शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें86 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे (आठ पहरी) तथा अग्नि द्वारा पकाया हुआ रस एक पल (4 जामुन, आम तथा आँवले के कोमल पत्तों का स्वरस कर्ष) पीना चाहिये। मधु, घी तथा दूध मिलाकर पीने से भीषण अतिसार का नाश प्रक्षेप द्रव्यों का मान होता है। मधु श्वेता गुडं क्षाराञ्जीरकं लवणं तथा। बब्बूलादि स्वरस घृतं तैलं च चूर्णादीन् कोलमात्रान् रसे क्षिपेत्॥6॥ स्थूलबब्बूलिकापत्ररसः पानाद् व्यपोहति। शहद, चीनी, खाँड, गुड़, जौखार आदि तथा खार, जीरा, सर्वातिसारान् स्योनाककुटजत्वग्रसोऽथवा॥12॥ नमक, घी, तेल एवं चूर्ण आदि यदि रस या स्वरस में डालने जंगली बबूल के पत्तों का स्वरस अथवा टेंटू तथा कुरैया हों तो एक कोल (आधा कर्ष) डालने चाहिये। की छाल का स्वरस पीने से यह सभी अतिसारों को नष्ट वक्तव्य-स्वरस में मधु आदि डालने का परिमाण उक्त करता है। श्लोक द्वारा बतलाया गया है। आर्द्रक-स्वरस अमृता-स्वरस आर्द्रकस्वरसः क्षौद्रयुक्तो वृषणवातनुत्। अमृताया रसः क्षौद्रयुक्तः सर्वप्रमेहजित्। श्वासकासारुचीर्हन्ति प्रतिश्यायं व्यपोहति॥13॥ हरिद्राचूर्णयुक्तो वा रसो धात्र्याः समाक्षिकः॥7॥ अदरक का स्वरस मधु मिलाकर पीने से अण्डकोषों की गिलोय का स्वरस मधु मिलाकर अथवा आँवले का रस वायु को, श्वास, कास, अरुचि तथा प्रतिश्याय को नष्ट करता है। हल्दी का चूर्ण तथा मधु मिलाकर पिया जाये तो सब प्रमेहों बीजपूर-स्वरस को नष्ट करता है। बीजपूररसः पानान्मधुक्षारयुतो जयेत्। वासक-स्वरस पार्श्वहृद्वस्तिशूलानि कोष्ठवातं च दारुणम्॥14॥ वासकस्वरसः पेयो मधुना रक्तपित्तजित्। बिजौरा नींबू का रस मधु तथा क्षार (जौखार आदि कोई ज्वरकासक्षयहरः कामलाश्लेष्मपित्तहा॥8॥ भी क्षार) मिलाकर पीने से यह पसली, हृदय तथा मूत्राशय अडूसे का रस मधु मिलाकर पीना चाहिये। इससे रक्तपित्त, के शूल को तथा उदर की भीषण वायु को जीतता है। ज्वर, कास, क्षय, कामला, कफ तथा पित्त नष्ट होते हैं। वक्तव्य-इस योग में बिजौरा आदि किसी भी नींबू के त्रिफलादि का स्वरस रस का प्रयोग किया जा सकता है। नींबू के रस में क्षार डालते त्रिफलाया रसः क्षौद्रयुक्तो दार्वीरसोऽथवा। ही गैस उत्पन्न होने लगती है, इस गैस के साथ उसे पी जाना निम्बस्य वा गुडूच्या वा पीतो जयति कामलाम्॥9॥ चाहिये। इसका स्वाद 'मीठा सोडा' जैसा होता है। हमारा त्रिफला का रस अथवा दारुहल्दी का रस अथवा नीम विचार है कि आजकल जो 'सोडावाटर' बन रहा है, वह का रस अथवा गिलोय का रस मधु मिलाकर पीने से कामला उक्त योग का ही सुधरा हुआ रूप है। देखें-सु० उ० अ० को जीतता है। 5.22। तुलसी आदि का स्वरस शतावरी आदि का स्वरस पीतो मरिचचूर्णेन तुलसीपत्रजो रसः। शतावर्याश्च मधुना पित्तशूलहरो रसः। द्रोणपुष्पीरसो वापि निहन्ति विषमज्वरान्॥10॥ निशाचूर्णयुतः कन्यारसः प्लीहापचीहरः॥15॥ तुलसी के पत्तों का रस अथवा गूमा का रस मरिच के शतावर का रस शहद मिलाकर पीने से यह पित्त के शूल चूर्ण को मिलाकर पीने से विषमज्वरों (मलेरिया आदि) को को हरता है और घीकुआर का रस हल्दी के चूर्ण के साथ नष्ट करता है। पीने से प्लीहावृद्धि तथा गण्डमाला का नाश होता है। जम्ब्वादि पत्र-स्वरस अलम्बुषादि स्वरस जम्ब्वाम्रामलकीनां च पल्लवोत्थो रसो जयेत्। अलम्बुषायाः स्वरसः पीतो द्विपलमात्रया। मध्वाज्यक्षीरसंयुक्तो रक्तातीसारमुल्बणम्॥11॥ अपचीगण्डमालानां कामलायाश्च नाशनः॥16॥