शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 356 में से
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द्वितीयाऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 91 [बायाँ स्तम्भ] वाला) हो जाता है, इसलिये ढँकना न देकर ही क्वाथ को पकाना चाहिये। वक्तव्य- सुगन्धित औषधियों का क्वाथ तो ढँककर एवं उनकी गन्ध की रक्षा करते हुये थोड़ी ही देर पकाना चाहिये अथवा उक्त औषधों को प्रक्षेप के रूप में ही डालना चाहिये, अन्यथा उनका तैलांश उड़ जायेगा, जिसकी सत्ता बहुत आवश्यक है। अतएव सौंफ, अजवायन आदि के अर्क निकालते समय यन्त्र की पूर्ण रूप से रक्षा की जाती है। गुडूच्यादिगण क्वाथ गुडूचीधान्यकारिष्टरक्तचन्दनपद्मकैः । गुडूच्यादिगणक्वाथः सर्वज्वरहरः स्मृतः ॥ 8 ॥ दीपनो दाहहृल्लासतृष्णाच्छर्द्यरुचीर्जयेत्। गिलोय, धनियाँ, नीम की छाल, लालचन्दन एवं पद्माकाठ यह 'गुडूच्यादि गण' कहलाता है। इसका काढ़ा सभी ज्वरों को नष्ट करता है, अग्नि को दीप्त करता है, दाह, जी मिचलाना, प्यास, कै तथा अरुचि को नष्ट करता है। वक्तव्य- यह 'गुडूच्यादि गण' सु० सू० अ० 38 का है। यह शीतज्वर या मलेरिया की परमौषध है। नागरादि क्वाथ- सोंठ, देवदारु का चूर्ण, धनियाँ, बनभण्टा (बड़ी भटकटैया) तथा कण्टकारी का पाचक क्वाथ ज्वर रोगियों को पहले (आमज्वर में) देना चाहिये। यह ज्वरनाशक है। आमज्वरों में सामान्य क्वाथ देने का निषेध है, किन्तु 'पाचन' क्वाथ दिया जा सकता है। क्षुद्रादि क्वाथ- भटकटैया, चिरायता, सोंठ, गुरुच तथा पोहकरमूल का काढ़ा पीने से आठ प्रकार के ज्वरों की शान्ति होती है। उक्त दोनों क्वाथ ज्वरशामक हैं। गुडूच्यादि क्वाथ गुडूचीपिप्पलीमूलनागरैः पाचनं स्मृतम् ॥ 9 ॥ दद्याद् वातज्वरे पूर्णलिङ्गे सप्तमवासरे। गिलोय, पिप्पलामूल तथा सोंठ का काढ़ा भी 'पाचन' कहा जाता है। यह सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त वातज्वर में सातवें दिन देना चाहिये। शालपर्ण्यादि क्वाथ शालिपर्णी बला द्राक्षा गुडूची सारिवा तथा ।। 10 ।। आसां क्वाथं पिबेत् कोष्णं तीव्रवातज्वरच्छिदम्। शालपर्णी (सरिवन), बरियारा, मुनक्का, गिलोय तथा [दायाँ स्तम्भ] सारिवा-इनका काढ़ा कुछ गुनगुना पीना चाहिये। इससे भीषण वातज्वर नष्ट हो जाता है। काश्मर्यादि क्वाथ काश्मरीसारिवाद्वाक्षात्रायमाणाऽमृताभवः ।। 11 ।। कषायः सगुडः पीतो वातज्वरविनाशनः। गम्भार का फल अथवा छाल, सारिवा, मुनक्का, त्रायमाणा तथा गिलोय का काढ़ा गुड़ मिलाकर पीने से वातज्वर को नष्ट करता है। वक्तव्य- उक्त तीनों क्वाथ वातज्वर शामक हैं। कट्फलादि क्वाथ कट्फलेन्द्रयवापाठातिक्तामुस्तैः शृतं जलम् ।। 12 ।। पाचनं दशमेऽह्नि स्यात् तीव्रे पित्तज्वरे नृणाम्। कायफल की छाल, इन्द्रजौ, पाठा, कुटकी तथा नागरमोथा का काढ़ा 'पाचन' कहलाता है। यह भयानक पित्तज्वर में दसवें दिन देना चाहिये। पर्पटादि क्वाथ पर्पटो वासकतिक्ता कैरातो धन्वयासकः ।। 13 ।। प्रियङ्गुश्च कृतः क्वाथ एषां शर्करया युतः। पिपासादाहपित्तास्रयुतं पित्तज्वरं जयेत् ।। 14 ।। पित्तपापड़ा, अडूसा के पत्ते, कुटकी, चिरायता, धमासा और फूलप्रियंगु, इनका काढ़ा खाँड़ या मिश्री मिलाकर पीने से प्यास, दाह तथा रक्तपित्त युक्त पित्तज्वर को जीतता है। द्राक्षादि क्वाथ द्राक्षा हरीतकी मुस्तं कटुकी कृतमालकः । पर्पटश्च कृतः क्वाथ एषां पित्तज्वरापहः ।। 15 ।। तृण्मूर्च्छादाहपित्तासृक्शमनो भेदनः स्मृतः । मुनक्का, बड़ी हरड़, नागरमोथा, कुटकी, अमलतास की गुदी तथा पित्तपापड़ा इनका काढ़ा पित्तज्वर को नष्ट करता है। प्यास, मूर्च्छा, दाह तथा रक्तपित्त को शान्त करता है और यह दस्तावर है। पर्पटादि क्वाथ (एकः पर्पटकः श्रेष्ठः पित्तज्वरविनाशनः ।। 16 ।। किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोशीरबालकैः ।) अकेले पित्तपापड़ा का काढ़ा ही पित्तज्वर को नष्ट कर देता है और यदि इसमें सफेद चन्दन, खस तथा नेत्रबाला मिला दिया जाये तो फिर क्या कहना, अर्थात् तब तो यह क्वाथ बहुत ही लाभ करता है।