भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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(ix) इस प्रकार के कार्य पूर्ववर्ती आचार्यों ने भी अपनी अन्तःप्रेरणा से प्रेरित होकर समय-समय पर किये हैं और उन्हें आदर प्राप्त हुआ है। उनकी कृतियाँ भी विद्वानों द्वारा सम्मानित होती रही हैं और उससे पाठकों को भी दिशा-निर्देश मिला है। इन्हीं प्रलोभनों से प्रलोभित होकर मैंने भी यह पूर्ति-कार्य किया है। इसमें मुझे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है, इसे आयुर्वेद-मर्मज्ञ सहृदय विद्वान् ही बतला सकेंगे। इस ग्रन्थ में ब्रेकेट से घिरे हुए समस्त पद्य परिवर्धित हैं, शेष प्राचीन। इसका स्पष्टीकरण निम्नलिखित तालिका से हो जायेगा। शार्ङ्गधरसंहिता के श्लोकों की स्थिति निर्णयसागरीय श्लोकसंख्या वर्तमान प्रति श्लोकसंख्या परिवर्धित श्लोकसंख्या पूर्वखंड- 454 पूर्वखंड- 598 पूर्वखंड- 144 मध्यमखंड- 1267 मध्यमखंड- 1290 मध्यमखंड- 23 उत्तरखंड- 640 उत्तरखंड- 712 उत्तरखंड- 72 कुलयोग 2361 2600 239 आभार-प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता की टीका लिखते समय तथा इसके अपूर्ण स्थलों की पूर्ति करते समय मुझे पूर्ववर्ती मूल एवं टीका ग्रन्थों का अवलोकन, परिशीलन तथा मनन करने की आवश्यकता पड़ी। उन-उन ग्रन्थों से जिस अंश में जो सहायता प्राप्त हुई है, उसके लिए मैं उन सभी वैद्यविद्यावदात विद्वानों और उनकी कृतियों का आभारी हूँ। अपने पूज्य गुरुचरणों, सम्प्रति स्वर्गीय पं० लालचन्द्र जी वैद्य का, जिन्होंने मुझे सदैव शिष्य एवं पुत्र निर्विशेष समझकर अपनी चतुरस्र प्रतिभा से प्रभावित किया, अपने अतुल शास्त्रीय ज्ञान से अनुशासित किया और शेष अवसरों पर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखकर मेरा समुपबृंहण किया, उनका मैं विशेष रूप से आभारी हूँ, क्योंकि मैं अध्ययन-काल में सभी प्रकार से उनका अन्तेवासी रहा। उन्होंने मुझे अध्यापन-काल के अतिरिक्त उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते अपने ज्ञानामृत से सदैव सिंचित किया है। आयुर्वेदीय गुत्थियों को सुलझाने में वे सिद्धहस्त थे और चिकित्सा करने में पीयूषपाणि थे, अतः आपसे प्राप्त ज्ञान का मैं जन्म-जन्मान्तरों तक ऋणी हूँ। धन्यवाद-चौखम्बा सुरभारती परिवार को अनेकानेक धन्यवाद है, जिन्होंने अनेक विषयों पर लिखी हुई मेरी कृतियों को प्रकाशित कर उन्हें मूर्त रूप प्रदान किया है। इसके पूर्व 'चरकचन्द्रिका-टीका' से युक्त चरकसंहिता को आपने प्रकाशित किया। इसके बाद बृहत्त्रयी के शेष भाग को प्रकाशित करने के लिए भी कृतसंकल्प हैं। वसन्तपञ्चमी विद्वद्विधेय 2046 वि० संवत् डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA