शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 356 में से
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पञ्चमोऽध्यायः कल्क्कल्पना
[बायाँ स्तम्भ]
कल्क-निर्माण-विधि द्रव्यमार्द्रं शिलापिष्टं शुष्कं वा सजलं भवेत्। प्रक्षेपावापकल्कास्ते तन्मानं कर्षसम्मितम्॥१॥ कल्के मधु घृतं तैलं देयं द्विगुणमात्रया। सितागुडौ समौ दद्याद् द्रवा देयाश्चतुर्गुणाः॥२॥ आर्द्र (सरस) या हरे द्रव्य को शिला पर पीस लिया जाता है, सूखा हो तो जल डालकर पीस लिया जाता है। इस द्रव्य को 'प्रक्षेप', 'आवाप' या 'कल्क' कहते हैं। इसकी मात्रा एक कर्ष (1 तोला) होती है। कल्क में यदि मधु, घी अथवा तैल मिलाना हो तो दुगुना मिलाना चाहिये और यदि चीनी अथवा गुड़ मिलाना तो समान भाग तथा यदि कोई द्रव (दूध, गोमूत्र आदि) मिलाना हो तो चौगुना मिलाना चाहिये। वक्तव्य—जब किसी रोगी को औषधि या औषधियों की चटनी बनाकर दी जाती है, तो इस चटनी को 'कल्क' कहा जाता है। वर्द्धमानपिप्पली कल्क त्रिवृद्ध्या पञ्चवृद्ध्या वा सप्तवृद्ध्याथवा कणाः। पिबेत् पिष्ट्वा दशदिनं तास्तथैवापकर्षयेत्॥३॥ एवं विंशद्दिनैः सिद्धं पिप्पलीवर्द्धमानकम्। अनेन पाण्डुवातास्रकासश्वासारुचिज्वराः॥४॥ उदरार्शःक्षयश्लेष्मवाता नश्यन्त्युरोग्रहाः। कणा अर्थात् पिप्पली को प्रतिदिन तीन-तीन अथवा पाँच-पाँच अथवा सात-सात बढ़ाकर और पीसकर (दूध के साथ) दस दिन-पर्यन्त दूध में मिलाकर पीयें और फिर उसको उसी प्रकार (जिस प्रकार बढ़ाया था) घटायें। इस प्रकार बीस दिनों में 'पिप्पलीवर्द्धमानक' योग सिद्ध हो जाता है। इसके सेवन से पाण्डुरोग, वातरक्त, कास, श्वास, अरुचि, ज्वर,
[दायाँ स्तम्भ]
उदररोग, अर्श (बवासीर), क्षय (यक्ष्मा), कफ के विकार, वात-विकार तथा उरोग्रह (फुफ्फुस तथा हृदय की गति की रुकावट) रोग नष्ट हो जाते हैं। वक्तव्य—यह परमोत्तम योग है। इसमें अधिक से अधिक दूध पिलाना चाहिये। इसके सेवन काल में रोगी को पाँच-सात सेर तक दूध पिलाया जा सकता है। इसी से पिप्पली सेवन से उत्पन्न गर्मी शान्त होती है। इसका विस्तृत स्वरूप चरकसंहिता में देखें। निम्बपत्र कल्क लेपान्निम्बदलैः कल्को व्रणशोधनरोपणः॥५॥ भक्षणाच्छर्दिकुष्ठानि पित्तश्लेष्मकृमीञ्जयेत्। नीम के पत्तों के कल्क का लेप करने से व्रण का शोधन हो जाता है और उसका घाव शीघ्र भर जाता है तथा इसे खाने से कै, कोढ़, पित्त-विकार, कफ-विकार तथा क्रिमि का नाश होता है। महानिम्ब कल्क महानिम्बजटाकल्को गृध्रसीनाशनः स्मृतः॥६॥ बकायन के जड़ की छाल का 'कल्क' गृध्रसी (रिंगण) नामक वातव्याधि को जीतता है। रसोन कल्क शुद्धः कल्को रसोनस्य तिलतैलेन मिश्रितः। वातरोगान्जयेत् तीव्रान् विषमज्वरनाशनः॥७॥ केवल लहसुन का कल्क बनाकर और तिल के तेल में मिलाकर खाने से भीषण वातव्याधियों (अपतन्त्रक, पक्षा- घात तथा अर्दित आदि) को तथा विषमज्वरों को नष्ट करता है। वक्तव्य—लहसुन को शुद्ध या साफ करने की विधि