भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 356 में से

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पृष्ठ 123

प्रथमोऽध्यायः ] स्वरसादिकल्पना 87 गोरखमुंडी का रस 2 पल (8 तोला) भर पीने से अपची, गण्डमाला तथा कामला को नष्ट करता है। मुण्डी-स्वरस रसो मुण्ड्याः स कोष्णो वा मरीचैरवधूलितः। जयेत् सप्तदिनाभ्यासात् सूर्य्यावर्त्तार्धभेदकौ ।। 17 ।। गोरखमुंडी का कुछ गर्म किया हुआ मरिच के चूर्ण से मिश्रित स्वरस सात दिन पीने से सूर्यावर्त्त तथा अर्द्धावभेदक (आधाशीशी) नामक शिरोरोगों को नष्ट करता है। ब्राह्मी आदि का स्वरस ब्राह्मीकूष्माण्डषड्ग्रन्थाशङ्खिनीस्वरसाः पृथक्। मधुकुष्ठयुताः पीताः सर्वोन्मादापहारिणः।। 18 ।। पृथक्-पृथक् ब्राह्मी, कोहड़ा (पेठा), वच तथा शङ्खपुष्पी (शंखाहुली) के स्वरस शहद तथा कूठ का चूर्ण मिलाकर पीने से सभी प्रकार के उन्माद रोग नष्ट होते हैं। सोमरोग-चिकित्सा (कदलीनां फलं पक्वं धात्री-फल-रसं तथा। शर्करासहितं खादेत् सोमधारणमुत्तमम् ।। 19 ।।) केले का पका फल और आँवले का स्वरस चीनी मिलाकर खाने से 'सोमरोग' दूर हो जाता है। उदर्द-चिकित्सा (गैरिकं कोलमात्रं च सप्तभिर्मरिचैर्युतम्। मधुना कर्षमात्रेण पयः पीतमुदर्दनुत् ।। 20 ।।) गेरू आधा तोला, कालीमिर्च सात दाना, मधु एक तोला, जल आधा पाव पीने से 'उदर्द' अर्थात् जुलपित्ती या रक्तपित्ती दूर होती है। उष्णोपद्रव-चिकित्सा (रसः पलाण्डोः पानार्थं स्विन्न आम्ररसस्तथा। प्रदेयो लवणोपेतः उष्णोपद्रवशान्तये ।। 21 ।। अम्लिकाद्यम्लद्रव्याणां रसो वै सितया युतः। पेयो मद्यःशरीरे च प्रलापोष्मज्वरे हितम् ।। 22 ।।) उष्णोपद्रव (अत्यन्त गर्म वायु, लू या धूप के लगने) से उत्पन्न होने वाले उपद्रवों की शान्ति के लिए रोगी को पीने के लिए प्याज का रस तथा अग्नि में भूने हुये कच्चे आम का रस (पन्ना) उचित मात्रा में नमक मिलाकर देना चाहिये और इमली आदि खट्टे द्रव्यों का रस चीनी मिलाकर पीने को दें तथा शरीर पर मले। इससे भी प्रलाप, दाह तथा ज्वर शान्त हो जाते हैं। वक्तव्य-विशेष जानने के लिए सु० सू० अ० 12.38 देखें। कूष्माण्ड-स्वरस कूष्माण्डकस्य स्वरसो गुडेन सह योजितः। दुष्टकोद्रवसञ्जातमदं पानाद् व्यपोहति ।। 23 ।। कोहड़े का स्वरस गुड़ मिलाकर पीने से कोदों के मद (नशा) को नष्ट करता है। गाङ्गेरुकी-स्वरस खड्गादिच्छिन्नगात्रस्य तत्काल पूरितो व्रणः। गाङ्गेरुकीमूलरसैर्जायते गतवेदनः ।। 24 ।। तलवार आदि के लगने से उत्पन्न शरीर के घाव में तत्काल गांगेरेन की जड़ के रस को भरने पर वह पीड़ा रहित हो जाता है। वक्तव्य-यहाँ तक स्वरसों के कुछ उदाहरण दिये गये हैं और अन्तिम पाठ से यह भी बतला दिया कि स्वरसों का प्रयोग केवल पीने के लिए ही नहीं होता, अपितु वे लगाए भी जाते हैं। पुटपाक-विधि पुटपाकस्य कल्कस्य स्वरसो गृह्यते यतः। अतस्तु पुटपाकानां युक्तिरत्रोच्यते मया।। 25 ।। पुटपाकस्य मात्रेयं लेपस्याङ्गारवर्णता। लेपं च द्व्यङ्गुलं स्थूलं कुर्याद्वाङ्गुष्ठमात्रकम् ।। 26 ।। काश्मरीवटजम्ब्वादिपत्रैर्वेष्टनमुत्तमम् । पलमात्रं रसो ग्राह्यः कर्षमात्रं मधु क्षिपेत् ।। 27 ।। कल्कचूर्णद्रवाद्यास्तु देयाः स्वरसवद् बुधैः। पुट (सम्पूट) में पकाये हुये कल्क (चटनी के समान पीसे हुये द्रव्य) का भी स्वरस ही ग्रहण किया जाता है। इसलिये इस अध्याय में पुटपाकों की भी विधि लिखी जाती है। उपयोगी द्रव्य का कल्क बनाकर गंभार, बरगद तथा जामुन आदि के पत्तों से भली प्रकार लपेट कर और ऊपर से सनी हुई चिकनी मिट्टी का दो या डेढ़ अंगुल मोटा लेप चढ़ाकर सुखा लें, फिर गोहरी की आग में पकाये। जब लेप का वर्ण लाल हो जाये तो निकाल लेना चाहिये। कुछ ठंडा होने पर संभाल कर लेप और पत्ते हटाकर कल्क निकाल कर उसे निचोड़ कर रस निकाल लेना चाहिये और कल्क, चूर्ण तथा द्रव (दूध तथा गोमूत्र आदि) आदि पदार्थ स्वरस के समान (इसी अध्याय का श्लोक 8 देखें) डालने चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA