शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः ] कल्ककल्पना 113 तथा उसके पथ्य निम्नलिखित योग में देखें। एक बात स्मरण रखनी चाहिये कि जहाँ तक हो सके ऐसे अवसरों पर 'एक पुतिया' लहसुन ही प्रयोग में लाना चाहिये। वह अधिक प्रभावकारक होता है। द्वितीय रसोन कल्क पक्वकन्दरसोनस्य गुलिका निस्तुषीकृता। पाटयित्वा च मध्यस्थं दूरीकुर्यात् तदङ्कुरम् ।। 8 ।। तदुग्रगन्धनाशाय रात्रौ तक्रे विनिक्षिपेत्। अपनीय च तन्मध्याच्छिलायां पेषयेत् ततः ।। 9 ।। तन्मध्ये पञ्चमांशेन चूर्णमेषां विनिक्षिपेत्। सौवर्चलं यवानीं च भर्जितं हिङ्गु सैन्धवम् ।। 10 ।। कटुत्रिकं जीरकं च समभागानि चूर्णयेत्। एकीकृत्य ततः सर्वं कल्कं कर्षप्रमाणतः ।। 11 ।। खादेदग्निबलापेक्षी ऋतुदोषोद्यपेक्षया। अनुपानं ततः कुर्यादेरण्डशृतमन्वहम् ।। 12 ।। सर्वाङ्गैकाङ्गगं वातमर्दितं चापतन्त्रकम्। अपस्मारमथोन्मादमूरुस्तम्भं च गृध्रसीम् ।। 13 ।। उरःपृष्ठकटीपार्श्वकुक्षीपीडां कृमीञ्जयेत्। अजीर्णमातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ।। 14 ।। रसोनमशनन् पुरुषस्त्यजेदेतन्निरन्तरम्। मद्यं मांसं तथाऽम्लं च रसं सेवेत नित्यशः ।। 15 ।। लहसुन के पूर्ण रूप से पके हुये कन्द को लेकर भली-भाँति छील लें और फाड़कर उनमें से अंकुरों (जो हरे-से होते हैं) को निकाल दें तथा लहसुन का उत्कट गन्ध को नष्ट (कम) करने के लिए रात को मट्ठा (लस्सी या छाछ) में डालकर रख दें और प्रातःकाल निकालें तथा (धोकर) शिला पर पीसकर 'कल्क' तैयार करें। तत्पश्चात् उसमें निम्नलिखित वस्तुओं का पाँचवाँ भाग चूर्ण मिलायें-काला नमक, देशी अजवायन, घी में भुनी हींग, सेंधा नमक, सोंठ, मरिच, पीपल तथा जीरा (इसे भी घी में भून लेना चाहिये) को समान भाग में लेकर चूर्ण तथा लहसुन के कल्क को एक में मिलाकर रख दें। तत्पश्चात् इसको एक कर्ष (1 तोला) की मात्रा में खाना चाहिये अथवा रोगी की अग्नि (पाचनशक्ति), शारीरिक बल, ऋतु (शीत पा उष्ण काल) तथा दोष (वात, पित्त, तथा कफ) का विचार करके मात्रा को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। इसे खाकर एरण्ड (रेड) की जड़ का क्वाथ पीना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिदिन सेवन करने से सर्वांगवात, एकांगवात (पक्षाघात), अर्दित (मुख-प्रदेश का लकवा), अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), अपस्मार (मृगी), उन्माद (पागलपन), ऊरुस्तम्भ, गृध्रसी और उरःस्थल (छाती), पीठ, कमर, पसली तथा उदर की पीड़ा तथा कृमिरोग को जीतता है। इसका सेवन करते समय मनुष्य अजीर्ण (अनपच) न होने दें, धूप (घाम), क्रोध, अधिक जल, दूध तथा गुड़ को अवश्य त्याग दें। मद्य, मांस तथा खट्टे पदार्थ इच्छानुसार खाये जा सकते हैं। वक्तव्य-यद्यपि उक्त योग में तैल प्रयोग का विधान नहीं किया है तथापि इसे तिलतैल में भली-भाँति भूनकर सेवन करना चाहिये। इस प्रकार यह रसोनकल्क कुछ दिनों तक रखा भी जा सकता है। उक्त रोगों के अतिरिक्त यह 'गठिया' की बहुत प्रसिद्ध औषधि है। पिपल्यादि कल्क पिप्पली पिप्पलीमूलं भल्लातकफलानि च। एतत्कल्कश्च सशौद्र ऊरुस्तम्भनिवारणः ।। 16 ।। पीपल, पीपलामूल तथा भिलावा के फल (शुद्ध) का कल्क मधु मिलाकर खाने से 'ऊरुक्वाथ स्तम्भ' को दूर करता है। वक्तव्य-भल्लातक-शोधन की विधि शा० सं० म० खं० अ० 2 में दिये गये 'दार्वादि' के वक्तव्य में देखें। विष्णुक्रान्ता कल्क विष्णुक्रान्ताजटाकल्कः सिताक्षौद्रघृतैर्युतः। परिणामभवं शूलं नाशयेत् सप्तभिर्दिनैः ।। 17 ।। विष्णुक्रान्ता (कोयल या अपराजिता) की जड़ का कल्क चीनी, घी तथा मधु मिलाकर सेवन करने से परिणामशूल को सात ही दिन में नष्ट कर देता है। शुण्ठ्यादि कल्क शुण्ठीतिलगुडै कल्कं दुग्धेन सह योजयेत्। परिणामभवं शूलमामवातं च नाशयेत् ।। 18 ।। सोंठ, तिल तथा गुड़ का कल्क दूध में मिलाकर पीने से 'परिणामशूल' तथा आमवात को नष्ट करता है। अपामार्गबीज कल्क अपामार्गस्य बीजानां कल्कस्तण्डुलवारिणा। पीतो रक्तार्शसां नाशं कुरुते नात्र संशयः ।। 19 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA