भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

88 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे कुटज पुटपाक तत्कालाकृष्टकुटजत्वचं तण्डुलवारिणा ।। २८ ।। पिष्टां चतुष्पलमितां जम्बूपल्लववेष्टिताम्। सूत्रेण बद्धां गोधूमपिष्टेन परिवेष्टिताम् ।। २९ ।। लिप्तां च घनपङ्केन गोमयैर्वह्निना दहेत्। अङ्गारवर्णां च मृदं दृष्ट्वा वह्नेः समुद्धरेत् ।। ३० ।। ततो रसं गृहीत्वा च शीतं क्षौद्रयुतं पिबेत्। जयेत् सर्वानतीसारान् दुस्तरान् सुचिरोत्थितान् ।। ३१ ।। तत्काल उतारी हुई कुरैया की सोलह तोला छाल को चावलों के धोवन से पीसकर, जामुन के पत्तों से लपेट कर, तागों से बाँधकर, गेहूँ के गूँथे आटे से लेप करके उस पर चिकनी मिट्टी का लेप चढ़ा दें और गोहरी (कण्डे) की आग में पकायें, ऊपर के लेप को लाल वर्ण का देखकर निकाल लें। तदनन्तर कुछ शीत होने पर औषध को निकाल कर उससे रस निचोड़ लें। यह रस जब सर्वथा शीत हो जाये तो मधु मिलाकर पीना चाहिये। यह पुराने भयंकर अतिसारों को जीतता है। चावल का धोवन बनाने की विधि कण्डितं तण्डुलपलं जलेऽष्टगुणिते क्षिपेत्। भावयित्वा जलं ग्राह्यं देयं सर्वत्र कर्मसु ।। ३२ ।। कण्डित (छड़े हुये या तुष उतारे हुये) चार तोला चावलों को आठ गुने जल में डाल दें, कुछ समय (एक-दो घण्टा) के पश्चात् जल निकाल कर आवश्यक कार्यों में प्रयुक्त करें। वक्तव्य- इसी को 'चावलों का पानी' कहा जाता है। अरलूत्वक् पुटपाक अरलूत्वक्कृतश्चैव पुटपाकोऽग्निदीपनः। मधुमोचरसाभ्यां च युक्तः सर्वातिसारजित् ।। ३३ ।। टैंटू की छाल का उक्त रीति से बनाया हुआ पुटपाक रस अग्नि को दीप्त करता है और मधु तथा मोचरस से युक्त सभी अतिसारों को जीतता है। तित्तिर पुटपाक न्यग्रोधादेश्च कल्केन पूरयेद् गौरतित्तिरेः। निरन्त्रमुदरं सम्यक्पुटपाकेन तत्पचेत् ।। ३४ ।। तत्कल्कस्य रसः क्षौद्रयुक्तः सर्वातिसारनुत्। तीतर का पेट चीर कर अँतड़ियाँ निकाल दें और न्यग्रोधादिगण (शा० म० खं० अ० २) के कल्क से उसके (पेट) को भरकर पुटपाक-विधि से उसे पकायें। तत्पश्चात् उस कल्क का रस मधु मिलाकर पीने के लिए दें। यह सभी अतिसारों को नष्ट करता है। दाड़िम पुटपाक पुटपाकेन विपचेत् सुपक्वं दाडिमीफलम् ।। ३५ ।। तद्रसो मधुसंयुक्तः सर्वातीसारनाशनः। अनार के फल को पुटपाक-विधि से पका कर इसका रस शहद मिलाकर देने से यह सभी अतिसारों को नष्ट करता है। बीजपूरादि पुटपाक बीजपूराम्रजम्बूनां पल्लवानि जटाः पृथक् ।। ३६ ।। विपचेत् पुटपाकेन क्षौद्रयुक्तश्च तद्रसः। छर्दि निवारयेद्घोराम् सर्वदोषसमुद्भवाम् ।। ३७ ।। बिजौरानीबू, आम एवं जामुन के कोमल पत्तों अथवा जड़ों की छाल को पुटपाक के विधान से पकाये। मधु से युक्त इनका रस सन्निपात से उत्पन्न भीषण कै (उलटी) को रोक देता है। वासा पुटपाक पिष्टानां वृषपत्राणां पुटपाकरसो हिमः। मधुयुक्तो जयेद् रक्तपित्तकासज्वरक्षयान् ।। ३८ ।। अडूसा के पत्तों को पीसकर पुटपाक की विधि से निकाला हुआ रस शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त, खाँसी, ज्वर एवं क्षय को जीतता है। कण्टकारी पुटपाक पचेत् क्षुद्रां सपञ्चाङ्गां पुटपाकेन तद्रसः। पिपलीचूर्णसंयुक्तः कासश्वासकफापहः ।। ३९ ।। भटकटैया (कण्टकारी) के पञ्चाङ्ग अर्थात् जड़, फूल, पत्ते, फल एवं छाल को लेकर पुटपाक की विधि से पकाये। इसका रस पीपल के चूर्ण से युक्त पीने से खाँसी, दमा एवं कफ को नष्ट करता है। बिभीतक पुटपाक बिभीतकफलं किञ्चिद् घृतेनाभ्यज्य लेपयेत्। गोधूमपिष्टेनाङ्गारैर्विपचेत् पुटपाकवत् ।। ४० ।। ततः पक्वं समुद्धृत्य त्वचं तस्य मुखे क्षिपेत्। कासश्वासप्रतिश्यायस्वरभङ्गाञ्जयेत् ततः ।। ४१ ।। बहेड़ा के फल पर थोड़ा घी चुपड़ कर गेहूँ के गूँथे आटे का लेप कर दें और पुटपाक के समान अंगारों में पकाये। जब आटा पक जाये तो उसके छिलके को मुख में डालकर चूसे तो