाँडी' और बुन्देलखण्ड में 'कुडव' को 'कुरवा' कहते हैं। इस प्रकार के परिभाषा-ग्रन्थों में सामान्य परिभाषाओं का उल्लेख रहता ही है; किन्तु जहाँ विशेष विधान किया गया हो, भले ही वह सामान्य परिभाषा का विरोध कर रहा हो, वहाँ उन द्रव्यों को उसी परिमाण में लेकर योग का निर्माण करना चाहिए। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA टीका की विशेषताएँ- हमने अपने द्वारा लिखी हिन्दी टीका का नाम भी 'दीपिका' ही रखा है। यह पूर्ववर्ती टीकाकारों